संध्या समय न्यूज
Jaipur News: मध्य पूर्व में जारी युद्ध के प्रभाव से भारत में रसोई गैस के संकट के बीच राजधानी जयपुर में पारंपरिक मिट्टी के चूल्हों की मांग में अचानक तेजी आई है। बाजार में इंडक्शन और डीजल चूल्हों के गायब होने के कारण लोग अब मिट्टी और गाय के गोबर से बने चूल्हों का सहारा ले रहे हैं। यह पारंपरिक तरीका न केवल गैस का विकल्प बनकर उभरा है, बल्कि इसका उपयोग पर्यावरण के अनुकूल भी माना जा रहा है।
शहर के राजा पार्क स्थित आर्य समाज कैंपस में इन दिनों ग्रामीण कारीगर गाय के गोबर और मिट्टी से चूल्हे तैयार कर रहे हैं। विशेष बात यह है कि इन चूल्हों में लकड़ी या कोयले के स्थान पर मशीन द्वारा गाय के गोबर से बने ‘गौ-काष्ठ’ (लकड़ी नुमा ईंधन) का उपयोग किया जा रहा है, जिससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचने का खतरा कम हो जाता है।

सस्ता और टिकाऊ विकल्प
बता दें कि संस्था की ओर से मिट्टी के इस चूल्हे को तवे के साथ मात्र 500 रुपये में दिया जा रहा है। वहीं, ईंधन के लिए गौ-काष्ठ का बड़ा बंडल 250 रुपये और छोटा बंडल 150 रुपये में उपलब्ध कराया जा रहा है। दावा किया गया है कि यह चूल्हा कम से कम 20 वर्षों तक खराब नहीं होगा और गौ-काष्ठ का उपयोग करने पर एक परिवार का महीने का खाना बनाने का खर्च 500 रुपये से भी कम आएगा।
लोगों को मिल रहा राहत और स्वाद
आर्य समाज से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता ने बताया कि यह गैस और इंडक्शन का बेहतर विकल्प है। इसमें बनने वाला भोजन स्वाद में भी बेहतर होता है। उन्होंने कहा, “इसके जरिए यह संदेश जा रहा है कि भारत अब हर मामले में आत्मनिर्भर हो रहा है और रसोई गैस जैसी जरूरतों के लिए भी बाहरी निर्भरता पूरी तरह खत्म करने की ओर बढ़ रहा है।”
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वहीं, चूल्हे खरीदने पहुंचे स्थानीय लोगों ने कहा कि गैस न मिलने के कारण खाना बनाने में काफी दिक्कत हो रही थी। मिट्टी के चूल्हे और गौ-काष्ठ ने उनकी समस्या का हल निकाला है। इस पहल से रोजगार के नए अवसर भी सृजित हो रहे हैं और लोग अपनी पुरानी परंपराओं से भी जुड़ रहे हैं।

















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