संध्या समय न्यूज
भारत के त्योहारों में होली का स्थान अद्वितीय है। यह एकमात्र ऐसा पर्व है, जिसे लोग सिर्फ मनाते नहीं, बल्कि ‘खेलते’ भी हैं। क्या आप जानते हैं कि होली खेलने की यह परंपरा कहां से शुरू हुई? इतिहास के पन्नों को पलटें तो यह सिलसिला महाभारत के आदिपर्व से जुड़ता है और सैकड़ों सालों तक मुगल दरबार की शान बना रहा।
महाभारत में मिला ‘संवत् उत्सव’ का जिक्र
महाभारत के आदिपर्व में राजा उपरिचर की कथा मिलती है, जिन्हें देवराज इंद्र ने दोस्ती की निशानी के तौर पर एक छड़ी (संवत्) दी थी। राजा ने इस छड़ी को ऊंची जगह गाड़ दिया और हर साल वसंत में इंद्र की याद में ‘संवत् उत्सव’ मनाया जाता था। इस दौरान राजकाज और कर वसूली रुक जाती थी। पूरे राज्य में मस्ती का माहौल होता था और खेल-कूद का आयोजन होता था। इतिहासकारों की मानें तो इसी संवत् उत्सव को होली का प्रारंभिक स्वरूप माना जा सकता है, जिससे इस त्योहार को 5000 साल पुराना बताया जाता है।
वैदिक काल से जुड़ी ‘होला’ की परंपरा
वैदिक काल में इसे ‘नवात्रैष्टि यज्ञ’ कहा जाता था। खेतों में उपजे नए अन्न को यज्ञ में आहुति देकर परिवार के साथ बांटा जाता था। इस अधपके या भुने अनाज को ‘होला’ कहा जाता था, जिससे ‘होलिकोत्सव’ और ‘होली’ शब्द का उदय हुआ। समय के साथ इसमें ज्योतिष और ऋतु परिवर्तन की मान्यताएं जुड़ती गईं। भीमबेटका और अजंता-एलोरा की गुफाओं के शैलचित्र भी इस बात के गवाह हैं कि भारतीय परंपरा में रंगों और उत्सव का पुराना नाता रहा है।
कामदेव से कृष्ण भक्ति तक
वसंत के मौसम को जीवंतता का प्रतीक मानते हुए कामदेव और रति की कल्पना की गई। कालिदास के ‘ऋतुसंहार’ और भवभूति की रचनाओं में ‘मदनोत्सव’ का वर्णन मिलता है, जहां फूलों की बारिश होती थी। बाद में कृष्ण भक्ति परंपरा ने इसे नया रूप दिया और राधा-कृष्ण की रासलीला से इसका सांस्कृतिक महत्व और गहरा हुआ।
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जब मुगल खेलते थे ‘ईद-ए-गुलाबी’
होली का इतिहास सिर्फ हिंदू राजाओं तक सीमित नहीं है। मध्यकाल में यह त्योहार हिंदू-मुस्लिम सद्भाव का प्रतीक बना। मोहम्मद बिन तुगलक पहले सुल्तान थे जिन्होंने होली खेली। मुगलकाल में तो इसका जलवा और बढ़ा।
- अकबर और जहांगीर: अकबर ने जोधाबाई के साथ और जहांगीर ने नूरजहां के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। अलवर संग्रहालय में जहांगीर को होली खेलते हुए दिखाने वाली पेंटिंग मौजूद है।
- शाहजहां: उनके समय होली को ‘ईद-ए-गुलाबी’ और ‘आब-ए-पाशी’ (रंगों की बौछार) कहा जाता था।
- बहादुर शाह जफर: अंतिम मुगल बादशाह भी वसंत और होली के दीवाने थे।
नवाबों ने गढ़ी ‘होली की ठुमरी’
अवध के नवाब वाजिद अली शाह ने तो होली को सांस्कृतिक ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया। उन्होंने ‘होली की ठुमरी’ की परंपरा शुरू की, जो आज भी दिल बांधती है। अमीर खुसरो जैसे कवियों ने भी अपनी कलम से इस त्योहार को सूफी रंग दिया। सार यह है कि होली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता का वह बयान है, जो जीवन को गंभीरता से लेने के साथ-साथ खेल और रंगों में जीना भी सिखाती है।




















