Find out the cost of a rocket in space: अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत की बढ़ती ताकत का एक और ऐतिहासिक प्रमाण तब सामने आया, जब श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस सेंटर (SDSC) से देश के पहले प्राइवेट ऑर्बिटल क्लास रॉकेट ‘विक्रम-1’ का सफल प्रक्षेपण किया गया। इस ऐतिहासिक मिशन के साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों से लिखा गया ‘वंदे मातरम्’ का संदेश अंतरिक्ष में पहुंच गया।
इस सफलता ने देश में जहां एक नया उत्साह भर दिया है, वहीं आम जनमानस के मन में एक बेहद दिलचस्प और तार्किक सवाल भी उभरा है— आखिर अंतरिक्ष तक जाने वाला एक रॉकेट बनाने और उसे लॉन्च करने में असल में कितना खर्च आता है? आइए इस बहुत बड़े इंजीनियरिंग और आर्थिक गणित को आसान भाषा में समझते हैं।
रॉकेट के आकार और क्षमता के अनुसार लागत
किसी भी रॉकेट की निर्माण लागत तय करने वाला सबसे बड़ा पैरामीटर उसकी ‘पेलोड क्षमता’ (यानी वह कितना वजन अंतरिक्ष तक ले जा सकता है) और मिशन की जटिलता होती है। जो छोटे रॉकेट कम वजन के सैटेलाइटों को कक्षा (ऑर्बिट) में स्थापित करते हैं, वे भारी रॉकेटों की तुलना में काफी सस्ते होते हैं।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के रॉकेटों को अगर हम उनके वर्ग के अनुसार देखें, तो तस्वीर कुछ इस प्रकार है:
- SSLV (स्मॉल सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल): यह दुनिया के सबसे किफायती लॉन्च व्हीकल्स में गिना जाता है। छोटे सैटेलाइट्स भेजने वाले इस रॉकेट की निर्माण लागत लगभग ₹35 करोड़ है।
- PSLV (पोलर सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल): इसरो का यह ‘विश्वसनीयता का पर्याय’ माना जाता है। इसके अलग-अलग वेरिएंट होने के कारण इसकी लागत ₹153 करोड़ से लेकर ₹250 करोड़ के बीच बदलती रहती है।
- LVM3 (लॉन्च व्हीकल मार्क 3): यह इसरो का सबसे भारी और ताकतवर ऑपरेशनल रॉकेट है, जिसने चंद्रयान-3 जैसे ऐतिहासिक मिशन को अंजाम दिया था। भारी भरकम पेलोड ले जाने वाले इस दिग्गज की एक बार लॉन्च करने की लागत लगभग ₹400 करोड़ से ₹500 करोड़ के बीच होती है।
दुनिया भर की स्पेस एजेंसियां कितना खर्च करती हैं?
अगर हम भारत से निकलकर वैश्विक स्तर पर नजर डालें, तो यह खर्च करोड़ों से लेकर लाखों करोड़ तक जा सकता है।
- *SpaceX (फाल्कन 9): एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने रॉकेट इंडस्ट्री में ‘रियूजेबल’ (दोबारा इस्तेमाल होने वाले) बूस्टर की क्रांति ला दी है। फाल्कन 9 रॉकेट को एक बार लॉन्च करने का खर्च लगभग ₹560 करोड़ आता है।
- NASA (स्पेस लॉन्च सिस्टम – SLS): अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने अपने ‘आर्टेमिस’ प्रोग्राम के तहत चंद्रमा और भविष्य में मंगल ग्रह पर इंसानों को भेजने के लिए SLS विकसित किया है। यह एकमात्र ऐसा रॉकेट है जो इतनी अधिक ताकत रखता है। हालांकि, इसकी लागत आसमान छूती है। एक बार SLS लॉन्च करने का अनुमानित खर्च ₹18,000 करोड़ से लेकर ₹34,000 करोड़ के बीच है।
रॉकेट बनाना इतना महंगा क्यों है?
अंतरिक्ष में कोई भी वस्तु भेजना किसी जादू से कम नहीं है। इसके पीछे विज्ञान के कुछ ऐसे सिद्धांत हैं, जो सस्ते नहीं हो सकते:
- प्रति किलोग्राम का खर्च: पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल को तोड़कर अंतरिक्ष तक पहुंचने के लिए अपार ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऑर्बिट में सिर्फ एक किलोग्राम वजन पहुंचाने का खर्च औसतन ₹8 लाख से ₹16 लाख के बीच हो सकता है।
- महंगा ईंधन (प्रोपेलेंट): रॉकेट में साधारण पेट्रोल-डीजल नहीं जलता। इसके लिए अत्यंत ठंडे तापमान पर रखे जाने वाले लिक्विड ऑक्सीजन और लिक्विड हाइड्रोजन जैसे उन्नत प्रोपेलेंट्स का इस्तेमाल होता है, जिनका निर्माण और भंडारण बेहद महंगा है।
- रिसर्च और मानव संसाधन: एक रॉकेट बनाने में दशकों की रिसर्च, एडवांस्ड इंजीनियरिंग, स्ट्रक्चरल टेस्टिंग और हजारों वैज्ञानिकों व इंजीनियरों का कुशल मेहनत लगती है।
- इंसानों को भेजने का अतिरिक्त खर्च: अगर रॉकेट में इंसानों को भेजा जा रहा है (जैसे भारत का आगामी गगनयान मिशन), तो लागत कई गुना बढ़ जाती है। इसके पीछे कारण है—लाइफ सपोर्ट सिस्टम (ऑक्सीजन, तापमान नियंत्रण), इमरजेंसी एस्केप सिस्टम और खतरनाक कॉस्मिक रेडिएशन से बचाव के लिए विशेष ढाल (शील्ड) लगाना।
भारत का प्राइवेट स्पेस सेक्टर: दुनिया को दे रहा टक्कर
विक्रम-1 रॉकेट की सफलता सिर्फ एक तकनीकी उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह भारतीय प्राइवेट स्पेस इकोसिस्टम की आर्थिक ताकत को दर्शाती है। वैश्विक स्तर पर जहां ऑर्बिटल लॉन्च के लिए करोड़ों-अरबों का बजट देखने को मिलता है, वहीं भारत की प्राइवेट कंपनी ने विक्रम-1 को तैयार करने और लॉन्च करने में मात्र ₹19 करोड़ से ₹28 करोड़ के बीच का खर्च किया है।
यह लागत अंतरराष्ट्रीय बाजार के मानकों के मुकाबले अत्यंत किफायती है। आधुनिक तकनीकों जैसे 3D प्रिंटिंग, कार्बन कम्पोजिट मटीरियल का इस्तेमाल और एजाइल मैन्युफैक्चरिंग प्रोसेस के चलते यह संभव हो पाया है।

























