Delhi News: ऑटिज्म अवेयरनेस माह (Autism Awareness Month) के तहत अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), नई दिल्ली ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। एम्स के जेएलएन ऑडिटोरियम में आयोजित एक ‘पब्लिक हेल्थ लेक्चर’ में देश के आला चिकित्सकों, वैज्ञानिकों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने शुरुआती पहचान और जागरूकता पर जोर दिया। इस वर्ष संयुक्त राष्ट्र की थीम “ऑटिज्म एंड ह्यूमैनिटी: एवरी लाइफ हैज़ वैल्यू” (हर जीवन का महत्व) को केंद्र में रखा गया।
12 से 18 महीने में मिल सकते हैं संकेत
विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि ऑटिज्म कोई बीमारी नहीं, बल्कि एक न्यूरो-डेवलपमेंटल डिसऑर्डर (मस्तिष्क के विकास संबंधी अवस्था) है। इसकी पहचान महज 12 से 18 महीने की उम्र में की जा सकती है। अगर इस समय सही संकेतों को पहचान लिया जाए और समय पर हस्तक्षेप (इंटरवेंशन) किया जाए, तो बच्चों के समग्र विकास में काफी सुधार लाया जा सकता है।
एम्स के आंकड़े चौंकाने वाले
AIIMS के आंकड़ों के अनुसार, अब तक यहां 2000 से अधिक बच्चों का मूल्यांकन किया जा चुका है। इस डेटा से एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि लगभग 80 प्रतिशत बच्चों में ऑटिज्म के साथ-साथ अन्य गंभीर समस्याएं जैसे मिर्गी (Epilepsy), ध्यान की कमी (ADHD), व्यवहार संबंधी समस्याएं और नींद से जुड़ी दिक्कतें भी मौजूद हैं।
वैक्सीन और पैरासिटामोल को लेकर फैलाया भ्रम
कार्यक्रम के दौरान डॉक्टरों ने समाज में फैले सबसे बड़े भ्रमों को भी दूर किया। विशेषज्ञों ने साफ शब्दों में कहा कि वैक्सीन (टीकाकरण) या पैरासिटामोल जैसी दवाइयों को ऑटिज्म से जोड़ना पूरी तरह से वैज्ञानिक रूप से गलत और आधारहीन है। उन्होंने अभिभावकों से बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण वाले ‘जादुई इलाजों’ से बचने की सख्त अपील की।
परिवारों को भी होता है मानसिक दबाव
ऑटिज्म सिर्फ बच्चे का नहीं, बल्कि पूरे परिवार का मुद्दा है। कार्यक्रम में बताया गया कि इससे प्रभावित बच्चों के माता-पिता पर भारी मानसिक और सामाजिक दबाव पड़ता है। ऐसे में सिर्फ इलाज ही नहीं, बल्कि ‘मल्टी-डिसिप्लिनरी केयर’ (कई विशेषज्ञों की टीम) और साइकोसोशल (मनोसामाजिक) सपोर्ट की बेहद जरूरत होती है।
AIIMS की 24×7 मदद
इस चुनौती से निपटने के लिए एम्स बाल रोग विभाग की प्रोफेसर डॉ. शेफाली गुलाटी ने बताया कि संस्थान ने मरीजों और उनके परिवारों को सही समय पर मदद पहुंचाने के लिए 24×7 हेल्पलाइन, ईमेल सपोर्ट और डिजिटल प्लेटफॉर्म जैसी अभूतपूर्व पहल शुरू की है।
डॉ. गुलाटी ने कहा कि अगर हम 12 से 18 महीने की उम्र में ही संकेतों को पहचान लें, तो बच्चों के भविष्य को बेहतर बनाया जा सकता है। जागरूकता, सही जानकारी और समय पर इलाज से ऑटिज्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) से प्रभावित लोगों को एक बेहतर और सम्मानजनक जीवन दिया जा सकता है।
एम्स का यह कदम सिर्फ चिकित्सा सुविधा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज में ऑटिज्म को लेकर जुड़ी कलंक और अंधविश्वास को तोड़ने और एक समावेशी (Inclusive) सोच विकसित करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।


















