महाराष्ट्र में सड़क हादसों के गंभीर पीड़ितों को जल्द इलाज उपलब्ध कराने के लिए हवाई एम्बुलेंस सेवा शुरू करने की तैयारी की जा रही है। इस प्रस्ताव पर मंत्रालय में एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई, जिसमें स्वास्थ्य मंत्री प्रकाश आबिटकर, गृह राज्य मंत्री योगेश कदम, परिवहन आयुक्त राजेश नार्वेकर तथा मोटर परिवहन, स्वास्थ्य और पुलिस विभागों के वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए।
बैठक में सेवा शुरू करने से जुड़े प्रशासनिक और परिचालन पहलुओं पर चर्चा की गई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 15 नवंबर तक परियोजना की मानक कार्यप्रणाली (SOP) तैयार कर उसे मंजूरी देने का लक्ष्य रखा गया है। इसके बाद नवंबर के अंत तक उच्चाधिकार समिति से स्वीकृति लेकर निविदा प्रक्रिया आगे बढ़ाई जाएगी। योजना के मुताबिक, नए साल की शुरुआत में महाराष्ट्र हवाई एम्बुलेंस सेवा शुरू हो सकती है। हालांकि, इसकी शुरुआत और संचालन का अंतिम कार्यक्रम स्वीकृतियों तथा निविदा प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।
सड़क हादसों के पीड़ितों के लिए तेज चिकित्सा सहायता
राज्य में हर साल करीब 15 हजार सड़क हादसे होने की जानकारी सामने आई है। गंभीर दुर्घटना के बाद घायल व्यक्ति को अस्पताल या ट्रॉमा केयर सेंटर तक पहुंचाने में लगने वाला समय कई बार उसकी जान बचाने में निर्णायक साबित होता है। खासकर महामार्गों पर दुर्घटना होने पर दूरी, यातायात और अस्पताल तक पहुंचने की कठिनाइयों के कारण उपचार में देरी हो सकती है।
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार हवाई एम्बुलेंस को आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था के एक विकल्प के रूप में विकसित करने की योजना बना रही है। इसका उद्देश्य दुर्घटना के बाद गंभीर रूप से घायल लोगों को तेजी से उपयुक्त चिकित्सा केंद्र तक पहुंचाना है। सेवा का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि दुर्घटना की सूचना मिलने, मरीज की स्थिति का आकलन करने, हेलीकॉप्टर या अन्य विमान की उपलब्धता और अस्पताल में उपचार की तैयारी के बीच तालमेल कितना प्रभावी रहता है।
‘गोल्डन ऑवर’ में इलाज क्यों अहम?
हादसे के बाद का पहला घंटा अक्सर ‘गोल्डन ऑवर’ कहा जाता है। इस अवधि में गंभीर रूप से घायल व्यक्ति को आवश्यक चिकित्सा सहायता मिल जाए, तो उसकी जान बचाने और हालत बिगड़ने से रोकने की संभावना बढ़ सकती है। सड़क पर प्राथमिक उपचार, मरीज को सुरक्षित तरीके से ले जाना और ट्रॉमा सेंटर तक जल्द पहुंचाना—ये सभी आपातकालीन प्रतिक्रिया के अहम हिस्से हैं।
हवाई एम्बुलेंस हर दुर्घटना के लिए उपयुक्त नहीं होती, लेकिन दूरस्थ स्थानों या ऐसे इलाकों में जहां सड़क मार्ग से अस्पताल पहुंचने में अधिक समय लग सकता है, यह उपयोगी साबित हो सकती है। इसलिए सेवा के लिए स्पष्ट मानक कार्यप्रणाली जरूरी होगी। इसमें मरीज की प्राथमिकता तय करने, उड़ान की अनुमति, मौसम और लैंडिंग की स्थिति, अस्पताल से समन्वय तथा जमीन पर एम्बुलेंस की उपलब्धता जैसे पहलुओं को शामिल करना होगा।
तीन प्रमुख महामार्गों पर विशेष व्यवस्था
प्रस्तावित योजना में समृद्धि महामार्ग, मुंबई-पुणे द्रुतगति महामार्ग और मुंबई-गोवा महामार्ग को प्राथमिकता देने की बात है। इन मार्गों पर गंभीर दुर्घटनाओं के पीड़ितों को तेज चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने के लिए विशेष व्यवस्था विकसित करने की योजना बनाई जा रही है।
इन महामार्गों पर हवाई सहायता को प्रभावी बनाने के लिए दुर्घटना-प्रवण क्षेत्रों की पहचान, आपातकालीन संपर्क व्यवस्था और नजदीकी ट्रॉमा केयर केंद्रों के साथ समन्वय आवश्यक होगा। साथ ही, हवाई सेवा को सड़क पर मौजूद पुलिस, स्वास्थ्यकर्मियों और बचाव दलों की कार्रवाई से जोड़ना भी महत्वपूर्ण रहेगा। इससे मरीज को दुर्घटनास्थल से लेकर अस्पताल तक लगातार चिकित्सा सहायता मिल सकेगी।
योजना के अगले चरण
बैठक में तय समयसीमा के अनुसार, पहले सेवा संचालन की SOP तैयार की जाएगी और उसे मंजूरी के लिए प्रस्तुत किया जाएगा। इसके बाद उच्चाधिकार समिति की स्वीकृति और निविदा प्रक्रिया के जरिए सेवा से जुड़े संचालन संबंधी निर्णय आगे बढ़ेंगे। निविदा प्रक्रिया में सेवा प्रदाता, विमान और चिकित्सा सुविधाओं से जुड़ी शर्तें तय होंगी। इन विवरणों की पुष्टि आधिकारिक निर्णयों के बाद ही होगी।
सड़क दुर्घटनाओं को रोकना प्राथमिकता है, लेकिन हादसा होने के बाद पीड़ित को समय पर इलाज मिलना भी उतना ही जरूरी है। महाराष्ट्र हवाई एम्बुलेंस सेवा का उद्देश्य इसी आपातकालीन प्रतिक्रिया को मजबूत करना है—ताकि गंभीर मरीजों को उपचार तक पहुंचाने में होने वाली देरी कम की जा सके। योजना की वास्तविक सफलता इसके सुचारु संचालन, अस्पतालों के साथ समन्वय और जरूरतमंद मरीजों तक समय पर पहुंचने पर निर्भर करेगी।

























