Chaitra Navratri 2026 Day 2: चैत्र नवरात्रि (Chaitra Navratri 2026) के पावन अवसर पर माता दुर्गा के नौ रूपों की आराधना की जाती है। नवरात्रि का दूसरा दिन मां ब्रह्मचारिणी को समर्पित होता है। मान्यता है कि मां ब्रह्मचारिणी की पूजा-अर्चना से भक्तों को तप, ज्ञान, संयम और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। इस बार दूसरे दिन का विशेष महत्व इसलिए भी है, क्योंकि इस दिन ‘सर्वार्थ सिद्धि योग’ और ‘अमृत सिद्धि योग’ जैसे शुभ योग बन रहे हैं।
मां ब्रह्मचारिणी का अर्थ और महत्व
मां ब्रह्मचारिणी माता दुर्गा का दूसरा स्वरूप हैं। ‘ब्रह्मचारिणी’ नाम दो शब्दों से मिलकर बना है- ‘ब्रह्म’ अर्थात तप या तपस्या और ‘चारिणी’ अर्थात आचरण करने वाली। इस प्रकार इनका अर्थ है- तप का आचरण करने वाली देवी। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां ने अपने पिछले जन्म में भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए इस रूप में कठोर तपस्या की थी। ये तप, संयम और वैराग्य की देवी हैं।
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नवरात्रि के दूसरे दिन बन रहे शुभ योग
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सर्वार्थ सिद्धि योग में शुरू किए गए कार्य निश्चित ही सफल होते हैं। चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन यानि शुक्रवार को सुबह 6 बजकर 25 मिनट से लेकर देर रात 2 बजकर 27 मिनट तक सर्वार्थ सिद्धि के साथ-साथ अमृत सिद्धि योग बना रहेगा। इसके अतिरिक्त, शनिवार दोपहर 2:30 से 3:18 तक विजय मुहूर्त का संयोग भी बन रहा है, जो पूजन के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।
पूजा विधि (Puja Vidhi)
1. स्नान और वस्त्र: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें।
2. स्थापना: आसन पर बैठकर मां ब्रह्मचारिणी का ध्यान करें।
3. पंचामृत स्नान: मां को दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से स्नान कराएं।
4. वस्त्र और सामग्री: मां को सफेद रंग के वस्त्र, चंदन, अक्षत, रोली, फूल और धूप अर्पित करें।
5. भोग: उन्हें पान, सुपारी और लौंग अर्पित करना शुभ माना जाता है।
मां ब्रह्मचारिणी का प्रिय भोग
नवरात्रि के दूसरे दिन मां को शर्करा (चीनी) या गुड़ का भोग लगाना विशेष रूप से शुभ माना जाता है। मान्यता है कि ऐसा करने से साधक को आयुष्मान (लंबी आयु) का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पूजा मंत्र (Mantra)
मां की आराधना के लिए निम्नलिखित मंत्रों का जाप करें:
मूल मंत्र: ॐ देवी ब्रह्मचारिण्यै नम:
ध्यान मंत्र:
या देवी सर्वभेतेषु मां ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
दधना करपद्याभ्यांक्षमालाकमण्डलू।
देवीप्रसीदतु मयी ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
मां ब्रह्मचारिणी की आरती
पूजन के उपरांत निम्नलिखित आरती गाएं:
जय अंबे ब्रह्माचारिणी माता।
जय चतुरानन प्रिय सुख दाता।
ब्रह्मा जी के मन भाती हो।
ज्ञान सभी को सिखलाती हो।।
ब्रह्मा मंत्र है जाप तुम्हारा।
जिसको जपे सकल संसारा।।
जय गायत्री वेद की माता।
जो मन निस दिन तुम्हें ध्याता।।
कमी कोई रहने न पाए।
कोई भी दुख सहने न पाए।।
उसकी विरति रहे ठिकाने।
जो तेरी महिमा को जाने।।
रुद्राक्ष की माला ले कर।
जपे जो मंत्र श्रद्धा दे कर।।
आलस छोड़ करे गुणगाना।
मां तुम उसको सुख पहुंचाना।।
ब्रह्माचारिणी तेरो नाम।
पूर्ण करो सब मेरे काम।।
भक्त तेरे चरणों का पुजारी।
रखना लाज मेरी महतारी।।
आरती की विधि
आरती करते समय विशेष बात का ध्यान रखें। देवी-देवताओं की आरती कुल 14 बार उतारनी चाहिए- 4 बार चरणों पर से, 2 बार नाभि पर से, 1 बार मुख पर से और 7 बार पूरे शरीर पर से। आरती की बत्तियां विषम संख्या (1, 5 या 7) में ही बनानी चाहिए।




















