ऋषी तिवारी
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों के विवाद के बीच अब केंद्र की मोदी सरकार को सुप्रीम कोर्ट की तरफ से एक और बड़ा झटका लगा है। सर्वोच्च अदालत ने अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) आरक्षण मामले में केंद्र सरकार से सख्त सवाल पूछे हैं। अदालत ने सीधे पूछा है कि संवैधानिक पीठ के 2024 के उस ऐतिहासिक फैसले पर अब तक क्या कार्रवाई हुई है, जिसमें एससी-एसटी आरक्षण में ‘क्रीमी लेयर’ और ‘उप-वर्गीकरण’ (sub-classification) लागू करने की बात कही गई थी।
अदालत के इन सवालों ने भाजपा की नींद उड़ा दी है और पार्टी एक नए सियासी ‘चक्रव्यूह’ में फंसती नजर आ रही है। माना जा रहा है कि अगर सरकार ने इस मामले में सावधानी नहीं बरती, तो इसका असर दलित सियासत पर गहरा पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख
बीते मंगलवार (10 फरवरी) को मामले की सुनवाई करते हुए देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी करते हुए जवाब मांगा है। दरअसल, ‘समता आंदोलन समिति’ और ओपी शुक्ला की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत ने यह कदम उठाया। गौरतलब है कि अगस्त 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाते हुए राज्य सरकारों को एससी-एसटी आरक्षण के भीतर ‘उप-वर्गीकरण’ (sub-quotas) करने की इजाजत दी थी। साथ ही, ओबीसी की तर्ज पर एससी-एसटी में भी क्रीमी लेयर लागू करने की बात कही गई थी, ताकि सबसे पिछड़े वर्गों को लाभ मिल सके।
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याद आया 2024 का विरोध?
अगस्त 2024 का यह फैसला राजनीतिक तौर पर बेहद गरमा गया था। कांग्रेस से लेकर भाजपा के कई अहम सहयोगी और विपक्षी दलों ने इसका विरोध किया था। बसपा सुप्रीमो मायावती ने इस फैसले का खुलकर विरोध किया था, जिसके बाद दलित समुदाय सड़कों पर उतर आया था। तब मोदी सरकार ने संकट को टालने के लिए कमर कस ली थी। एनडीए के करीब 100 एससी-एसटी सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात कर यह मांग रखी थी कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला किसी भी हालत में लागू नहीं होना चाहिए। इस पर केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भी स्पष्ट किया था कि सरकार बीआर अंबेडकर के संविधान से बंधी है, जिसमें एससी-एसटी आरक्षण में क्रीमी लेयर का कोई प्रावधान नहीं है। सरकार के इस भरोसे के बाद ही विरोध थमा था।

नया सियासी संकट
लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर उसी फैसले पर कार्रवाई की मांग कर दलित सियासत को फिर से गर्मा दिया है। अगर सरकार न्यायालय के फैसले के मुताबिक क्रीमी लेयर लागू करने का रास्ता अपनाती है, तो दलित समुदाय फिर से सड़कों पर उतर सकता है। ऑल इंडिया अंबेडकर महासभा के चेयरमैन अशोक भारती ने कहा है कि सरकार ने अभी तक एससी-एसटी को पूरा दूध नहीं दिया है और मलाई निकालने की बात शुरू हो गई है। उन्होंने इसे आरक्षण खत्म करने की साजिश करार दिया है।
भाजपा की परेशानी बढ़ सकती है
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा के लिए यह मामला गले की फांस साबित हो सकता है। बसपा, आजाद समाज पार्टी और चिराग पासवान की एलजेपी (रामविलास) जैसी दलित-आधारित पार्टियां इसका कड़ा विरोध कर सकती हैं। यहां तक कि कांग्रेस भी बदले हुए राजनीतिक माहौल में मौके का फायदा उठाते हुए विरोध में खड़ी दिख सकती है।
























