अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मैदान में एक बार फिर से भारत और अमेरिका के बीच कूटनीतिक तालमेल की कसौटी कसी जा रही है। हाल ही में अमेरिकी सीनेट से एक ऐसे प्रस्तावित कानून की खबरें आई हैं, जिसके तहत रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक का शुल्क (भारी टैरिफ) लगाने की बात की जा रही है। इस सूची में भारत और चीन जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएं सबसे ऊपर हैं। इस पूरे मामले पर भारत सरकार ने चुप्पी तोड़ते हुए अपना रुख साफ कर दिया है।
अमेरिकी सीनेट में उठी 100% टैरिफ की मांग
बता दें कि अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी के वरिष्ठ सीनेटर रिचर्ड ब्लुमेंथल और रिपब्लिकन पार्टी के दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम की ओर से पेश किए गए इस बिल का मुख्य उद्देश्य रूस की रीढ़ की हड्डी तोड़ना है। यूक्रेन युद्ध के बाद से अमेरिका और पश्चिमी देश लगातार प्रयासरत हैं कि कैसे रूस की ऊर्जा क्षेत्र से आने वाली आय पर रोक लगाई जाए, जिससे उसके पास युद्ध चलाने के लिए फंड न बचे।
प्राप्त खबरों के अनुसार, इस कड़े प्रस्ताव को अमेरिकी सीनेट के करीब 60 सदस्यों का समर्थन प्राप्त है। यह बिल उन देशों को सीधा निशाना बना रहा है, जिन्होंने पश्चिमी दबाव को अनसुना करते हुए मॉस्को से तेल खरीदना जारी रखा है।
अमेरिकी सीनेटर ब्लुमेंथल ने स्पष्ट शब्दों में बताया कि इस बिल के तहत चीन, भारत, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे पांच प्रमुख देशों पर 100 प्रतिशत का अतिरिक्त जुर्माना या टैरिफ लगाया जा सकता है। यूक्रेन संघर्ष के बाद से भारत ने रूस से कम कीमत पर भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदा है, जिसे अब अमेरिका इस नए कानून के जरिए रोकने की कोशिश में लगा दिखता है।
विदेश मंत्रालय ने दिया कूटनीतिक जवाब
इस पूरे विवाद पर भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा, “हम इन अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर काफी बारीकी से नजर रख रहे हैं और हमें इस प्रस्तावित अमेरिकी कानून के हर पहलू की पूरी जानकारी है।”
जब उनसे इस बिल के भारत पर पड़ने वाले संभावित आर्थिक असर के बारे में पूछा गया, तो जायसवाल ने एकदम सीधा और सशक्त जवाब दिया। उन्होंने कहा, “जहां तक कच्चे तेल की खरीदारी का सवाल है, तो भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए दुनिया भर के कई देशों के साथ कारोबार करता है। हमारी ऊर्जा खरीदारी पूरी तरह से हमारे राष्ट्रीय हितों और हमारे नजरिए पर निर्भर करती है।”
विश्लेषकों का मानना है कि भारत का यह बयान साफ तौर पर इंगित करता है कि ऊर्जा सुरक्षा भारत जैसे विकासशील देश के लिए सर्वोपरि है, और वह किसी एक देश के दबाव के चलते अपनी आर्थिक नीतियों से समझौता नहीं करेगा।
अमेरिकी वीजा नियमों में सख्ती और भारतीयों की परेशानी
तेल के मुद्दे के साथ ही, विदेश मंत्रालय ने अमेरिका द्वारा हाल ही में वीजा नियमों में की गई बदलावों पर भी अपनी प्रतिक्रिया दी। अमेरिका ने विदेशी छात्रों, पत्रकारों और अन्य लोगों के लिए अपने वीजा नियमों को काफी सख्त कर दिया है। सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब अमेरिका ने दशकों पुरानी उस नीति को खत्म कर दिया है, जिसके तहत लोग बिना सरकारी निगरानी के अनिश्चितकालीन समय तक वहां रह सकते थे।
वीजा मुद्दे पर भारत का रुख
वीजा नियमों में हुई इन सख्तियों पर प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “हमने वीजा नियमों से जुड़ी इन रिपोर्ट्स पर गौर किया है। किसी भी देश का वीजा नियम, जारी करने की प्रक्रिया और आव्रजन (इमिग्रेशन) से जुड़े फैसले उसके संप्रभु अधिकार के दायरे में आते हैं, और हम इसका सम्मान करते हैं।”
हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत सरकार अपने नागरिकों की परेशानियों को अनसुना नहीं करेगी। उन्होंने कहा, “जब भी हमारे संज्ञान में कोई ऐसा मामला आता है जहां वैध यात्रियों, छात्रों या पेशेवरों को वीजा प्रक्रिया में कठिनाई हो रही है, तो हम तुरंत अमेरिकी अधिकारियों और अमेरिकी पक्ष के संपर्क में आते हैं। हम उनकी समस्याओं को कम करने के लिए इस मुद्दे को मजबूती से उठाते हैं।”

























