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भारतीय नोटों पर महात्मा गांधी की तस्वीर कब और क्यों छपी?

केंद्र सरकार की मंजूरी मिलने के बाद आरबीआई ने वर्ष 1996 में आधिकारिक रूप से ‘महात्मा गांधी सीरीज’ लॉन्च की। इसके बाद से जारी होने वाले सभी प्रमुख बैंक नोटों पर महात्मा गांधी की तस्वीर को मुख्य डिजाइन तत्व के रूप में शामिल किया जाने लगा। आज भी भारतीय मुद्रा की पहचान इसी सीरीज से जुड़ी हुई है।

किसके फैसले से भारतीय करेंसी पर आई गांधी जी की तस्वीर?

HIGHLIGHTS

  • नोटों पर गांधी जी की तस्वीर क्यों?
  • भारतीय करेंसी पर गांधी कब आए?
  • किसने चुनी गांधी जी की तस्वीर?
  • नोटों पर गांधी की कहानी
  • भारतीय मुद्रा का बड़ा बदलाव

Indian Currency: भारतीय करेंसी नोटों पर छपी महात्मा गांधी की तस्वीर देश की सबसे पहचान योग्य प्रतीकों में से एक बन चुकी है। आज भारत में प्रचलन में मौजूद लगभग हर बैंक नोट पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की तस्वीर दिखाई देती है। हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि भारतीय नोटों पर गांधी जी की तस्वीर हमेशा से नहीं छपती थी। एक समय ऐसा भी था जब भारतीय मुद्रा पर ब्रिटिश सम्राटों की तस्वीरें हुआ करती थीं और आजादी के बाद भी कई वर्षों तक पुराने नोट चलन में बने रहे। आखिर भारतीय नोटों पर महात्मा गांधी की तस्वीर कब और क्यों छापी गई? इसका फैसला किसने लिया था? आइए जानते हैं इसका पूरा इतिहास।

1995 में लिया गया था अहम फैसला

भारतीय बैंक नोटों पर महात्मा गांधी की तस्वीर को स्थायी रूप से शामिल करने का अंतिम फैसला भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने लिया था। दरअसल, 13 जुलाई 1995 को आरबीआई ने केंद्र सरकार को एक प्रस्ताव भेजा था, जिसमें नई करेंसी सीरीज जारी करने और महात्मा गांधी की तस्वीर को प्रमुख पहचान के रूप में शामिल करने की सिफारिश की गई थी।

केंद्र सरकार की मंजूरी मिलने के बाद आरबीआई ने वर्ष 1996 में आधिकारिक रूप से ‘महात्मा गांधी सीरीज’ लॉन्च की। इसके बाद से जारी होने वाले सभी प्रमुख बैंक नोटों पर महात्मा गांधी की तस्वीर को मुख्य डिजाइन तत्व के रूप में शामिल किया जाने लगा। आज भी भारतीय मुद्रा की पहचान इसी सीरीज से जुड़ी हुई है।

आजादी से पहले नोटों पर छपते थे ब्रिटिश राजाओं के चित्र

भारत में ब्रिटिश शासन के दौरान जारी होने वाले नोटों पर ब्रिटिश सम्राटों की तस्वीरें छपी होती थीं। अलग-अलग समय में किंग जॉर्ज पंचम (George V) और बाद में किंग जॉर्ज षष्ठम (George VI) की तस्वीरें भारतीय मुद्रा का हिस्सा रहीं।

इन नोटों का उद्देश्य केवल मुद्रा का लेन-देन नहीं था, बल्कि वे ब्रिटिश साम्राज्य की सत्ता और नियंत्रण का भी प्रतीक थे। उस समय भारत ब्रिटेन का उपनिवेश था, इसलिए मुद्रा पर ब्रिटिश राजा की तस्वीर होना स्वाभाविक माना जाता था।

आजादी के बाद भी कुछ समय तक चलते रहे पुराने नोट

15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हो गया, लेकिन देश की मुद्रा व्यवस्था में तुरंत बदलाव नहीं किया जा सका। नए नोटों के डिजाइन तैयार करने, उनकी छपाई और वितरण की प्रक्रिया में समय लगता है।

यही कारण था कि आजादी के बाद लगभग दो वर्षों तक किंग जॉर्ज VI की तस्वीर वाले नोट भारतीय बाजार में चलते रहे। हालांकि सरकार और रिजर्व बैंक जल्द ही भारतीय पहचान वाली नई मुद्रा जारी करने की तैयारी में जुट गए थे।

1949 में अशोक स्तंभ ने ली ब्रिटिश राजा की जगह

भारतीय मुद्रा के इतिहास में पहला बड़ा बदलाव वर्ष 1949 में देखने को मिला। इसी साल भारत सरकार ने एक रुपये के नए नोट जारी किए, जिन पर ब्रिटिश राजा की तस्वीर की जगह सारनाथ स्थित अशोक स्तंभ को स्थान दिया गया।

अशोक स्तंभ को राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया गया था और इसे भारतीय गणराज्य की पहचान माना गया। मुद्रा पर इसका इस्तेमाल यह संदेश देने के लिए भी किया गया कि भारत अब पूरी तरह स्वतंत्र राष्ट्र है और उसकी अपनी राष्ट्रीय पहचान है।

इसके बाद कई दशकों तक भारतीय नोटों पर अशोक स्तंभ ही प्रमुख प्रतीक के रूप में दिखाई देता रहा।

महात्मा गांधी की तस्वीर पहली बार कब छपी?

भारतीय करेंसी पर महात्मा गांधी की तस्वीर पहली बार वर्ष 1969 में दिखाई दी थी। यह वर्ष गांधी जी की जन्मशताब्दी का था और इस अवसर पर भारतीय रिजर्व बैंक ने एक विशेष स्मारक (Commemorative) नोट जारी किया था।

इस विशेष नोट पर महात्मा गांधी की तस्वीर के साथ सेवाग्राम आश्रम का चित्र भी छापा गया था। हालांकि यह एक स्मारक नोट था और इसे नियमित बैंक नोटों की तरह बड़े पैमाने पर जारी नहीं किया गया था।

इसलिए उस समय महात्मा गांधी भारतीय मुद्रा की स्थायी पहचान नहीं बने थे।

1987 में पहली बार नियमित नोट पर दिखे गांधी जी

महात्मा गांधी की तस्वीर पहली बार नियमित रूप से इस्तेमाल होने वाले बैंक नोट पर अक्टूबर 1987 में दिखाई दी। उस समय भारतीय रिजर्व बैंक ने 500 रुपये का नया नोट जारी किया था।

इस नोट पर गांधी जी की मुस्कुराती हुई तस्वीर छपी थी, जिसे लोगों ने काफी पसंद किया। हालांकि उस समय भी अन्य मूल्यवर्ग के नोटों पर अशोक स्तंभ का ही उपयोग किया जाता था।

यह प्रयोग बाद में पूरी करेंसी व्यवस्था के लिए आधार साबित हुआ।

महात्मा गांधी सीरीज शुरू करने की जरूरत क्यों पड़ी?

1990 के दशक में भारत में नकली नोटों की समस्या तेजी से बढ़ रही थी। इसके अलावा वैश्विक स्तर पर मुद्रा सुरक्षा तकनीकों में भी बड़े बदलाव आ रहे थे। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंक नोटों को अधिक सुरक्षित और आधुनिक बनाने का निर्णय लिया।

नई सीरीज में बेहतर सुरक्षा फीचर्स, वॉटरमार्क, सिक्योरिटी थ्रेड और आधुनिक प्रिंटिंग तकनीकों को शामिल किया गया। साथ ही ऐसी पहचान की जरूरत थी जो पूरे देश का प्रतिनिधित्व करे और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी आसानी से पहचानी जा सके।

महात्मा गांधी को उनकी राष्ट्रीय भूमिका, स्वतंत्रता संग्राम में योगदान और विश्वव्यापी पहचान के कारण इस नई श्रृंखला का चेहरा चुना गया।

1996 की महात्मा गांधी सीरीज ने बदल दी भारतीय मुद्रा की पहचान

वर्ष 1996 में लॉन्च की गई महात्मा गांधी सीरीज भारतीय मुद्रा के इतिहास में सबसे बड़ा बदलाव साबित हुई। इस सीरीज के तहत 10, 20, 50, 100, 500 और बाद में अन्य मूल्यवर्ग के नोटों पर महात्मा गांधी की तस्वीर को प्रमुख स्थान दिया गया।

गांधी जी की मुस्कुराती हुई तस्वीर भारतीय नोटों की नई पहचान बन गई। इसके साथ ही सुरक्षा फीचर्स को भी मजबूत किया गया, जिससे नकली नोटों पर नियंत्रण पाने में मदद मिली।

आज, चाहे 10 रुपये का नोट हो या 500 रुपये का, महात्मा गांधी की तस्वीर भारतीय मुद्रा की सबसे महत्वपूर्ण और स्थायी पहचान बनी हुई है। यह केवल एक तस्वीर नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संघर्ष, लोकतांत्रिक मूल्यों और राष्ट्रीय एकता का प्रतीक भी है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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