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वसई-विरार: क्या सिर्फ वोट बैंक हैं उत्तर भारतीय? सत्ता मिलते ही क्यों बदल जाता है चेहरा?

Vasai-Virar News: जिस समाज के दम पर यहाँ की सत्ता बनती है, उस समाज के युवाओं को क्यों नजरअंदाज किया जाता है? क्या वसई-विरार की जमीन पर पैदा हुआ एक युवा अपनी ही सरकारी व्यवस्था में विदेशी की तरह महसूस करेगा? यह अन्याय है, और यह सीधे-सीधे देश की संविधानिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।

वसई-विरार में उत्तर भारतीय समाज: वोट बैंक या वास्तविक भागीदार?

HIGHLIGHTS

  • सत्ता बदलते ही क्यों बदल जाता है रवैया?
  • उत्तर भारतीय समाज की अनसुनी आवाज़
  • वोट के समय सम्मान, बाद में उपेक्षा क्यों?
  • क्या उत्तर भारतीय सिर्फ चुनावी गणित हैं?
  • सत्ता में भागीदारी या सिर्फ दिखावा?

Vasai-Virar News: वसई-विरार महानगरपालिका क्षेत्र आज महाराष्ट्र का एक ऐसा शहर बन चुका है, जहाँ हर चौराहे, हर गली और हर मोहल्ले में उत्तर भारतीय समाज की झलक दिखती है। लाखों की आबादी, जिसने इस शहर को अपना पसीना बहाकर बसाया है, जिसने यहाँ की अर्थव्यवस्था को नई ऊँचाइयाँ दी हैं, वही समाज आज एक ऐसे सवाल के सामने खड़ा है जिसका कोई सीधा जवाब नहीं मिल रहा।

सवाल है- क्या हम सिर्फ वोट बैंक हैं?
चुनाव के समय तक हम ‘आशीर्वाद’ होते हैं और नतीजे आते ही क्यों ‘श्राप’ बन जाते हैं? वसई-विरार के हालात आज इसी दर्द को बयान कर रहे हैं।

सत्ता की सीढ़ी और उत्तर भारतीय चेहरे

इस बार के नगर निकाय चुनावों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला। लगभग सभी राजनीतिक दलों ने उत्तर भारतीय चेहरों को आगे किया। टिकटें बाँटी गईं, प्रचार किया गया और जनता के बीच पहुँचा गया। उत्तर भारतीय समाज ने, जो हमेशा से अपने हक के लिए आवाज उठाता रहा है और यह अपने नुमाइंदों पर भरोसा जताया। कई उत्तर भारतीय नगरसेवक जीतकर चुनकर आए।

लेकिन, सत्ता मिलते ही तस्वीर बदल गई। जिन नेताओं ने गली-गली में घर-घर जाकर दरवाजे खटखटाए, वो आज उन्हीं दरवाजों से दूर हो गए हैं। सवाल यह उठता है कि जब पार्टियों को जीत के लिए उत्तर भारतीय समाज के वोटों की जरूरत होती है, तो हम राजनीति का ‘केंद्र’ हो जाते हैं, लेकिन सरकार बनते ही हम ‘पराधीन’ क्यों हो जाते हैं?

आशीर्वाद से श्राप बनने का सफर

वसई-विरार में उत्तर भारतीयों की पीड़ा कोई नई नहीं है, लेकिन हाल के दिनों में यह और गहरा गई है। चुनाव से पहले तक जो समाज नेताओं के लिए ‘जनता’ था, वह आज एक ‘समस्या’ बनकर सामने आ रहा है।

यह बड़ा ही दुखद है कि सत्ता में आने के बाद उत्तर भारतीयों के हितों की कोई सुध नहीं ली जाती। जो मकान दशकों से उनके हैं, वह अचानक ‘अवैध’ घोषित कर दिए जाते हैं। जिन दुकानों और धंधों से लाखों परिवारों का गुजर बसर होता है, वे एक झटके में ‘अवैध’ करार दिए जाते हैं। क्या यह इतिहास का सबसे बड़ा विरोधाभास नहीं है कि जिस शहर को बसाने वालों के घर ही अवैध हो जाते हैं?

हिंसा और चुप्पी का खेल

सबसे भयावह पहलू यह है कि उत्तर भारतीयों के खिलाफ हिंसा को राजनीतिक शिष्टाचार से लपेट दिया जाता है। खुलेआम उत्तर भारतीयों को मारा जाता है, उनका उत्पीड़न किया जाता है, और कोई भी पार्टी उनके लिए खड़ी नहीं होती।

कुछ लोग सत्ता की छतरी के नीचे खुलेआम उत्तर भारतीयों को यहाँ से ‘मारकर भगाने’ की बात करते हैं। नफरत की भाषा बोली जाती है। लेकिन ऐसी स्थिति में आम आदमी को देखने के लिए कोई आमदार, खासदार या नगरसेवक सामने नहीं आता। वोट के समय ‘भाई-भाई’ वाला नारा लगाने वाले नेता, जब उसी भाई की जान पर बन आती है, तो वो अपने आशियानों में दुबक जाते हैं।

क्या इस समाज की आवाज सुनने वाला कोई नहीं है? क्या यह समाज चुनाव के समय ही सबको याद आता है?

रोजगार में भेदभाव: भविष्य का संकट

एक और गंभीर मुद्दा है, जो इस समाज के भविष्य को सबसे ज्यादा प्रभावित कर रहा है- और वह है सरकारी नौकरियों में भेदभाव। वसई-विरार में ऐसे लाखों युवा हैं जिनका जन्म यहीं हुआ है। उन्होंने यहीं पढ़ाई की, यहीं खेले, उनकी संस्कृति और भाषा महाराष्ट्र के साथ मिली-जुली है। फिर भी, जब सरकारी नौकरियों की बात आती है, तो उन्हें वंचित कर दिया जाता है।

जिस समाज के दम पर यहाँ की सत्ता बनती है, उस समाज के युवाओं को क्यों नजरअंदाज किया जाता है? क्या वसई-विरार की जमीन पर पैदा हुआ एक युवा अपनी ही सरकारी व्यवस्था में विदेशी की तरह महसूस करेगा? यह अन्याय है, और यह सीधे-सीधे देश की संविधानिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है।

कब बंद होगा यह अत्याचार?

यह बात अब बस एक आरोप नहीं रह गई है, बल्कि एक पीड़ा की चीख बन चुकी है। उत्तर भारतीय समाज अब यह समझ चुका है कि उसका भावनात्मक शोषण हो रहा है। वोट के लिए लाल-कालीन बिछाया जाता है और अधिकार की माँग करने पर लाठियाँ भांजी जाती हैं।जिम्मेदार नागरिक के रूप में हम सवाल पूछते हैं कि क्या ये समाज सिर्फ वोट बैंक है? क्या इस समाज का भविष्य सिर्फ राजनीतिक स्वार्थों के लिए कुर्बान होता रहेगा?

वसई-विरार के उत्तर भारतीय समाज का यह संदेश स्पष्ट है- अब बस भी करो। हम अपने हक के लिए आवाज उठाएंगे। चाहे वह अपने घर की सुरक्षा का मुद्दा हो, रोजगार का अधिकार हो या फिर शारीरिक सुरक्षा। यह लड़ाई किसी एक इलाके या समुदाय की नहीं है, यह आत्मसम्मान की लड़ाई है। वसई-विरार पूछ रहा है कि आखिर सत्ता पाने के बाद इस समाज के साथ अन्याय क्यों किया जाता है?

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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