Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana: महाराष्ट्र के वर्धा जिले में इस वर्ष खरीफ मौसम के दौरान केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी ‘प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ को लेकर किसानों के बीच अजीब उदासीनता देखी जा रही है। प्राकृतिक आपदाओं जैसे बाढ़, सूखा या अन्य मौसमी प्रकोपों से फसलों को होने वाले नुकसान की भरपाई के लिए शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य किसानों को आर्थिक सुरक्षा कवच प्रदान करना है। लेकिन, जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।
वर्तमान खरीफ सीजन के लिए फसल बीमा कराने की अंतिम तिथि 31 जुलाई निर्धारित की गई है। इसके बावजूद 17 जुलाई की तिथि तक पूरे जिले में महज 13,425 किसान ही इस योजना के तहत अपना पंजीकरण करा पाए हैं। ये आंकड़े चिंताजनक हैं और साफ इशारा करते हैं कि इस बार बड़ी तादाद में कृषक इस सरकारी बीमा योजना से किनारा कर रहे हैं।
आंकड़ों का सच: मात्र 2.44 प्रतिशत ही हुआ कवरेज
वर्धा जिले में कृषि विभाग के रिकॉर्ड के अनुसार, यहां लगभग 27 हजार 68 ऋणी और गैर-ऋणी किसान मौजूद हैं। लेकिन अब तक जो पंजीकरण हुआ है, उसके मद्देनजर सिर्फ 29,856.02 हेक्टेयर क्षेत्रफल को ही फसल बीमा का लाभ मिल पा रहा है। यदि इसे प्रतिशत में समझें, तो यह जिले के कुल निर्धारित लक्ष्य का केवल 2.44 प्रतिशत है।
पिछले वर्ष की तुलना करें तो तस्वीर और भी स्पष्ट हो जाती है। गत वर्ष के खरीफ सीजन में जिले के 36,283 किसानों ने बीमा कराया था, जबकि इस साल यह संख्या घटकर आधे से भी कम हो गई है।
किसानों के गुस्से की असली वजह: अधूरे मुआवजे का दर्द
किसानों का इस योजना से मुंह मोड़ने के पीछे कोई एक वजह नहीं, बल्कि पिछले सालों से जमा निराशा है। कृषि विभाग के ही आंकड़े मानें तो पिछले वर्ष खरीफ और रबी दोनों ही मौसमों में जिले के बड़ी संख्या में किसानों की फसलें 33 प्रतिशत से भी अधिक तबाह हुई थीं।
नियमों के मुताबिक, इतनी भारी क्षति होने पर उन्हें बीमा क्लेम (दावा) का पूरा पैसा मिलना था। लेकिन धरातल पर कई किसानों को उनका अपेक्षित बीमा दावा नहीं मिला। इस भेदभाव और रुकावट भरी प्रक्रिया ने किसानों के मन में योजना के प्रति नाराजगी पैदा कर दी है, जिसका असर इस वर्ष कम रजिस्ट्रेशन के रूप में सामने आ रहा है।
वहीं, दूसरी ओर प्रकृति भी किसानों के साथ अच्छा व्यवहार नहीं कर रही है। जिले में 1 और 2 जुलाई को हुई बारिश के बाद से आसमान सूखा है। लगातार दो बारिश न होने की वजह से खेतों में बोई गई नई फसलें सूखने की कगार पर पहुंच गई हैं।
जिन किसानों के पास अपने खेतों तक पानी पहुंचाने के आधुनिक या पारंपरिक सिंचाई के साधन मौजूद हैं, वे किसी तरह अपनी फसलों को बचाने की जद्दोजहद में लगे हैं। लेकिन जो किसान पूरी तरह से मौसम (बारिश) पर निर्भर करते हैं, वे इस सूखे से बेहद चिंतित और मजबूर नजर आ रहे हैं। ऐसे में बीमा कराने की जरूरत तो बहुत थी, लेकिन पिछले अनुभवों ने किसानों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
खरीफ सीजन: प्रीमियम दरें और बीमा कवरेज
वर्धा जिले में ‘उत्पादन आधारित संशोधित प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना’ लागू है। इस सीजन में ज्वार, तुअर (अरहर), मूंग, सोयाबीन और कपास जैसी प्रमुख फसलों को इसके दायरे में रखा गया है। विभाग द्वारा विभिन्न फसलों के लिए प्रीमियम और बीमा राशि इस प्रकार तय की गई है:
- ज्वार (Jowar): प्रति हेक्टेयर 660 रुपये का प्रीमियम देकर 22,000 रुपये का बीमा कवर लिया जा सकता है।
- मूंगफली (Groundnut): 900 रुपये प्रति हेक्टेयर प्रीमियम पर 45,000 रुपये का बीमा संरक्षण मिलेगा।
- सोयाबीन (Soybean): महज 58 रुपये प्रति हेक्टेयर के प्रीमियम पर 58,000 रुपये का बीमा लाभ दिया जा रहा है।
- तुअर/अरहर (Tur): 47 रुपये प्रति हेक्टेयर के प्रीमियम के बदले 47,000 रुपये का बीमा कवर।
- कपास (Cotton): 65 रुपये प्रति हेक्टेयर प्रीमियम अदा करने पर 65,000 रुपये तक का बीमा संरक्षण।
बीमा क्लेम के लिए जरूरी है 72 घंटे का नियम
जिन किसानों ने फसल बीमा कराया है, उनके लिए एक बेहद जरूरी सूचना है। यदि किसी भी प्रकृति प्रकोप (आंधी, बारिश या सूखा) से फसल को अचानक नुकसान पहुंचता है, तो किसान को इसकी जानकारी 72 घंटे के भीतर देना अनिवार्य है।
यह सूचना किसान कई माध्यमों से दे सकता है। इसमें संबंधित बीमा कंपनी का ऑफिस, बैंक शाखा, कृषि विभाग या राजस्व विभाग के अधिकारी, टोल-फ्री नंबर पर कॉल करना या सीधे ‘फसल बीमा ऐप’ (Crop Insurance App) के जरिए ऑनलाइन क्लेम दर्ज करना शामिल है। 72 घंटे के बाद दी गई सूचना पर अक्सर क्लेम रद्द कर दिया जाता है। इसी सूचना और बाद में हुए सर्वे के आधार पर नुकसान का आकलन करके योग्य किसानों के बैंक खातों में बीमा राशि ट्रांसफर की जाती है।


























