History of the India–Pakistan Border: दुनिया के नक़्शे पर भारत और पाकिस्तान की सीमा कोई आम रेखा नहीं है। यह दुनिया की सबसे संवेदनशील, सुरक्षित और विवादित सीमाओं में से एक है। यहाँ 24 घंटे सैनिक अलर्ट रहते हैं और हर समय तनाव का माहौल बना रहता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि लाखों लोगों की जिंदगी बदलने वाली इस सीमा को बनाने वाला शख्स भारत की मिट्टी पर कभी क़दम तक नहीं रखा था? उसने ना तो कभी यहाँ की संस्कृति को देखा, ना ही लोगों का दर्द महसूस किया। बस कुछ कागजों, नक़्शों और आंकड़ों के आधार पर उसने एक ऐसी लकीर खींच दी जो आज तक खून की नदियां बह रही है।
इस शख्स का नाम था सर सीरिल रैडक्लिफ, एक ब्रिटिश वकील, जिसे ब्रिटिश सरकार ने महज़ 5 हफ्ते का समय दिया था ताकि वह भारत और पाकिस्तान के बीच की सीमा को तय कर सके। आज से 76 साल पहले, साल 1947 में जब ब्रिटिश हुकूमत ने भारत छोड़ने का मान गए, तो मुस्लिम लीग की मांग थी कि देश को धार्मिक आधार पर बांटा जाए। हिंदू बहुल और मुस्लिम बहुल इलाकों को अलग करने की योजना बनी, लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि पंजाब और बंगाल जैसे प्रांतों की आबादी एक दूसरे में इतनी उलझी हुई थी कि सीमा खींचना एक सिरदर्द बन गया था।
जुलाई 1947: जब बैरिस्टर को मिली दो देशों की जिम्मेदारी
इस असंभव से लगने वाले काम के लिए अंग्रेजों ने सर सीरिल रैडक्लिफ को चुना, रैडक्लिफ एक अनुभवी बैरिस्टर ज़रूर थे, लेकिन भारत के भूगोल और सामाजिक संरचना के बारे में उनकी जानकारी शून्य के बराबर थी। उनके पास सिर्फ पुराने जनगणना (सेंसस) के रिपोर्ट, थके हुए नक्शे और कुछ कागजी आंकड़े थे। उन्हें 175,000 वर्ग मील के इलाके और 8.8 करोड़ लोगों को दो हिस्सों में बांटना था। रैडक्लिफ ने अपना काम दिल्ली में एक कमरे में बंदकर किया, बिना यह देखे कि वह लकीर किस खेत में जा रही है और किस घर को तोड़ रही है।
रैडक्लिफ ने दो अलग-अलग बॉर्डर कमीशन बनाए—एक पंजाब के लिए और दूसरा बंगाल के लिए। इनमें कांग्रेस और मुस्लिम लीग के सदस्य शामिल थे, लेकिन दोनों पक्षों में इतनी खींचतान थी कि कोई आम सहमति नहीं बन पा रही थी। आखिरकार, यह निर्णय रैडक्लिफ के हाथों में था। 5 हफ्ते की इस भागदौड़ में गलतियां होना लाज़िमी थीं। इतनी जल्दबाजी में सीमा खींची गई कि कई गांवों को दो हिस्सों में काट दिया गया। कहा जाता है कि ऐसे मामले सामने आए जहां एक ही परिवार के कुछ कमरे भारत में और कुछ पाकिस्तान में आ गए।
आजादी के बाद आई सीमा
17 अगस्त 1947 को रैडक्लिफ लाइन की घोषणा की गई, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। भारत 15 अगस्त को और पाकिस्तान 14 अगस्त को आजाद हो चुका था। यानी लोगों को पता भी नहीं था कि वे किस देश के नागरिक बन गए हैं। इस लकीर ने पंजाब को पूर्वी (भारत) और पश्चिमी (पाकिस्तान) में बांटा, जबकि बंगाल पूर्वी (पाकिस्तान/बांग्लादेश) और पश्चिमी (भारत) में बंटा। रैडक्लिफ लाइन की कुल लंबाई हजारों किलोमीटर थी, जिसने करोड़ों लोगों की जिंदगी पलट कर रख दी।
इस विभाजन ने इतिहास के सबसे खूनी और बड़े पलायन को जन्म दिया। अनुमान है कि इस दौरान 10 से 20 लाख लोगों की मौत हुई और 1.5 करोड़ से ज्यादा लोग विस्थापित हो गए। दंगे, हिंसा और बदले की आग में दोनों देश जल उठे। दिलचस्प बात यह है कि रैडक्लिफ खुद अपने इस फैसले से संतुष्ट नहीं थे। काम पूरा होते ही उन्होंने अपने सारे नक्शे और दस्तावेज जला दिए। उन्होंने इस काम के लिए कोई पुरस्कार या मानदेय भी नहीं लिया और जल्द ही इंग्लैंड लौट गए। बाद में उन्होंने स्वीकार किया था कि यह काम उनके लिए असंभव था और दोनों पक्षों से भारी दबाव था।
आज भी जी रहा है वह दर्द
आज भी वह बॉर्डर दोनों देशों के लिए सिरदर्द बना हुआ है। कश्मीर से लेकर सियाचिन और रण ऑफ कच्छ जैसे मुद्दे सीधे तौर पर उस बंटवारे और अधूरी खींची गई लकीर का परिणाम हैं। सर सीरिल रैडक्लिफ की कहानी हमें एक सबक देती है कि कैसे दूरबीन से बैठकर और जमीनी हकीकत से कटकर लिए गए फैसले किस हद तक विनाशकारी हो सकते हैं। एक व्यक्ति की कलम ने ना सिर्फ भूगोल बदला, बल्कि सदियों पुरानी सांस्कृतिक और सामाजिक जड़ों को भी तोड़ दिया, जिसका दर्द आज भी दोनों देश महसूस कर रहे हैं।























