लद्दाख के प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और शिक्षाविद सोनम वांगचुक को लेकर जारी राजनीतिक और प्रशासनिक घमासान में एक नया मोड़ आ गया है। दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल से किसी निजी अस्पताल में शिफ्ट करने संबंधी याचिका पर सुनवाई के बीच, उनकी पत्नी डॉ. गीतांजलि आंग्मो ने पूरी घटना को लेकर सरकार और अस्पताल प्रशासन के इरादों पर सवालिया निशान लगाए हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि सोनम की तबीयत बिगड़ने का जो बहाना बनाया जा रहा है, वह पूरी तरह से झूठा और बेबुनियाद है।
स्वास्थ्य बिगड़ने के दावों को खारिज करते हुए दिए चिकित्सा साक्ष्य
बता दें कि डॉ. गीतांजलि आंग्मो ने मीडिया से बातचीत करते हुए अस्पताल और पुलिस के ‘स्वास्थ्य चिंता’ वाले बयानों की कड़ी आलोचना की। उन्होंने चिकित्सा रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए साबित करने की कोशिश की कि सोनम वांगचुक की हालत पूरी तरह स्थिर थी। उन्होंने बताया, “पुलिस द्वारा अस्पताल ले जाए जाने से ठीक एक दिन पहले की शाम की मेडिकल रिपोर्ट्स बिल्कुल सामान्य थीं। उनका पोटैशियम लेवल 4.3 था और बाकी सभी शारीरिक मानक (पैरामीटर्स) नॉर्मल थे। अचानक सुबह उन्हें अस्पताल ले जाने के बाद पुलिस ने दावा किया कि उनका पोटैशियम लेवल 2.9 हो गया है, जो चिकित्सा विज्ञान के अनुसार रातों-रात इतनी गिरावट लाना संभव नहीं है।”
उन्होंने आगे आरोप लगाया कि जब उन्होंने स्वतंत्र जांच के लिए ब्लड सैंपल मांगा, तो अस्पताल प्रशासन ने जान-बूझकर 10 घंटे तक टालमटोल की। सुबह 10 बजे मांगा गया सैंपल रात 10:30 बजे तक नहीं दिया गया, जबकि तब तक बाहर की लगभग सभी प्रयोगशालाएं बंद हो चुकी थीं। डॉ. आंग्मो ने रात 12:30 बजे तक लैब तलाशकर खुद सैंपल टेस्ट करवाया, जिसमें पोटैशियम लेवल 3.6 निकला। उन्होंने पूछा कि अगर अस्पताल की ही रिपोर्ट में सुबह 2.9 और बाद में 3.4 आता है, तो यह आंकड़ों में हेराफेरी का प्रमाण नहीं तो और क्या है?
पुलिस की कार्रवाई पर उठाए सवाल
बता दें कि सोनम वांगचुक की पत्नी ने पुलिस के कामकाजी तरीके पर भी गंभीर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि अगर सरकार को सच में उनकी सेहत की चिंता थी, तो नागरिक पोशाक (सिविलियन ड्रेस) में पुलिस क्यों भेजी गई? उन्हें क्यों बेरहमी से उठाकर स्ट्रेचर पर डाला गया? डॉ. गीतांजलि ने कहा, “एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह तरीका कतई नहीं होता। प्रशासन को उचित तरीके से आकर चिकित्सा जांच करनी चाहिए थी और परिवार को सूचित करना चाहिए था। यह सब एक बहाना है, ये उनकी सेहत के लिए चिंतित नहीं हैं, बल्कि सिर्फ नौटंकी कर रहे हैं।”
प्रस्तावित मार्च से था सरकार को डर
डॉ. गीतांजलि आंग्मो ने इस पूरे घटनाक्रम के पीछे एक बड़ी राजनीतिक साजिश का आरोप लगाया। उन्होंने साफ कहा कि सरकार को असल में सोनम वांगचुक के प्रस्तावित मार्च से डर लग रहा था। “सरकार को डर था कि अगर सोनम कल (मार्च के दिन) सड़कों पर उतरे, तो सिर्फ दिल्ली ही नहीं, बल्कि पूरे देश से लाखों लोग उनके साथ जुड़ जाएंगे। इसी डर को कम करने के लिए उन्हें जबरदस्ती हिरासत में लिया गया है।”
उन्होंने चेतावनी दी कि सरकार का यह कदम उल्टा पड़ेगा। “सोनम की गैर-मौजूदगी में लोगों का जोश दोगुना हो जाएगा। आज देश में शिक्षा व्यवस्था, पुलिस बल, न्यायपालिका और मीडिया के दुरुपयोग को लेकर लोगों में गुस्सा है, और यह घटना उस गुस्से को और भी हाइलाइट कर रही है।”
अस्पताल का माहौल ‘जेल’ से कम नहीं
सफदरजंग अस्पताल में बने हालातों को लेकर उन्होंने कहा कि वहां का वातावरण किसी अस्पताल से कम और जेल से ज्यादा लगता है। डॉ. गीतांजलि ने बताया, “सोनम का ब्लड प्रेशर हमेशा 110/70 रहता है, लेकिन कल रात वो 125/85 हो गया। इसका कारण सिर्फ वहां का तनावपूर्ण माहूल है। कमरे के बाहर पुलिस तैनात है, कांच के दरवाजों से पुलिसवाले दिनभर निहार रहे हैं और कभी-कभी तो मेरे अंदर होने पर भी एक महिला कॉन्स्टेबल को अंदर खड़ा रहने दिया जाता है। मुझे ऐसा लगता है जैसे मैं जोधपुर जेल में हूं।”
उन्होंने यह भी खुलासा किया कि सोनम वांगचुक को उनके अपने विश्वसनीय चिकित्सकों से मिलने की अनुमति नहीं दी जा रही। अस्पताल प्रशासन का कहना है कि वे सरकारी अस्पताल हैं और उन्हें किसी निजी डॉक्टर से मिलने की जरूरत नहीं है। इतना ही नहीं, सोनम को उनकी टैबलेट और सैमसंग डिवाइस तक नहीं दिया गया है, ताकि वे लिख-पढ़ न सकें और बाहर की दुनिया से संपर्क टूटा रहे।
यह है ‘बिना आदेश की गैरकानूनी हिरासत’
डॉ. गीतांजलि आंग्मो ने कानूनी पहलू पर हमला बोलते हुए कहा कि जब भी परिवार पुलिस से इस बारे में कोई लिखित आदेश या वारंट मांगता है, तो पुलिस के पास कोई जवाब नहीं होता। उन्होंने कहा, “यह एक तरह से अनसेड (बिना आदेश वाली) और इल्लीगल (अवैध) डिटेंशन है। आज का दौर देश के लिए बेहद निराशाजनक है, जहां एक नागरिक को अपनी पसंद के अस्पताल में इलाज तक नहीं करवा सकता और सरकार बंदूक की नोक पर यह तय करे कि उसका इलाज कहां होगा।”
उनके इन आरोपों के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य को लेकर सरकार का दावा वाकई प्रामाणिक है, या फिर यह किसी बड़े लोकतांत्रिक अधिकार को दबाने का एक ढका हुआ हथियार है। अब इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट क्या रुख अपनाता है, इस पर सभी की नजरें टिकी हैं।


























