UP News: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी गर्मी तेज हो गई है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ‘मिशन-2027’ के बिगुल फूंक चुके हैं, जबकि भाजपा सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में सड़कों पर उतर चुकी है। इस बीच, सपा और भाजपा के बीच सिमटती यूपी की सियासत को त्रिकोणीय रूप देने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती एक नई रणनीति के साथ मैदान में उतरने की कवायद में जुट गई हैं।
बसपा के लिए 2027 का चुनाव सियासी वजूद को बचाए रखने का सवाल है। इसीको ध्यान में रखकर मायावती ने प्रदेश में हुई मतदाता सूची पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के नफा-नुकसान का गहन आकलन शुरू कर दिया है। इस आकलन के आधार पर ही अब पार्टी उम्मीदवारों का चयन करेगी।
एसआईआर के आंकड़ों पर टिकेगा कैंडिडेट सेलेक्शन का पैमाना
बसपा ने 2027 की तैयारी के तहत करीब 40-50 सीटों पर संभावित उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने की हरी झंडी दी थी और विधानसभा प्रभारी भी बनाए थे। हालांकि, एसआईआर अभियान के बाद मायावती ने अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, मायावती ने पिछले दिनों लखनऊ में हुई बैठक में अपनी 15 हजार बूथ कमेटियों से एसआईआर से जुड़ी विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। बसपा नेताओं का मानना है कि जिन पदाधिकारियों ने एसआईआर में सक्रिय भूमिका निभाकर पार्टी समर्थकों के नाम मतदाता सूची में बरकरार रखने का काम किया है, उन्हें टिकट चयन में प्राथमिकता दी जाएगी। मायावती ने प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल के माध्यम से सभी जिलों से रिपोर्ट तलब की है, खासकर उन क्षेत्रों की रिपोर्ट जहां बसपा के प्रभाव वाली जातियों के मतदाताओं की संख्या में कमी आई है।
जातिगत समीकरण के आधार पर बनेगा 4 नामों का पैनल
मायावती अपनी पुरानी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ को फिर से अपनाने की तैयारी में हैं। मिशन-2027 के तहत बसपा प्रत्येक विधानसभा सीट पर चार-चार दावेदारों का पैनल बना रही है।
पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, पहले सीट के जातीय समीकरण (Caste Chemistry) का आकलन किया जा रहा है। एसआईआर के आंकड़ों से यह पता लगाया जा रहा है कि किस सीट पर किस समाज के वोट बढ़े हैं और किनके घटे हैं। इसके बाद जोनल कोऑर्डिनेटर्स को उस खास जाति के उम्मीदवार की तलाश का टारगेट दिया जाता है। जोनल कोऑर्डिनेटर द्वारा बनाए गए चार नामों के पैनल में से मायावती खुद से किसी एक नाम पर मुहर लगाती हैं। इसके बाद उस उम्मीदवार को पहले विधानसभा क्षेत्र प्रभारी और फिर चुनाव के समय आधिकारिक प्रत्याशी घोषित कर दिया जाता है।
2007 के फॉर्मूले पर भरोसा, गठबंधन से राह मोड़ेंगे बसपा
सबसे खास बात यह है कि बसपा 2027 का चुनाव अकेले दम पर लड़ने की रणनीति पर काम कर रही है। बसपा प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने साफ कर दिया है कि पार्टी इस बार पारंपरिक गठबंधनों से अलग राह पर चलेगी और समय से पहले उम्मीदवारों की घोषणा की जाएगी।
दरअसल, मायावती 2007 के उस ऐतिहासिक फॉर्मूले को दोहराने की कोशिश में हैं, जिसके जरिए बसपा ने यूपी में प्रचंड बहुमत हासिल किया था। बसपा का फोकस एक बार फिर ‘दलित-ब्राह्मण-मुस्लिम’ (सर्वजन हिताय) समीकरण को मजबूत करने पर है। पार्टी की योजना के अनुसार, मुस्लिम और ब्राह्मण उम्मीदवारों को चुनावी मैदान में उतारा जाएगा, जबकि दलित वोट बैंक को संगठन के माध्यम से एकजुट किया जाएगा।
मायावती का नेताओं को संदेश
पिछले तीन महीने की समीक्षा बैठकों में मायावती लगातार नेताओं को यह संदेश दे रही हैं कि इस तिकड़ी (ब्राह्मण-मुस्लिम-दलित) के सहारे पार्टी 2027 में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करेगी। हालांकि, अभी सियासी विश्लेषकों के सामने बड़ा सवाल यही है कि क्या 2027 के बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य में मायावती बसपा को फिर से खड़ा कर पाएंगी? वर्तमान में मायावती लखनऊ से दिल्ली वापस आ गई हैं। अब उनका अगला फोकस दिल्ली से जुड़कर पश्चिमी यूपी के सियासी समीकरण को मजबूत करने और पुराने फॉर्मूले को धरातल पर उतारने पर होगा।























