यमन युद्ध में पाकिस्तान की एंट्री से भड़का ईरान

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के रक्षा समझौते पर ईरान ने यमन में दखल न देने की चेतावनी दी है। जानिए मक्का समझौते, सैन्य मदद और क्षेत्रीय तनाव से जुड़ी अहम बातें।

यमन संघर्ष पर ईरान की पाकिस्तान को चेतावनी, सऊदी की मदद पर बढ़ा विवाद

HIGHLIGHTS

  • सऊदी गठबंधन पर ईरान का हमला, पाकिस्तान निशाने पर
  • पाकिस्तान को यमन से दूर रहने की ईरान की चेतावनी
  • मक्का समझौते से क्यों नाराज हुआ ईरान, जानिए वजह
  • सऊदी की सुरक्षा में उतरेगा पाकिस्तान, ईरान बेचैन

यमन में हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन के बीच बढ़ते तनाव ने क्षेत्रीय राजनीति को फिर गरमा दिया है। सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुए रक्षा समझौते के सक्रिय होने के बाद ईरान ने पाकिस्तान को यमन के मामलों से दूर रहने की चेतावनी दी है। तेहरान का कहना है कि इस संघर्ष में किसी भी तरह का बाहरी हस्तक्षेप गंभीर नतीजे ला सकता है।

हाल के दिनों में यमन के हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब की राजधानी रियाद के हवाई अड्डे को निशाना बनाकर मिसाइल हमला किया। इसके बाद सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने यमन की राजधानी सना और हूती नियंत्रण वाले इलाकों में हवाई कार्रवाई तेज कर दी। इसी बीच पाकिस्तान और तुर्की की ओर से सऊदी अरब को सहायता देने की खबरों ने ईरान की चिंता बढ़ा दी है। हूतियों को ईरान का करीबी सहयोगी माना जाता है, हालांकि तेहरान उनके साथ अपने संबंधों की व्याख्या अलग-अलग मौकों पर करता रहा है।

मक्का समझौते के तहत क्या मदद मिलेगी?

रिपोर्टों के मुताबिक, सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की के बीच हुआ मक्का समझौता 5 अक्टूबर को अपने ऑपरेशनल चरण में पहुंचा। ईरान इंटरनेशनल की रिपोर्ट के अनुसार, समझौते के तहत पाकिस्तान और तुर्की सऊदी अरब को सैन्य, तकनीकी और खुफिया सहयोग दे सकते हैं। इसमें सऊदी अरब के भीतर सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करने में मदद भी शामिल बताई गई है।

हालांकि, उपलब्ध जानकारी के मुताबिक पाकिस्तानी और तुर्की सैनिक फिलहाल यमन में सीधे सैन्य हमलों या आक्रामक अभियानों में शामिल नहीं हैं। अधिकारियों ने भी कहा है कि उनकी भूमिका यमन में लड़ाई करने की नहीं होगी। सऊदी अरब में हजारों पाकिस्तानी सैनिकों की संभावित तैनाती की खबरों पर भी अभी कोई पुष्ट जानकारी सामने नहीं आई है।

ईरान ने पाकिस्तान को क्या कहा?

ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघई से जब सऊदी अरब में पाकिस्तानी सैनिकों की तैनाती की खबरों के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि तेहरान ने भी ऐसी अफवाहें सुनी हैं, लेकिन उसे उम्मीद है कि वे सही नहीं होंगी। उन्होंने चेताया कि क्षेत्र के देश यमन में दखल के संभावित नतीजों को समझते हैं।

बघई ने यह भी कहा कि ईरान सऊदी अरब को पाकिस्तान और तुर्की से मिलने वाली मदद के बारे में कई तरह की बातें सुन रहा है। उनकी उम्मीद है कि मक्का समझौते का इस्तेमाल मुस्लिम समुदाय के हितों के खिलाफ नहीं होगा। इस बयान से स्पष्ट है कि तेहरान समझौते को केवल द्विपक्षीय रक्षा सहयोग के रूप में नहीं, बल्कि यमन संघर्ष के व्यापक क्षेत्रीय संदर्भ में देख रहा है।

ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने भी पड़ोसी देशों से आत्मनिर्भरता और सच्चे भाईचारे पर आधारित नीति अपनाने की अपील की। उन्होंने मक्का समझौते का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया, लेकिन कहा कि ऐसे समझौते ईरान को रोक नहीं पाएंगे।

ईरानी नेताओं ने समझौते को बताया ‘कागजी’

ईरान के कुछ सांसदों और राजनीतिक नेताओं ने पाकिस्तान-तुर्की-सऊदी समझौते की उपयोगिता पर सवाल उठाए हैं। ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति समिति के सदस्य अहमद बख्शायेश ने इसे कागजी समझौता बताया। अलाउद्दीन बोरुजेर्दी ने कहा कि पाकिस्तान और तुर्की की भागीदारी उनके लिए नुकसानदेह हो सकती है और उन्हें यमन के इतिहास से सबक लेना चाहिए।

उनका तर्क है कि सऊदी अरब ने पहले भी यमन में कई वर्षों तक सैन्य अभियान चलाया, लेकिन उसे निर्णायक सफलता नहीं मिली। इसी आधार पर ईरानी नेताओं का कहना है कि बाहरी सैन्य सहयोग से संघर्ष का समाधान सुनिश्चित नहीं होगा। हालांकि, ये बयान ईरानी नेताओं के राजनीतिक आकलन हैं; समझौते के वास्तविक प्रभाव का पता उसके लागू होने और संबंधित देशों की कार्रवाई से ही चलेगा।

ईरानी सांसद इब्राहिम रेजाई ने भी कहा कि पाकिस्तान और तुर्की के साथ समझौता सऊदी अरब को सुरक्षा की गारंटी नहीं देता। उन्होंने सऊदी नेतृत्व से अपनी नीतियों की समीक्षा करने की बात कही और अमेरिकी समर्थन पर निर्भरता की आलोचना की।

पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका पर सवाल

ईरान की आलोचना तुर्की के मुकाबले पाकिस्तान पर अधिक केंद्रित दिखी है। इसकी एक वजह ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत में इस्लामाबाद की मध्यस्थ भूमिका बताई जा रही है। ईरानी सांसद अहमद नादेरी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर लिखा कि यदि पाकिस्तान यमन के लोगों के खिलाफ युद्ध में सऊदी अरब के साथ खड़ा होता है, तो उसे निष्पक्ष मध्यस्थ के बजाय क्षेत्रीय हस्तक्षेपकर्ता के रूप में देखा जा सकता है।

यह बयान पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक चुनौती खड़ी करता है। एक ओर इस्लामाबाद ईरान-अमेरिका तनाव में संवाद को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर सऊदी अरब के साथ रक्षा सहयोग उसके क्षेत्रीय संबंधों को प्रभावित कर सकता है। पाकिस्तान को इन दोनों भूमिकाओं के बीच संतुलन बनाना पड़ सकता है।

Sandhya Samay News

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