महाराष्ट्र के राजनीतिक और प्रशासनिक इतिहास में एक ऐसा बदलाव दर्ज हुआ है, जिसकी गूंज सत्ता के सबसे ऊंचे गलियारों से लेकर सड़क तक सुनाई दे रही है। राज्य सरकार ने 1975 से चले आ रहे एक अनुष्ठानिक और पुराने प्रशासनिक ढांचे को ताक पर रख दिया है।
इस बड़े बदलाव के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के पास अब ऐसी असाधारण शक्तियां हैं, जिसके चलते राजनीतिक विश्लेषक उन्हें ‘सुपर सीएम’ के तौर पर देखने लगे हैं। आइए समझते हैं कि यह पूरा मामला क्या है और यह महाराष्ट्र की राजनीति को किस दिशा में ले जा सकता है।

51 साल पुराने ढांचे का अंत और नई शुरुआत
सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा 14 अगस्त 2026 को ‘महाराष्ट्र शासकीय कार्य नियमावली, 2026’ (Maharashtra Government Transactions Rules, 2026) की अधिसूचना जारी की गई। यह नया कानूनी ढांचा लगभग पांच दशक पुराने नियमों की जगह ले रहा है। पहले जो व्यवस्था थी, उसमें प्रत्येक मंत्री अपने विभाग का स्वतंत्र प्रभारी होता था और उसके फैसलों में मुख्यमंत्री की भूमिका सीमित मानी जाती थी। लेकिन अब यह बदल चुका है।
क्या है यह ‘वीटो पावर’ और इसकी शर्तें?
नई नियमावली के तहत सबसे बड़ा बदलाव यह है कि मुख्यमंत्री को अब राज्य के किसी भी विभागीय मंत्री के फैसले को खारिज करने या पलटने का वीटो अधिकार हासिल हो गया है। हालांकि, सरकार ने इसे तानाशाही न बताया जाए, इसके लिए एक शर्त भी जोड़ी गई है।
मुख्यमंत्री को यह वीटो पावर का इस्तेमाल करते समय लिखित रूप से यह दर्ज करना अनिवार्य होगा कि उनका यह कदम ‘जनहित’ में उठाया जा रहा है। फिलहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि जनहित की इस परिभाषा का इस्तेमाल प्रशासनिक सुधार के लिए होता है या राजनीतिक नियंत्रण के लिए।
2023 की कानूनी हार ने दिखाया रास्ता
इस संवैधानिक और प्रशासनिक बदलाव के पीछे एक दिलचस्प कानूनी घटनाक्रम छिपा है। वर्ष 2022 में, जब एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री थे, उन्होंने अपने ही गठबंधन के एक मंत्री के विभागीय फैसले पर रोक लगा दी थी। इस मामले को बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच के समक्ष चुनौती दी गई।
2023 में उच्च न्यायालय ने मुख्यमंत्री के इस कदम को न सिर्फ खारिज किया, बल्कि साफ तौर पर कहा कि 1975 के नियमों के दायरे में कोई भी मुख्यमंत्री अपने सहयोगी मंत्रियों के स्वतंत्र फैसलों में दखल नहीं दे सकता। इस न्यायिक झटके ने सरकार को विचार करने पर मजबूर किया और उसी कानूनी खामी को पाटने के लिए अब 2026 की नई नियमावली को जन्म दिया गया है, जो मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप को पूरी तरह कानूनी बनाती है।
फाइलें मंगाने की ताकत और ‘सर्कुलेशन’ का दौर
वीटो पावर के अलावा, नए नियमों ने मुख्यमंत्री कार्यालय की नौकरशाही पर पकड़ को भी अभूतपूर्व बना दिया है। अब देवेंद्र फडणवीस चाहें तो किसी भी विभाग से कोई भी संवेदनशील फाइल, दस्तावेज या प्रस्ताव सीधे मंगा सकते हैं। संबंधित विभाग के मंत्री और अधिकारियों (सचिव) के लिए यह फाइलें सीएमओ को सौंपना अब विफल्यतापूर्ण हो गया है।
इसके साथ ही, कैबिनेट की औपचारिक बैठक बुलाने की झंझट को भी दूर किया गया है। नए प्रावधानों के मुताबिक, अगर मुख्यमंत्री को किसी मामले में तत्काल फैसला लेना हो, तो वे कैबिनेट की बैठक बुलाए बिना ही ‘सर्कुलेशन’ (रिकॉर्ड नोटिस) के जरिए फैसले को अमल में ला सकते हैं।
वित्त विभाग की नई भूमिका
इस बदलाव का एक और पहलू यह भी है कि अब किसी भी विभाग द्वारा वित्तीय आदेश पास करने से पहले वित्त विभाग की पूर्व सहमति अनिवार्य होगी। इससे मंत्रियों की स्वतंत्रता में और भी कमी आएगी और वित्तीय अनुशासन को सख्ती से लागू किया जा सकेगा।
महायुति गठबंधन के लिए ‘अग्निपरीक्षा’
प्रशासनिक दृष्टिकोण से इस कदम को तेजी और पारदर्शिता लाने वाला बताया जा रहा है, लेकिन राजनीतिक तौर पर यह महायुति गठबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी कर रहा है। यह बात सभी जानते हैं कि जिस तरह की ‘वीटो पावर’ अब देवेंद्र फडणवीस के हाथ में आई है, वैसी शक्ति उनके पूर्ववर्ती एकनाथ शिंदे के पास कभी नहीं थी।
शिंदे गुट और अजित पवार के एनसीपी दोनों को ही अब यह समझना होगा कि किसी भी विभागीय फैसले पर सीएम का ‘जनहित’ वाला पेंच न लग जाए। विश्लेषकों की मानें तो सत्ता का पूरा तकाजा अब मुख्यमंत्री के कार्यालय की ओर झुक गया है, जिससे गठबंधन धर्मनिरपेक्षता पर दबाव बढ़ना तय है।
























