Ghaziabad News: आत्मनिर्भरता हर इंसान का मौलिक अधिकार है, लेकिन जब बात दिव्यांगजनों की होती है, तो यह अधिकार कई बार ढेर सारी बाधाओं से घिरा होता है। भारत में दिव्यांगजनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती रोजगार की कमी ही है। नौकरी या रोजगार न होने की स्थिति में उन्हें न केवल गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है, बल्कि रोजमर्रा की जरूरतों के लिए दूसरों पर मोहरा बनकर रहना पड़ता है।
गाजियाबाद जिला प्रशासन ने इस समस्या को ध्यान में रखते हुए एक ऐसी अनूठी पहल की है, जिसे आज पूरे देश में अपनाने की जरूरत है। गाजियाबाद प्रशासन ने दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए उन्हें स्थायी रूप से ‘खोखे’ (छोटी दुकानें) उपलब्ध कराने का अभियान शुरू किया है, जहां वे बिना किसी डर के अपना व्यवसाय चला सकें।
अतिक्रमण हटाओ अभियान का बन रहा था दुश्मन
इस पहल की शुरुआत एक बहुत ही व्यावहारिक समस्या से हुई। दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के पास लगातार शिकायतें पहुंच रही थीं कि कई दिव्यांग जन अपने परिवार का पेट पालने के लिए चाय-नाश्ता, सामान्य स्टोर (जनरल स्टोर) या अन्य छोटी चीजें बेचकर गुजारा करते हैं। लेकिन जब भी नगर निगम या अन्य एजेंसियां ‘अतिक्रमण हटाओ’ अभियान चलाती हैं, तो इन दिव्यांगों की छोटी-मोटी दुकानों को भी बुलडोजर से ध्वस्त कर दिया जाता है।
इस तरह की कार्रवाई से उनका एकमात्र आजीविका का स्रोत एक झटके में खत्म हो जाता है और वे फिर से बेरोजगारी के अंधेरे में धकेल दिए जाते हैं। पीड़ित दिव्यांगों ने विभाग से एक सरल सी मांग रखी थी—उन्हें ऐसा स्थान दिया जाए जो स्थायी हो और जहां किसी भी सरकारी कार्रवाई का भय न हो।
जिलाधिकारी के निर्देश पर विभाग ने बदली तस्वीर
दिव्यांगों की इन गंभीर शिकायतों को गंभीरता से लेते हुए गाजियाबाद के जिलाधिकारी ने दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग को तुरंत प्रभावी कदम उठाने के सख्त निर्देश दिए। इसके बाद विभाग ने शहर के विभिन्न हिस्सों में ऐसे स्थानों की पहचान की, जहां इन दुकानों को लगाया जा सके।
सबसे खास बात यह रही कि विभाग ने सिर्फ जगह दिखाकर ही नहीं छोड़ा, बल्कि संबंधित विभागों (जैसे नगर निगम, विकास प्राधिकरण आदि) से आपसी समन्वय कर इन दुकानों को चलाने की ‘प्रशासनिक और कानूनी अनुमति’ भी दिलवाई। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि अब भविष्य में चाहे कितना भी अतिक्रमण हटाओ अभियान चले, इन दिव्यांगों की दुकानों को नहीं छुआ जाएगा।
65 को मिली स्थायी अनुमति, 40 की उम्मीद
गाजियाबाद के जिला दिव्यांगजन सशक्तिकरण अधिकारी अंशुल चौहान के अनुसार, अब तक 65 पात्र दिव्यांगजनों को स्थायी दुकान (खोखा) लगाने के लिए आधिकारिक अनुमतियां प्रदान की जा चुकी हैं। सभी लाभार्थियों को व्यवसाय संचालन के लिए जरूरी सभी प्रशासनिक मंजूरियां दे दी गई हैं।
अधिकारियों का मानना है कि यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि 65 परिवारों का भविष्य सुरक्षित होना है। विभाग के पास अभी और भी आवेदन आ चुके हैं, जिनकी जांच तेजी से चल रही है। जल्द ही 40 अन्य दिव्यांग भाइयों-बहनों को भी इस योजना का लाभ मिलने की पूरी उम्मीद है।
15 हजार से ऊपर की मासिक आय का लक्ष्य
आर्थिक तौर पर देखा जाए तो यह पहल काफी कारगर साबित हो रही है। विभागीय सर्वेक्षण और अनुमान के मुताबिक, जो दिव्यांग जन इन छोटी दुकानों को संचालित कर रहे हैं, वे प्रति महीने आसानी से 15,000 रुपये या उससे अधिक की आय अर्जित करने में सक्षम हैं।
इस आय से दो बड़े बदलाव आ रहे हैं। पहला, दिव्यांग व्यक्ति आत्मनिर्भर हो रहे हैं और दूसरा, उनकी यह सफलता समाज के अन्य दिव्यांग लोगों के लिए प्रेरणा का काम कर रही है। जो लोग अब तक सरकारी सहायता पर ही निर्भर रहने को मजबूर थे, वे अब खुद भी छोटे व्यवसाय शुरू करने के लिए आगे आ रहे हैं।
तुलसी पाल का संघर्ष और विजय
इस पहल की जमीनी सफलता को समझने के लिए गाजियाबाद के काशीराम आवास योजना, प्रताप विहार निवासी 38 वर्षीय तुलसी पाल की कहानी काफी प्रेरणादायक है। बचपन से ही पोलियो की बीमारी ने तुलसी पाल को 75% दिव्यांग बना दिया और उनके दोनों पैर इस भयानक बीमारी की चपेट में आ गए थे। हालांकि, लंबे इलाज के बाद उनका एक पैर थोड़ा ठीक हो सका, लेकिन दूसरा पैर आज भी पूरी तरह से पोलियो का शिकार है।
दो बेटों के पिता होने के नाते तुलसी पर परिवार की जिम्मेदारी का बोझ था। उन्होंने कभी हार नहीं मानी और लगातार आत्मनिर्भर बनने के रास्ते तलाशते रहे। जब जिला प्रशासन ने यह अभियान शुरू किया, तो तुलसी की पहचान हुई और उन्हें सिद्धार्थ विहार स्थित ‘गौर चौक’ पर खोखा लगाने की पूरी तरह से वैध और स्थायी अनुमति दी गई।
आज तुलसी पाल अपने इस छोटे से खोखे से अपने परिवार का सम्मानजनक भरण-पोषण कर रहे हैं। एक आत्मनिर्भर व्यक्ति के रूप में उनकी खुशी देखते ही बनती है। तुलसी कहते हैं, “स्थिति चाहे कितनी भी विपरीत क्यों न हो, कभी भी प्रयास करना बंद नहीं करना चाहिए। आज मैं अपने परिवार की जिम्मेदारी बखूबी उठा रहा हूं और मेरी उम्मीद है कि जल्द ही मैं प्रति महीने 15 से 20 हजार रुपये तक की आय आसानी से कर लूंगा।”






















