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दिल्ली की सड़कों पर दिखा आदिवासी परंपराओं का अद्भुत रंग

Delhi News: शोभायात्रा का शुभारंभ राजघाट स्थित गांधी दर्शन संग्रहालय के प्रांगण से हुआ। यह स्थान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों और उनके अहिंसक संघर्ष का प्रतीक है, जबकि भगवान बिरसा मुंडा ने विदेशी शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का बिगुल बजाया था।

भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर दिल्ली में भव्य आदिवासी शोभायात्रा

HIGHLIGHTS

  • राजघाट से लाल किला तक गूंजा आदिवासी संस्कृति का गौरव
  • ‘धरती आबा’ बिरसा मुंडा को दिल्ली ने दी ऐतिहासिक श्रद्धांजलि
  • जनजातीय गौरव दिवस पर राजधानी बनी संस्कृति और देशभक्ति का संगम
  • बिरसा मुंडा की जयंती पर उमड़ा जनजातीय अस्मिता का सैलाब
  • आदिवासी संस्कृति की भव्य झलक से सजी राजधानी दिल्ली

Delhi News: देश की राजधानी दिल्ली आज आदिवासी संस्कृति, विरासत और देशभक्ति के रंगों से रंग उठी। भारत के आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी और धर्म गुरु, भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर एक अद्भुत और भव्य आयोजन का गवाह बना। राजधानी के मध्य में, राजघाट स्थित गांधी दर्शन संग्रहालय से शुरू होकर ऐतिहासिक लाल किला मैदान तक एक विशाल आदिवासी सांस्कृतिक शोभायात्रा (Tribal Cultural Shobha Yatra) निकाली गई। यह केवल एक रैली नहीं थी, बल्कि यह उन असंख्य आदिवासी योद्धाओं को नमन करने का एक अवसर था, जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।

‘धरती आबा’ की याद में समर्पित भव्यता

भगवान बिरसा मुंडा, जिन्हें प्यार से ‘धरती आबा’ (पृथ्वी के पिता) कहा जाता है, ने ब्रिटिश औपनिवेशिक शक्तियों के खिलाफ उलगुलान (क्रांति) का नेतृत्व किया था। उनकी 150वीं जयंती को राष्ट्रीय स्तर पर ‘जनजातीय गौरव दिवस’ (Janjatiya Gaurav Diwas) के रूप में मनाया जा रहा है। दिल्ली की सड़कों पर निकली यह शोभायात्रा, उसी गौरवशाली इतिहास की झलक प्रस्तुत कर रही थी।

शोभायात्रा का शुभारंभ राजघाट स्थित गांधी दर्शन संग्रहालय के प्रांगण से हुआ। यह स्थान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के विचारों और उनके अहिंसक संघर्ष का प्रतीक है, जबकि भगवान बिरसा मुंडा ने विदेशी शासन के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का बिगुल बजाया था। दोनों महापुरुषों के विचारों में अंतर हो सकता है, लेकिन दोनों का लक्ष्य एक ही था—देश की स्वतंत्रता और दमित वर्गों का उत्थान। इस ऐतिहासिक स्थान से शोभायात्रा का आगाज होना किसी संयोग से कम नहीं था।

सांस्कृतिक विविधता का पिटारा

जैसे ही शोभायात्रा आगे बढ़ी, दिल्ली की वातावरण में एक अलग ही ऊर्जा का संचार हो गया। हजारों की संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग, जो देश के विभिन्न हिस्सों जैसे झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश, राजस्थान और पूर्वोत्तर राज्यों से दिल्ली पहुंचे थे, अपने-अपने परंपरागत वेशभूषा में दिखाई दिए।

पुरुषों ने अपने सिर पर रंग-बिरंगे पगड़ी और पीठ पर ढोल बांधे थे, जबकि महिलाएं अपने पारंपरिक गहनों और चमकदार साड़ियों में सजी हुई थीं। ‘मंडार’, ‘नागाड़ा’ और ‘ढोल’ की थाप पर लोग जमकर नाचे। यह संगीत आधुनिक डीजे के बीट्स से कहीं अधिक आकर्षक और आध्यात्मिक लग रहा था। यह थाप जंगलों की धड़कन की गूंज थी, जो शहर की कंक्रीट की दीवारों को भेदकर लोगों के दिलों तक पहुंच रही थी।

झांकियों में जीवंत इतिहास

शोभायात्रा में कई झांकियां (Tableaux) भी शामिल थीं, जिनमें भगवान बिरसा मुंडा के जीवन के महत्वपूर्ण पड़ावों को दर्शाया गया था। एक झांकी में बिरसा मुंडा को अपने समर्थकों के साथ जंगलों में बैठकर रणनीति बनाते हुए दिखाया गया था, तो दूसरी झांकी में ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनके विद्रोह को चित्रित किया गया था। कुछ झांकियां आदिवासी समुदाय के जीवनशैली, उनका प्रकृति के साथ गहरा जुड़ाव और उनके लोक कला रूपों को प्रदर्शित कर रही थीं।

इन झांकियों को देखने के लिए रास्ते के किनारे बड़ी संख्या में दिल्ली के निवासी भी जमा हो गए। बच्चे, बूढ़े और जवान सभी इस दृश्य को देखकर मंत्रमुग्ध हो रहे थे। यह दृश्य शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी में एक पल के लिए लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ रहा था।

लाल किला मैदान: स्वतंत्रता का प्रतीक

शोभायात्रा का अंतिम पड़ाव लाल किला मैदान था। लाल किला, जहां स्वतंत्रता दिवस पर भारत का तिरंगा फहराया जाता है, वहां आज आदिवासी संस्कृति का ध्वज उंचा गड़ रहा था। जब शोभायात्रा लाल किला मैदान पहुंची, तो वहां का नजारा देखने लायक था। हजारों लोगों की भीड़, रंग-बिरंगे झंडे और विदेशी शासन के खिलाफ बिरसा मुंडा के नारों की गूंज से पूरा मैदान गूंज उठा।

यह मार्ग (राजघाट से लाल किला) अपने आप में बहुत महत्वपूर्ण है। यह देश की आजादी की लड़ाई के प्रतीकों को जोड़ता है। गांधी जी की समाधि से शुरू होकर, वह रास्ता जहां क्रांतिकारियों को फांसी दी गई थी और आखिर में वह जगह जहां पहली बार तिरंगा फहराया गया था—यह पूरी यात्रा देश के संघर्ष का प्रतीक है।

आदिवासी समृद्धि का संदेश

इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य केवल एक जश्न मनाना नहीं था, बल्कि यह आदिवासी समुदाय को राष्ट्रीय मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास भी था। भारत सरकार द्वारा जनजातीय गौरव दिवस मनाने का निर्णय इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह शोभायात्रा यह संदेश देती है कि आदिवासी समाज केवल वनों और पहाड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि वे देश की प्रगति और विकास की मुख्य धारा में अहम भूमिका निभा रहे हैं।

भगवान बिरसा मुंडा ने सदी पहले देश की आजादी और जनजातियों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी थी। आज उनकी 150वीं जयंती पर निकली यह शोभायात्रा यह दर्शाती है कि उनका सपना अब साकार हो रहा है। आदिवासी युवा अब शिक्षित हो रहे हैं, खेलों में देश का नाम रोशन कर रहे हैं और प्रशासनिक सेवाओं में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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