Delhi News: दिल्ली विधानसभा के मानसून सत्र की शुरुआत के साथ ही शुक्रवार को नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट सदन के पटल पर रखी गई, जिसने राज्य के कर प्रणाली और राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस रिपोर्ट ने ई-वे बिल प्रणाली में घोर अनियमितताओं, कर चोरी के बड़े मामलों और सरकारी खजाने को हो रहे नुकसान का पर्दाफाश किया है। रिपोर्ट का उद्देश्य विभाग की कार्यक्षमता का आकलन कर खामियों को उजागर करना और सुधार की दिशा में कदम बढ़ाना है।
ई-वे बिल प्रणाली में मिलीं गंभीर खामियां
सीएजी के ऑडिट के अनुसार, 1 अप्रैल 2018 से 31 मार्च 2022 के बीच ई-वे बिल प्रणाली का परफॉर्मेंस ऑडिट किया गया। इस दौरान पता चला कि विभाग का प्रवर्तन तंत्र कर चोरी को रोकने में पूरी तरह से नाकाम रहा है। ऑडिट में यह भी सामने आया कि कई करदाता, जो ‘कंपोजिशन लेवी स्कीम’ के लिए पात्र नहीं थे, उन्होंने इसका लाभ उठाया। इतना ही नहीं, ऐसे करदाता जिन्होंने या तो ‘निल रिटर्न’ फाइल किया या फिर रिटर्न ही दाखिल नहीं किया, वे भी ई-वे बिल जनरेट करने में सफल रहे।

कर चोरी के चौंकाने वाले आंकड़े
सीएजी रिपोर्ट ने कर चोरी के कई बड़े मामलों का खुलासा किया है, जो सरकारी खजाने को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। इनमें प्रमुख हैं:
- लापरवाही का मामला: पांच करदाताओं ने 33.89 करोड़ रुपये के माल की आवाजाही पर 759 ई-वे बिल जनरेट किए, लेकिन इनमें से 4.68 करोड़ रुपये की टैक्स देयता का भुगतान नहीं किया गया। इससे सरकार को नुकसान हुआ है।
- जीएसटी रिटर्न से दूरी: 15 करदाताओं ने 252.66 करोड़ रुपये के माल पर 580 ई-वे बिल बनाए, लेकिन उन्होंने जीएसटीआर-3बी रिटर्न फाइल नहीं किया, जिससे लगभग 31.46 करोड़ रुपये का टैक्स फंसा रह गया।
- रद्द रजिस्ट्रेशन का खेल: ऐसे 28 करदाता, जिनका रजिस्ट्रेशन पहले ही रद्द हो चुका था, उन्होंने 734.75 करोड़ रुपये के माल की आवाजाही की और 99.39 करोड़ रुपये का टैक्स बकाया छोड़ दिया। विभाग ने इनसे वसूली के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए।
- इनवॉइस का दुरुपयोग: सात करदाताओं ने 32 इनवॉइस का इस्तेमाल कर 65 ई-वे बिल जनरेट किए, यानी एक ही इनवॉइस को दो से तीन बार इस्तेमाल किया गया, जिससे रिपोर्टिंग में गड़बड़ी की आशंका है। साथ ही, कुछ वाहनों के नंबरों का भी दुरुपयोग हुआ, जिनका रजिस्ट्रेशन या तो रद्द हो चुका है या चोरी के थे।
फर्जी आईटीसी क्लेम और टैक्स चोरी
रिपोर्ट में इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) के फर्जी दावों का भी खुलासा किया गया है। तीन करदाताओं ने 14.99 करोड़ रुपये का आईटीसी क्लेम किया, जबकि उनके पास केवल 5.29 करोड़ रुपये का ही आईटीसी उपलब्ध था। एक अन्य मामले में, 3.33 करोड़ रुपये का अतिरिक्त आईटीसी अनुचित तरीके से क्लेम किया गया। इसी तरह, एक करदाता को बिना टैक्स सत्यापन के 89.35 लाख रुपये का आईटीसी दे दिया गया, जिससे सरकार को भारी नुकसान पहुंचा है।
जीएसटी रिटर्न में भारी अंतर
ऑडिट में पाया गया कि 2018-21 के दौरान 70 करदाताओं के रिटर्न की जांच में 3,710.17 करोड़ रुपये का टर्नओवर का अंतर सामने आया, जिससे लगभग 3,071.92 करोड़ रुपये का संभावित राजस्व प्रभावित हुआ। विभाग ने इन विसंगतियों में से केवल 127 मामलों का जवाब दिया और उनमें से भी बहुत कम पर कार्रवाई की।
स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस में कमी
रिपोर्ट में यह भी उजागर हुआ कि स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस में भी 1.91 करोड़ रुपये की कमी पाई गई। यह मुख्य रूप से गलत तरीके से कृषि दर की बजाय औद्योगिक या आवासीय दरें लागू करने के कारण हुआ।
सरकारी खजाने के नुकसान का आकलन और सुझाव
सीएजी रिपोर्ट साफ तौर पर संकेत देती है कि विभाग की प्रवर्तन गतिविधियों और डेटा मॉनिटरिंग सिस्टम में सुधार की सख्त आवश्यकता है। यदि इन खामियों को जल्द नहीं दूर किया गया, तो सरकारी राजस्व में और कमी आ सकती है। विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने कहा है कि पिछले वर्षों से लोक लेखा समिति इन रिपोर्टों की जांच कर रही है और आगामी समय में इन पर कार्रवाई पूरी हो जाएगी। उन्होंने विभागों को चेतावनी दी है कि वे इन खामियों को रोकने के लिए ठोस कदम उठाएं, ताकि सरकारी संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित हो सके।
























