चीन ने इतिहास रचते हुए पहली बार अपने रॉकेट के पहले चरण (हिस्से) को नियंत्रित तरीके से जमीन पर वापस लाने में सफलता हासिल की है। यह उपलब्धि अंतरिक्ष क्षेत्र में चीन की बढ़ती ताकत और तकनीकी प्रगति को दर्शाती है। इससे पहले, रॉकेट के पहले चरण को वापस लाने का प्रयास मुख्य रूप से समुद्र में नेट-कैप्चर सिस्टम या समुद्र में प्लेटफार्म पर किया जाता रहा है, लेकिन जमीन पर नियंत्रित लैंडिंग का यह कदम बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस सफलता का मकसद न केवल लागत को कम करना है, बल्कि पुन: उपयोगी तकनीक को बढ़ावा देना भी है, ताकि अंतरिक्ष मिशनों की लागत में कमी आए और अधिक से अधिक देशों को अंतरिक्ष में कदम रखने का अवसर मिले।
पहली नियंत्रित लैंडिंग का महत्व
रॉकेट के पहले चरण का बहुत बड़ा हिस्सा होता है, जिसे सामान्यतया फेंक दिया जाता है। यदि इस हिस्से को पुन: इस्तेमाल किया जा सके, तो इससे न केवल खर्च में भारी कमी आएगी, बल्कि पर्यावरण पर भी कम दबाव पड़ेगा। चीन की इस सफलता से यह स्पष्ट हो गया है कि अब उसकी रॉकेट टेक्नोलॉजी आधुनिक और प्रभावी हो चुकी है। चीन ने इस बार अपने रॉकेट का पहला हिस्सा जमीन पर नियंत्रित रूप से वापस लाने के लिए झूक्वू-3 रॉकेट का उपयोग किया। यह रॉकेट जिउक्वान सैटेलाइट लॉन्च सेंटर से बुधवार सुबह लॉन्च किया गया, और लॉन्च के तुरंत बाद ही इसका पहला हिस्सा सफलतापूर्वक जमीन पर लौट आया।
रॉकेट का खास मिशन
झूक्वू-3 का यह मिशन खास तौर पर तकनीक के प्रदर्शन और लागत कम करने के उद्देश्य से किया गया था। इस रॉकेट का पहला हिस्सा बहुत ही महंगा होता है, इसलिए इसे रीयूज़ करने की योजना लंबे समय से थी। रॉकेट के इस हिस्से ने अपने इंजन और नियंत्रण प्रणाली की मदद से अपनी गति को कम किया और एक निर्धारित लैंडिंग क्षेत्र की ओर यात्रा की। इसके बाद, लैंडिंग लेग्स खुले और बूस्टर ने जमीन पर लगभग सही स्थिति में उतरते हुए सफलता हासिल की। यह लैंडिंग चीन के गांसू प्रांत में लगभग 390 किलोमीटर दूर हुई, जो इस तकनीक की सफलता का प्रतीक है।
तकनीकी प्रक्रिया
रॉकेट के पहले चरण ने अपने इंजन और नियंत्रण प्रणाली का उपयोग कर अपनी गति को नियंत्रित किया। फिर, इसमें लगे लैंडिंग लेग्स खुल गए और बूस्टर ने जमीन पर नियंत्रित, वर्टिकल लैंडिंग की। इस प्रक्रिया में रॉकेट की गति को नियंत्रित करने के लिए अत्याधुनिक नियंत्रित प्रणालियों का इस्तेमाल किया गया। इस सफलता से चीन ने यह साबित कर दिया कि वह अपने रॉकेट्स को पुन: इस्तेमाल करने में सक्षम है, जैसा कि अमेरिकी कंपनी SpaceX पहले ही कर चुकी है। SpaceX ने अपने फाल्कन 9 रॉकेट के पहले चरण को सफलतापूर्वक नियंत्रित लैंडिंग के माध्यम से पुन: उपयोग किया है, जिससे स्पेस मिशनों की लागत में भारी कमी आई है।
चीन की पिछली कोशिशें और इस बार की सफलता
चीन पहले भी रॉकेट के हिस्सों को वापस लाने में सफल रहा है, लेकिन वह समुद्र में स्थित प्लेटफार्म पर नेट-कैप्चर प्रणाली का उपयोग कर करता रहा है। जुलाई में, चीन के Long March-10B रॉकेट के पहले चरण को समुद्र में एक विशेष नेट सिस्टम से पकड़ा गया था। यह प्रणाली भी प्रभावी थी, लेकिन जमीन पर नियंत्रित लैंडिंग का यह प्रयास अधिक स्थिर और आधुनिक माना जा रहा है।

चीन का अगला कदम: चंद्रमा मिशन
यह सफलता चीन के चंद्रमा मिशन के क्षेत्र में भी नए अवसर खोल रही है। चीन का अगला उद्देश्य चांद पर पानी के निशान तलाशना है। इसके लिए चांग ई-7 नाम का रोबोटिक मिशन जल्द ही चांद की यात्रा पर जाएगा। यह मिशन चंद्रमा की सतह का अध्ययन करेगा और वहां पानी की मौजूदगी की पुष्टि करेगा। चांग ई-7 में कई उपकरण होंगे, जिनमें ऑर्बिटर भी शामिल है, जो चंद्रमा की कक्षा में घूमकर सूचनाएं जुटाएगा। इस मिशन का लक्ष्य चंद्रमा की सतह पर पानी और जलीय संसाधनों का पता लगाना है, जो मानव बसावट और भविष्य के मिशनों के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
वैश्विक प्रतिस्पर्धा और चुनौती
चीन की यह उपलब्धि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन गई है। खासतौर पर, जब अमेरिका और यूरोप जैसे देश पहले ही अपने रॉकेट को पुन: उपयोग करने की तकनीक विकसित कर चुके हैं। SpaceX का फाल्कन 9 रॉकेट इस दिशा में अग्रणी है। अब, चीन भी इस प्रतिस्पर्धा में शामिल हो गया है। एलन मस्क के स्पेसएक्स के लिए यह चुनौती बढ़ गई है, क्योंकि चीन नई तकनीकों के साथ मैदान में उतर चुका है।
चांद पर टकराए फाल्कन रॉकेट का गड्ढा
इस बीच, अमेरिकी एजेंसी नासा ने भी चांद की सतह की नई तस्वीरें जारी की हैं। इनमें से एक तस्वीर में 5 अगस्त को फाल्कन रॉकेट के टकराने से बना 60 फीट चौड़ा गड्ढा देखा जा सकता है। यह हादसा उस समय हुआ था, जब स्पेसएक्स का रॉकेट चांद की सतह से टकराया था। इस टक्कर की वजह से चांद की सतह पर बड़ा गड्ढा बन गया था, जो वैज्ञानिकों के लिए नई जानकारियों का स्रोत बन गया है।

























