Bollywood News: बॉलीवुड में एनीमेशन फिल्मों की लंबी कहानियां हैं, लेकिन कम ही फिल्में ऐसी होती हैं जो बच्चों के मनोरंजन के साथ-साथ गहरा सामाजिक संदेश भी देती हों। ऐसी ही एक अनूठी कोशिश है प्रख्यात एनीमेटर वैभव कुमारेश द्वारा निर्देशित फिल्म “रिटर्न ऑफ द जंगल”। देश और विदेश में अपनी अलग पहचान बना चुके वैभव ने इस फिल्म के माध्यम से भारतीय एनीमेशन उद्योग को एक नई दिशा और ऊंचाई दी है। यह फिल्म केवल एक कार्टून नहीं है, बल्कि यह भावनाओं, संघर्ष और जीत का ऐसा मिलाजुला रूप है, जो दर्शकों को बांधे रखता है।
मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में छाया कमाल
इस फिल्म को हाल ही में मुंबई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (MIFF) में पेश किया गया, जहां इसे दर्शकों और critics दोनों ने खूब सराहा। फिल्म में वीएफएक्स (VFX) का काम देखने लायक है। हर फ्रेम में परफेक्शन और भारतीयता का सुरमाई संगम दिखता है। यह फिल्म स्कूली बच्चों को न केवल मनोरंजन देती है, बल्कि उन्हें जीवन की नई दिशा दिखाती है। खेल भावना, भारतीय संस्कृति और जीत-हार के अनुभवों को किस तरह से जीवन में उतारना चाहिए, यह सब बड़े पर्दे पर बड़ी ही बारीकी से दिखाया गया है। यह एक नेक और अच्छा प्रयास है, जो बच्चों के मस्तिष्क के विकास में मदद करेगा।
स्टोरी प्लॉट: स्कूली जीवन से जुड़ी दिलचस्प कहानी
फिल्म की कहानी एक केंद्रीय विद्यालय (Kendriya Vidyalaya) के कुछ बच्चों के जीवन पर आधारित है। कहानी की शुरुआत इन बच्चों के अटूट विश्वास और उनकी राह में आने वाली चुनौतियों से होती है। फिल्म में खेल और प्रतियोगिता को माध्यम बनाकर जीवन की पाठ दिया गया है।
कहानी में एक ऐसा लड़का है, जो स्कूल में होने वाली हर प्रतियोगिता को जीतने के लिए जाना जाता है—राहुल मल्होत्रा। राहुल को खुद पर इतना भरोसा है कि वह अपने आप को ‘स्पाइडर मैन’ से कम नहीं मानता। उसका आत्मविश्वास उसे हर बार विजेता बनाता है। लेकिन कहानी में मोड़ तब आता है, जब दूसरी क्लास के छात्र भी इस बार स्कूल की सभी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने का फैसला करते हैं। इन बच्चों का नेतृत्व छोटू करता है, जो राहुल की ताकत को चुनौती देने के लिए तैयार है।
फिल्म में फैशन शो से लेकर क्रिकेट तक के मुकाबले दिखाए गए हैं। ये केवल खेल नहीं हैं, बल्कि ये इन बच्चों की पक्की दोस्ती और चुनौतियों का सामना करने का परिचायक हैं। इन सब के साथ एक खास किरदार है—‘थाथा’। थाथा का किरदार फिल्म की आत्मा है। वह हर मुश्किल वक्त में बच्चों का साथ देता है और उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। निर्देशक ने थाथा के किरदार को पारंपरिक पंचतंत्र शैली की कहानियों से लिया है, जो फिल्म को एक भारतीय और पौराणिक स्वाद देता है।
15 साल की कड़ी मेहनत और समर्पण
आपको जानकर हैरानी होगी कि बिना किसी बड़े स्टार कास्ट के, करीब दो घंटे (124 मिनट) की इस फिल्म को बनाने में फिल्म के निर्माता और उनकी पूरी टीम का 15 साल का समय लग गया है। यह एक छोटी अवधि नहीं, बल्कि एक लंबा संघर्ष है। आज के दौर में जब फिल्में तेजी से बनती और रिलीज होती हैं, वहां 15 साल एक प्रोजेक्ट को समर्पित करना एक दुर्लभ उदाहरण है। यह फिल्म टीम के इसी लंबे संघर्ष और जुनून का परिणाम है।
ओवरऑल: पूरे परिवार के लिए एक मस्तिष्क
इस फिल्म को तैयार करने में लगे समय को देखते हुए यह स्पष्ट है कि निर्माताओं ने कोई समझौता नहीं किया। मेरी नजर में, यह फिल्म एनीमेशन जगत में युवा फिल्म मेकर्स के बढ़ते हुए आत्मविश्वास का संकेत है। वैभव कुमारेश ने अपनी एक अलग पहचान स्थापित करने की अच्छी कोशिश की है।
यह फिल्म केवल बच्चों के लिए ही नहीं है, बल्कि पूरे परिवार के लिए बनी है। इसमें वह दम है जो बड़ों को भी अपनी बचपन की यादों में ले जा सके। तो इस बार अपने छोटे-छोटे सोनू और मीनू के साथ अपने पास के सिनेमाघर में जाएं। यकीनन, यह फिल्म आप सब की कसौटी पर खरी उतरेगी और आपको एक अच्छा संदेश लेकर घर वापस भेजेगी।
























