Electoral battle in Bihar’s Bankipur: बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव बिहार की राजनीति में एक हाई-प्रोफाइल और दिलचस्प मुकाबले के रूप में उभर कर सामने आया है। यह सीट भाजपा के लिए बेहद खास मानी जाती है, क्योंकि इसे पार्टी का गढ़ माना जाता है। इस उपचुनाव का परिणाम पार्टी की प्रतिष्ठा और भविष्य दोनों के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, इस बार बीजेपी को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिनमें से एक प्रमुख मामला उनके उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा का चुनावी हलफनामे और बायोडेटा से जुड़ा है। आइए, इस खबर को विस्तार से समझते हैं और जानिए इस मुद्दे के विभिन्न पहलुओं को।
भाजपा का नया उम्मीदवार और विवाद की शुरुआत
बांकीपुर उपचुनाव के लिए पहले पार्टी ने अभिषेक सिन्हा उर्फ बंटी को अपना उम्मीदवार घोषित किया था। लेकिन नामांकन के बाद एक दिन के भीतर ही उन्होंने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। इसके बाद, पार्टी को महज 24 घंटे के अंदर ही नया उम्मीदवार तय करना पड़ा और अंततः नीरज कुमार सिन्हा का नाम घोषित किया गया। नीरज का नामांकन पत्र और बायोडेटा जारी किए गए, लेकिन इन दस्तावेजों में कुछ अनसुलझे सवाल खड़े हो गए हैं।
13 जुलाई को नीरज कुमार ने अपने चुनावी हलफनामे में अपनी उम्र, शैक्षिक योग्यता और व्यक्तिगत विवरण दर्ज किए। हलफनामे के अनुसार, नीरज की उम्र 32 वर्ष है। उन्होंने अपनी शिक्षा का विवरण देते हुए लिखा कि उन्होंने 2012 में बिहार स्कूल एग्जामिनेशन बोर्ड (BSEB) से गोना से मैट्रिक (10वीं) पास किया। इसके बाद, उन्होंने मगध महाविद्यालय, सकुराबाद, जहानाबाद से साल 2024 में अपनी स्नातक की डिग्री पूरी की।
यहां सबसे बड़ा सवाल उठता है कि उन्होंने 10वीं के बाद सीधे 2024 में ही स्नातक की डिग्री कैसे पूरी कर ली? सामान्यत: भारत में इंटरमीडिएट (12वीं) की पढ़ाई पूरी किए बिना स्नातक की डिग्री हासिल करना संभव नहीं है। हलफनामे में न तो 12वीं की पढ़ाई का कोई जिक्र है और न ही किसी भी तरह का विवरण, जो यह साबित कर सके कि उन्होंने बिना इंटरमीडिएट के सीधे स्नातक की डिग्री हासिल की है। सोशल मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या हलफनामे में कोई गड़बड़ी या गलती की गई है।
पार्टी की प्रतिक्रिया और नीरज से संपर्क
जब इस मुद्दे पर लाइव हिन्दुस्तान ने नीरज सिन्हा से संपर्क करने की कोशिश की, तो उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। पिछले 24 घंटों में उन्हें कई बार फोन किया गया, मैसेज भेजे गए, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। वहीं, बीजेपी के प्रवक्ताओं से जब इस विषय पर पूछा गया, तो उन्होंने इस मामले में कोई जानकारी होने से इनकार कर दिया। इस तरह की स्थिति ने सवाल खड़े कर दिए हैं कि क्या पार्टी को अपनी उम्मीदवार की शैक्षिक योग्यता और हलफनामे की सच्चाई को लेकर कोई जानकारी नहीं थी या फिर उन्होंने जानबूझकर इसे नजरअंदाज किया।
यह पहली बार नहीं है जब बीजेपी ने नीरज सिन्हा को टिकट देते हुए उनका बायोडेटा जारी किया हो। इससे पहले भी उनके बायोडेटा में कुछ असामान्य बातें सामने आई थीं। पार्टी ने उन्हें टिकट देने से पहले एक बायोडेटा जारी किया, जिसमें यह बताया गया कि नीरज ने साल 2006 में बीजेपी की प्राथमिक सदस्यता ली थी। उनकी जन्मतिथि 1 जुलाई 1994 है, और उन्होंने उस समय महज 12 साल की उम्र में पार्टी ज्वाइन कर ली थी। इस बात को लेकर भी सवाल खड़े होने लगे कि क्या इतनी कम उम्र में किसी ने राजनीतिक पार्टी की सदस्यता ग्रहण कर ली थी?
हालांकि, विवाद बढ़ने के बाद पार्टी ने नया बायोडेटा जारी किया और उसमें से 2006 में पार्टी की प्राथमिक सदस्यता लेने का उल्लेख हटा दिया गया। लेकिन, यह साफ नहीं हुआ कि पहले ऐसा क्यों लिखा गया और अब क्यों इसे हटा दिया गया। इससे पार्टी की विश्वसनीयता पर सवाल उठने लगे हैं।
बांकीपुर का राजनीतिक समीकरण और मुकाबला
बांकीपुर का यह उपचुनाव बिहार की राजनीति में चर्चा का विषय बन चुका है। यह सीट भाजपा का गढ़ मानी जाती है, जहां पार्टी ने पहले अभिषेक कुमार उर्फ बंटी को टिकट दिया था। लेकिन उनके पीछे हटने के बाद, पार्टी ने नीरज सिन्हा को मैदान में उतारा। इस सीट पर उनका मुकाबला जन सुराज पार्टी (JSP) के संस्थापक प्रशांत किशोर से है, जो अपने राजनीतिक करियर का आगाज कर रहे हैं।
नामांकन के दौरान मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, सांसद रविशंकर प्रसाद और संजय सरावगी जैसे दिग्गज नेता नीरज सिन्हा के समर्थन में खड़े थे। उन्हें संगठन का एक समर्पित और जमीनी कार्यकर्ता माना जा रहा है। इस चुनाव का परिणाम न केवल बांकीपुर की सियासी परिदृश्य को बदल सकता है, बल्कि यह पार्टी की छवि और उम्मीदवार की विश्वसनीयता को भी प्रभावित कर सकता है।
























