भारत का एक अनोखा और रहस्यमयी गांव, जहां आधुनिकता की चमक से दूर रहकर लोग अपनी परंपराओं और प्राकृतिक जीवनशैली को अपनाए हुए हैं। यह गांव है आंध्र प्रदेश के श्रीकाकुलम जिले में मौजूद कुर्मा ग्रामम, जो अपने अनूठे जीवनशैली के कारण पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। इस गांव का इतिहास और जीवनशैली ऐसी है कि सुनकर आप हैरान रह जाएंगे कि आज के डिजिटल युग में भी कोई बिना मोबाइल, बिजली और इंटरनेट के अपने तरीके से जीवन जी सकता है।
कुर्मा ग्रामम का स्थान और परिदृश्य
कुर्मा ग्रामम लगभग 60 एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है, जो घने जंगलों और शांत वादियों के बीच बसा है। यह गांव अपने आप में एक पूरी दुनिया है, जहां के लोग प्रकृति के करीब रहते हैं। गांव की सड़कों से लेकर घरों तक का माहौल पारंपरिक और प्राकृतिक है। यहां के घर मिट्टी, लकड़ी, पत्थर और चूने से बने हैं। घरों की फर्श को खासतौर पर गोबर से लीपा जाता है, जिससे कीटाणु और कीड़े नहीं फटकते। गांव में न तो बिजली का कोई जाल है और न ही मोबाइल फोन का प्रयोग। बाहर से देखने पर यह गांव किसी सामान्य बस्ती जैसा दिख सकता है, लेकिन अंदर का माहौल पूरी तरह से अलग है।
जीवनशैली और परंपराएँ
कुर्मा ग्रामम के लोगों ने अपनी परंपराओं और जीवनशैली को पूरी तरह से संजोया है। यहां न तो स्मार्टफोन हैं और न ही टीवी, डिश एंटीना या अन्य आधुनिक उपकरण। शाम होते ही जब शहर की गलियों में लाइटें जलने लगती हैं, तो इस गांव में एक अलग ही नजारा देखने को मिलता है। लोग बिजली के बल्ब के बजाय अरंडी के तेल से बने दीयों की रोशनी में अपने जीवन को जीते हैं। इस गांव में पंखे, एयर कंडीशनर जैसे आधुनिक उपकरणों का कोई स्थान नहीं है। लोग प्राकृतिक तौर पर अपने आशियाने बनाते हैं और अपना जीवन जीते हैं।
खानपान और स्वच्छता का तरीका
यहां के लोग पारंपरिक तरीके से खाना बनाते हैं। गैस सिलेंडर का प्रयोग पूरी तरह से बंद है। महिलाएं मिट्टी के चूल्हे पर लकड़ी जलाकर खाना पकाती हैं, जिसकी खुशबू पूरे गांव में फैल जाती है। खाने में साबुन या रसायनों का इस्तेमाल नहीं होता, बल्कि रीठा और प्राकृतिक वस्तुएं ही इस्तेमाल की जाती हैं। स्वच्छता का भी यहां खास ध्यान रखा जाता है। घरों की साफ-सफाई और स्वच्छता प्राकृतिक संसाधनों से ही की जाती है।
प्राकृतिक जीवन का अनुभव
यह गांव अपने अनूठे जीवनशैली के कारण लोगों का ध्यान आकर्षित करता है। यहां के लोग सुबह के 3:30 बजे अपने दिन की शुरुआत करते हैं। जैसे ही घड़ी की साढ़े तीन बजती है, पूरा गांव जाग जाता है। लोग नहाने-धोने के बाद एक जगह इकट्ठे होकर भजन और ध्यान करते हैं। इस समय का माहौल अत्यंत शांत और आध्यात्मिक होता है। बच्चे यहां किसी आधुनिक स्कूल में नहीं जाते, बल्कि उन्हें गुरुकुल में वेद, रामायण, भगवत गीता और मूल अंग्रेजी व गणित की शिक्षा दी जाती है। यह अभियान 2018 में शुरू हुआ था, ताकि लोग प्रकृति के करीब रह सकें और तनावमुक्त जीवन जी सकें।
आध्यात्म और जीवन का संतुलन
इस गांव का मुख्य उद्देश्य है कि लोग आधुनिकता के जंजाल से दूर रहें और अपने परंपरागत, प्राकृतिक जीवन का आनंद लें। यहां के लोग अपने रीति-रिवाजों और परंपराओं का पालन करते हैं, साथ ही अध्यात्म और ध्यान को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा मानते हैं। उनका मानना है कि इस तरीके से जीवन सरल, शांतिपूर्ण और अधिक सजीव होता है।
























