मध्य पूर्व (Middle East) का इतिहास आज फिर से खून से लिखा जा रहा है। ईरान और इजरायल एक-दूसरे को बर्बाद करने पर तुले हैं। अमेरिका के साथ मिलकर इजरायल ने ईरान के सुप्रीम लीडर और टॉप लीडर्स को निशाना बनाया है, जबकि ईरानी मिसाइल इजरायल और उसके सहयोगी देशों पर काल बनकर टूट रहे हैं। पूरा क्षेत्र युद्ध की आग में जल रहा है और वैश्विक तेल की कीमतों में भारी उछाल देखा जा रहा है। लेकिन, क्या आप जानते हैं कि यह तेल ही एक वक्त था जब आज के इन कट्टर दुश्मनों को दोस्त बनाता था? हां, इतिहास के उन पन्नों में, जब ईरान और इजरायल एक-दूसरे के सबसे करीबी साथी हुआ करते थे, दोनों ने मिलकर दुनिया को एक ऐसा ‘चकमा’ दिया था, जो आज तक इतिहास का एक रोचक अध्याय बना हुआ है। यह कहानी है ‘सीक्रेट ऑयल पाइपलाइन’ की।
स्वेज नहर का संकट और दोस्ती की शुरुआत
कहानी 49 साल पहले जून 1967 की है। तब मध्य पूर्व में युद्ध चल रहा था। इजरायल ने मिस्र, जॉर्डन और सीरिया को हरा दिया, लेकिन इस जीत के बाद मिस्र ने ‘स्वेज नहर’ को बंद कर दिया। दुनिया के 12% ट्रेड और 30% कंटेनर ट्रैफिक का रास्ता बंद होने से इजरायल के लिए संकट खड़ा हो गया। उसे तेल आयात करने के नए रास्ते की जरूरत थी। वहीं, तेल निर्यातक ईरान को भी अपना माल बेचने के लिए नया रास्ता चाहिए था।
क्या थी ‘सीक्रेट पाइपलाइन’ की योजना?
साल 1968 में ईरान और इजरायल ने एक ज्वाइंट वेंचर के तहत 254 किलोमीटर लंबी और 42 इंच चौड़ी पाइपलाइन बनाई। यह लाल सागर के ‘इलात’ बंदरगाह को भूमध्य सागर के ‘अशकेलोन’ से जोड़ती थी। इसका मकसद था- ईरान के तेल को इलात तक लाना और फिर पाइपलाइन के जरिए अशकेलोन पहुंचाकर यूरोप भेजना। इस पूरे ऑपरेशन को छिपाने के लिए दोनों देशों ने लिक्टेंस्टीन और पनामा की कंपनियों का सहारा लिया, ताकि अरब देशों को इसकी भनक तक न लगे।
CIA को भी थी भनक
यह पाइपलाइन काफी हद तक सीक्रेट थी, लेकिन अमेरिका की सेंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (CIA) को इसकी जानकारी थी। 25 अप्रैल 1968 की CIA की एक डीक्लासिफाइड रिपोर्ट में साफ लिखा था कि ईरान ही इस पाइपलाइन के लिए तेल का मुख्य स्रोत होगा। रिपोर्ट में कहा गया था कि ईरान ही पाइपलाइन के लिए बड़ी मात्रा में पेट्रोलियम का एकमात्र संभावित सोर्स है। यह स्वेज नहर या केप ऑफ गुड होप के रास्ते से तेल ले जाने के मुकाबले कम खर्चीला रास्ता होगा।
कैसे दिया गया दुनिया को चकमा?
जेवियर ब्लास और जैक फार्ची की किताब ‘द वर्ल्ड फॉर सेल’ में इस ऑपरेशन का विस्तार से जिक्र है। लिखा है कि ईरानी टैंकर फारस की खाड़ी से तेल लेकर ‘जिब्राल्टर फॉर ऑर्डर’ कहकर निकलते थे, लेकिन वे जिब्राल्टर कभी नहीं जाते थे। गुप्त रूप से वे इलात पहुंचते, वहां तेल उतारते और खाली लौट जाते। इजरायल ने अपने बंदरगाहों पर रिपोर्टिंग ब्लैकआउट लगा रखा था, जिससे यह पूरा खेल किसी को दिखाई नहीं दिया।

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दोस्ती का अंत और विवाद
यह दोस्ती और साझेदारी एक दशक तक चली। इजरायल ने ईरान को सैन्य सहायता दी, तो ईरान ने इराक से निकाले गए यहूदियों को इजरायल पहुंचाने का रास्ता दिया। लेकिन 1979 की ईरानी क्रांति ने सब बदल दिया। आयतोल्लाह खुमैनी ने सत्ता संभालते ही इजरायल के साथ सारे रिश्ते तोड़ दिए।
आज क्या है पाइपलाइन की स्थिति?
आज यह पाइपलाइन ‘यूरोप एशिया पाइपलाइन कंपनी’ (EAPC) के पास है, जिसपर इजरायल सरकार का मालिकाना हक है। यह इजरायल की अर्थव्यवस्था का ‘एनर्जी गेटवे’ है और देश के 75% ऊर्जा इनपुट्स को यहीं से संभाला जाता है। हालांकि, यह विवादों में भी है। 2014 में इसमें लीक से बड़ा पर्यावरणीय हादसा हुआ था। वहीं, ईरान ने इस पाइपलाइन पर अपने हिस्से और बकाया भुगतान के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। स्विस कोर्ट ने इजरायल को 1.1 बिलियन डॉलर चुकाने का आदेश दिया, लेकिन इजरायल ने ईरान को ‘शत्रु राष्ट्र’ घोषित कर भुगतान से इनकार कर दिया।
आज जब दोनों देश एक-दूसरे पर बम बरसा रहे हैं, तब इतिहास का यह पन्ना याद दिलाता है कि कैसे भू-राजनीतिक हित कभी दुश्मनों को भी दोस्त बना देते हैं और समय बदलने पर वही दोस्त कट्टर शत्रु बन जाते हैं।
























