महाराष्ट्र के अमरावती स्थित जिला महिला अस्पताल (District Women’s Hospital) में देर रात उस वक्त हड़कंप मच गया, जब नवजात शिशुओं के वार्ड में अचानक आग लग गई। इस भयानक घटना में तीन मासूम बच्चों की जिंदगी राख हो गई, जबकि 36 अन्य बच्चों को बड़ी मुश्किलों के बाद सुरक्षित बचाया जा सका। हालांकि, इस त्रासदी के बाद अस्पताल प्रशासन और जिला प्रशासन के रुख पर सवाल उठ रहे हैं।
अग्नि सुरक्षा मानकों की अनदेखी को लेकर मीडिया में उड़ रही अटकलों पर विराम लगाते हुए अमरावती के जिला मजिस्ट्रेट (DM) आशीष येरेकर ने सोमवार को स्पष्ट किया कि अस्पताल की फायर सुरक्षा फाइलें पूरी तरह से अपडेट हैं। उन्होंने बताया कि नियमित अग्नि सुरक्षा ऑडिट (Fire Safety Audit) कराए जाते रहे हैं और इस वर्ष के नए ऑडिट के लिए भी लोक निर्माण विभाग (PWD) के विद्युत विंग में आवेदन पहले ही दे दिया गया था।

वेंटिलेटर की चिंगारी बनी मौत की वजह
बता दें कि अस्पताल की तीसरी मंजिल पर स्थित नवजात गहन चिकित्सा इकाई (NICU) में सुबह करीब 3:15 बजे यह हादसा हुआ। प्रारंभिक जांच में जो तथ्य सामने आए हैं, उनके अनुसार आग लगने की शुरुआत एक वेंटिलेटर से निकली चिंगारी से हुई। आग इतनी तेजी से फैली कि वहां मौजूद नवजात शिशु उसका शिकार हो गए।
डीएम आशीष येरेकर ने अपने बयान में कहा, “मैंने स्वयं दस्तावेजों को देखा है। पिछले साल का फायर निरीक्षण निश्चित रूप से हुआ था और इस साल के निरीक्षण के लिए आवेदन लंबित है। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि अग्नि सुरक्षा जांचों को अनदेखा किया गया हो।”
जांच का अब उपकरणों पर फोकस
प्रशासन ने साफ कर दिया है कि अब जांच का पूरा ध्यान उस उपकरण पर केंद्रित है, जिससे आग निकलने का शक है। डीएम ने बताया कि जिस यूनिट ने स्वचालित अलर्ट (Automatic Alert) जारी किया था, उसमें तकनीकी खामी को लेकर जांच चल रही है।
येरेकर ने आगे चेतावनी देते हुए कहा, “यदि जांच में कोई भी प्रशासनिक लापरवाही सामने आती है, तो किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। हर जिम्मेदार व्यक्ति को उत्तरदायी ठहराया जाएगा। दूसरी ओर, अगर कंपनी द्वारा लगाए गए उपकरण में कोई मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट (Manufacturing Defect) पाया जाता है, तो कंपनी के खिलाफ भी कानूनी और सख्त कार्रवाई की जाएगी।”
सीएम देवेंद्र फडणवीस का बयान और मुआवजे का ऐलान
इस दुखद घटना पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने गहरा दुख व्यक्त किया है। उन्होंने इसे “दिल दहला देने वाली” घटना बताते हुए तुरंत एक्शन लिया। सीएम ने घोषणा की है कि मृतक बच्चों के परिवारों को 5-5 लाख रुपये की आर्थिक मदद दी जाएगी।
घायल या बचे हुए बच्चों का इलाज पूरा राज्य सरकार के खर्च पर किया जाएगा। स्वास्थ्य मंत्री और सचिव को तुरंत अमरावती जाकर मौके का मुआवजा करने का आदेश दिया गया है। इस मामले की उच्च स्तरीय जांच (High-level Probe) के आदेश दिए गए हैं और दोषियों के खिलाफ कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
परिजनों का आरोप—स्प्रिंकलर सिस्टम रहा फेल
जहां एक तरफ प्रशासन दस्तावेजों के दम पर फायर ऑडिट को बेदाग बता रहा है, वहीं दूसरी तरफ घटना के चश्मदीदों और परिजनों ने अस्पताल की व्यवस्थाओं की कड़ी आलोचना की है। कई अभिभावकों का कहना है कि जैसे ही आग लगी, वार्ड में मौजूद स्वचालित पानी छिड़कने वाली प्रणाली (Fire Sprinkler System) काम नहीं की।
परिजनों का मानना है कि अगर स्प्रिंकलर सिस्टम सही से काम करता, तो शायद तीनों बच्चों की जान बच सकती थी। आग लगते ही अस्पताल में अफरा-तफरी मच गई और माता-पिता अपने बच्चों को बचाने के लिए धधकती आग में कूद पड़े। परिवारों ने अस्पताल प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जताई है और सख्त से सख्त सजा की मांग की है। ये आरोप अब जांच एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती बन गए हैं।
चश्मदीद ने बयां किया खौफनाक मंजर
इस हादसे के प्रत्यक्षदर्शी अचलपुर निवासी योगेश सावरकर हैं। उनकी पत्नी ने आठ दिन पहले ही बच्चे को जन्म दिया था और वह इलाज के लिए अस्पताल की पहली मंजिल पर भर्ती थी। आग लगने के वक्त योगेश अस्पताल के बाहर सो रहे थे।
योगेश ने बताया कि जैसे ही शोर सुना, मैं दौड़कर अंदर गया और अपने बच्चे को उठाकर सुरक्षित जगह ले आया। लेकिन ऊपर वाले वार्ड (NICU) का नजारा डरावना था। मैंने कई बच्चों के शरीर पर काली राख लगी देखी।” उन्होंने बचाव कार्य में सुरक्षा गार्डों और एक नर्स की तारीफ की है, जिन्होंने जान की परवाह किए बिना बच्चों को बाहर निकाला।
























