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ऑस्ट्रेलिया के सोशल मीडिया बैन के बीच भारत का ‘neOwn’ बना बच्चों के लिए नई उम्मीद

Silent Reading Sessions: neOwn की सबसे खास पहल है इसके 'साइलेंट रीडिंग सेशन' (Silent Reading Sessions)। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहां शोर और डिजिटल नोटिफिकेशन हर समय बच्चों का ध्यान भटकाते हैं, ये सेशन एक ओएसिस की तरह हैं। यहां बच्चे अपनी पसंद की किताबें लेकर आते हैं और एक-दूसरे के साथ बैठकर, बिना किसी बातचीत के, सिर्फ पढ़ते हैं।

बच्चों को स्क्रीन से दूर रखने का नया तरीका: किताबों की दुनिया में वापसी

HIGHLIGHTS

  • neOwn बना नई उम्मीद
  • स्क्रीन से किताबों तक
  • बच्चों का नया Reading Trend
  • सोशल मीडिया Ban के बाद neOwn चर्चा में
  • किताबों की ओर लौटते बच्चे

श्रद्धा तिवारी


Silent Reading Sessions: ऑस्ट्रेलिया द्वारा 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगाने का फैसला आज पूरी दुनिया के लिए एक जागरूकता का संदेश बन चुका है। यह कदम सिर्फ एक कानूनी नियमन नहीं है, बल्कि एक बड़े सवाल को उठाता है—जब डिजिटल दुनिया हमारे बच्चों की नींद, ध्यान और मानसिक सेहत से खिलवाड़ कर रही हो, तो हमें क्या करना चाहिए? भारत सहित कई देश अब इस बहस में शामिल हो गए हैं। लेकिन क्या सिर्फ प्रतिबंध (Ban) ही समाधान है?

जैसे-जैसे यह बहस गहराती जा रही है, सवाल बदल रहा है। अब यह सिर्फ ‘स्क्रीन टाइम कम करने’ तक सीमित नहीं रह गया है। असली सवाल यह है कि जब हम बच्चों को स्क्रीन से दूर रखेंगे, तो उनके जीवन में उस खाली समय और जगह को क्या भरेंगे? क्या ऐसा कोई विकल्प है जो उन्हें स्क्रीन की तरह ही आकर्षित करे, लेकिन उनके विकास के लिए रचनात्मक और स्वस्थ भी हो?

इसी सवाल का जवाब भारत का एक टेक्नोलॉजी-आधारित प्लेटफॉर्म ‘neOwn’ दे रहा है, जो बच्चों को फिर से किताबों से जोड़ने का एक अनूठा प्रयास कर रहा है।

neOwn का दृष्टिकोण: रोक के स्थान पर बेहतर विकल्प

neOwn मानता है कि बच्चों को तकनीक से दूर रखने का एकमात्र तरीका ‘ना’ कहना नहीं है। आज के दौर में बच्चे स्मार्ट हैं और उन्हें आकर्षक अनुभव चाहिए। कंपनी का फिलॉसफी है कि अगर हम बच्चों को स्क्रीन से हटाकर बोरियत में डालेंगे, तो वे वापस फोन की ओर लौटेंगे। स्थायी बदलाव के लिए जरूरत है ऐसे अनुभवों की, जो उन्हें गहरी शांति, खुशी और सीखने का एहसास दें।

neOwn एक ऐसा प्लेटफॉर्म है जो बच्चों की किताबें किराए पर देता है, लेकिन इसका मकसद सिर्फ किताबें पहुंचाना नहीं, बल्कि एक ‘पढ़ने की संस्कृति’ (Reading Culture) को फिर से जीवित करना है। यह पढ़ने को सिर्फ एक शैक्षणिक जरूरत नहीं, बल्कि ध्यान केंद्रित करने और कल्पना शक्ति बढ़ाने का एक शक्तिशाली तरीका मानता है।

साइलेंट रीडिंग सेशन: एक नया सामाजिक प्रयोग

neOwn की सबसे खास पहल है इसके ‘साइलेंट रीडिंग सेशन’ (Silent Reading Sessions)। आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में, जहां शोर और डिजिटल नोटिफिकेशन हर समय बच्चों का ध्यान भटकाते हैं, ये सेशन एक ओएसिस की तरह हैं। यहां बच्चे अपनी पसंद की किताबें लेकर आते हैं और एक-दूसरे के साथ बैठकर, बिना किसी बातचीत के, सिर्फ पढ़ते हैं।

इन सत्रों का माहौल ध्यान लगाने के लिए बनाया जाता है। इसे और भी रोचक बनाने के लिए बच्चों के लिए छोटे-छोटे सरप्राइज और हल्की-फुल्की गतिविधियां होती हैं। यह एक ऐसा तरीका है जिससे पढ़ना उन्हें ‘टास्क’ नहीं, बल्कि एक ‘मजेदार गतिविधि’ लगती है। जब बच्चे देखते हैं कि उनके आस-पास अन्य बच्चे भी शांति से पढ़ रहे हैं, तो एक सकारात्मक सामाजिक दबाव (Peer Pressure) बनता है, जो उन्हें पढ़ने के लिए प्रेरित करता है।

बदलाव की कहानियां: माता-पिता और बच्चों की आवाज

इन प्रयासों के नतीजे अब सामने आने लगे हैं। माता-पिता के लिए यह एक राहत की बात है। एक माता-पिता ने अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा, “मेरी बेटी घर पर कभी भी 10 मिनट से ज्यादा शांत नहीं बैठती थी। हमें लगता था कि उसकी फोकस करने की क्षमता कम है। लेकिन जब मैंने उसे इन सेशन्स में दूसरे बच्चों के साथ लगातार 30 मिनट तक डूबकर पढ़ते देखा, तब मुझे समझ आया कि समस्या उसकी क्षमता में नहीं थी, बल्कि उसे उस तरह के माहौल की जरूरत थी।”

ये सेशन सिर्फ ध्यान नहीं, बल्कि भावनात्मक रूप से भी बच्चों को मजबूत कर रहे हैं। 9 साल की एक बच्ची के लिए यह एक ‘जुड़ाव’ महसूस करने की जगह बन गई। वह कहती हैं, “मुझे पहले लगता था कि सिर्फ मुझे ही पढ़ना पसंद है, शायद मैं अलग हूं। लेकिन यहां देखकर अच्छा लगा कि इतने सारे बच्चे किताबों से प्यार करते हैं। अब मुझे अकेलापन महसूस नहीं होता।”

इसके अलावा, ये सत्र बच्चों के भीतर छिपी प्रतिभा को भी बाहर ला रहे हैं। 11 साल के एक बच्चे के लिए यह रचनात्मक आत्मविश्वास बढ़ाने का जरिया बना। उसने बताया, “जब मैंने देखा कि मेरी उम्र के बच्चे सच में किताबें लिख रहे हैं, तो मुझे हौसला मिला। मैं भी अपनी नोटबुक में कहानियां लिखता हूं, लेकिन सोचता था कि किसी को इसमें दिलचस्पी नहीं होगी। अब मैं अपनी कहानी पूरी करके सबको दिखाना चाहता हूं।”

भविष्य की राह: प्रतिबंध से परे

ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के कड़े कदमों ने बहस शुरू कर दी है, लेकिन विशेषज्ञों की राय साफ है—बच्चों की डिजिटल आदतों को तोड़ने के लिए सिर्फ ‘रोक’ काफी नहीं है। बच्चों को धैर्य, कल्पना और भावनात्मक संतुलन सिखाने के लिए हमें उन्हें ‘स्लो लिविंग’ (Slow Living) के अनुभव देने होंगे। पढ़ना इसका सबसे शक्तिशाली माध्यम है।

neOwn के साइलेंट रीडिंग सर्कल जैसे प्रयास इसी दिशा में एक मील का पत्थर साबित हो सकते हैं। भारत में, जहां बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और डिजिटल निर्भरता को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं, ऐसे प्लेटफॉर्स उम्मीद की किरण बन रहे हैं।

आखिरकार, बड़ा सवाल यह नहीं है कि हम बच्चों को सोशल मीडिया से कैसे रोकेंगे, बल्कि यह है कि हम उनके जीवन में किताबों, कहानियों और सामूहिक पढ़ने के ऐसे अनुभवों को कैसे वापस लाएंगे, जो उन्हें स्क्रीन की चकाचौंध से बेहतर और गहरा आनंद दे। neOwn यही कोशिश कर रहा है—बच्चों को उनके बचपन की शांति और किताबों की दुनिया से फिर से रू-ब-रू कराना।

Sandhya Samay News

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