Delhi Police Department: जब संरक्षक ही संकट बन जाए, तो आम जनता का किस पर भरोसा करना चाहिए? दिल्ली पुलिस की 5वीं बटालियन में तैनात कांस्टेबल समय सिंह मीणा की गिरफ्तारी ने एक बार फिर पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं। 50 लाख रुपये की लूट का आरोपी, वो भी खुद एक पुलिसवाला—यह घटना किसी एक व्यक्ति की गिरावट का मामला नहीं है, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की नाकामयाबी का आईना है।
कागजों में दफन होकर सिर्फ औपचारिकता बनकर
सबसे बड़ी चिंताजनक बात यह है कि समय सिंह मीणा कोई नौसिखिया अपराधी नहीं था। पहले भी उसके खिलाफ 25 लाख रुपये की लूट सहित तीन संगीन मामले दर्ज थे। बावजूद इसके वह वर्दी ओढ़े दिल्ली की सड़कों पर गश्त कर रहा था। यह कैसे संभव है कि एक आपराधिक इतिहास वाले व्यक्ति की बैकग्राउंड वेरिफिकेशन में इतनी बड़ी चूक हुई? क्या विभाग के भीतर कोई ‘सत्यापन प्रक्रिया’ नाम की चीज मौजूद ही नहीं है, या फिर वह कागजों में दफन होकर सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई है?
मामला सिर्फ एक बीमारू दाने का नहीं
दरअसल, यह मामला सिर्फ एक बीमारू दाने का नहीं है, बल्कि पूरी फसल के खराब होने का संकेत है। दिल्ली जैसी महानगरीय व्यवस्था में बड़े बिल्डरों, अवैध निर्माण और रिश्वतखोरी के गठजोड़ से पुलिस तंत्र किस कदर चिपटा हुआ है, यह उत्तम नगर हत्याकांड जैसे मामलों से लेकर अनगिनत अवैध निर्माणों की शरण देने तक में साफ दिखता है। एक आम नागरिक की जिंदगी भर की कमाई और कुछ थानों में तैनात हेड कांस्टेबलों या कांस्टेबलों की अचानक बढ़ी हुई संपत्ति के बीच का अंतर किसी से छुपा नहीं है। जब एक सिपाही के पास आम आदमी से कहीं ज्यादा पैसा हो सकता है, तो 50 लाख की लूट तो बस एक ‘छोटा कदम’ नजर आता है।
एक ईमानदार छानबी पुलिस विभाग के कई बड़े अधिकारियों के राज सामने
सबसे दुखद पहलू यह है कि बड़े अधिकारी अक्सर अपने विभाग की ‘बदनामी’ बचाने के चक्कर में ऐसे खराब तत्वों को ढक देते हैं। गलती छुपाने की यह मानसिकता आखिरकार पूरे विभाग की साख को धूल में मिला देती है। अगर सच में एक ईमानदार छानबीन हो, तो शायद पुलिस विभाग के कई बड़े अधिकारियों के राज भी सामने आ जाएं, लेकिन ऐसा होना तंत्र के विरोध में जाना बराबर है। हाल ही में स्पेशल सेल के एक हेड कांस्टेबल पर एक आम मजदूर की गोली मारकर हत्या करने का आरोप लगना और अब इस लूटकांड ने साबित कर दिया है कि विभाग के भीतर जवाबदेही का तंत्र पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है।
लूटने वाले गिरोह बारीक जानकारी
50 लाख रुपये लूटने वाले गिरोह का मुखिया खुद एक पुलिसकर्मी हो, तो समझना चाहिए कि अपराधियों को पुलिस की नीतियों, रूटीन और सर्विलांस सिस्टम की कितनी बारीक जानकारी होती है। उसने किस तरह से अपने साथियों के साथ मिलकर हेलमेट पहनकर वारदात को अंजाम दिया और लंबे समय तक पुलिस को चकमा देता रहा, यह उसकी ‘शातिरता’ नहीं, बल्कि तंत्र की ढील का नतीजा है।
आंतरिक सड़ांध’ को सिर्फ प्रेस रिलीज
दिल्ली पुलिस और दिल्ली सरकार को अब इस ‘आंतरिक सड़ांध’ को सिर्फ प्रेस रिलीज जारी करके नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई के जरिए साफ करना होगा। जरूरत है एक पारदर्शी, बाहरी एजेंसी से जांच कराने की, ताकि यह पता लगाया जा सके कि समय सिंह जैसे लोगों को वर्दी पहनाने वाले और उनकी करतूतों पर आंखें मूंदने वाले अधिकारी कौन हैं।
खाकी की शान उसमें रचे ‘सेवा भाव’ से है, अपराधियों को शरण देने या स्वयं अपराध करने से नहीं। जब तक पुलिस विभाग अपने भीतर के गद्दारों को कठोरता से सजा नहीं देगा और बड़ी मछलियों को बचाने की राजनीति नहीं छोड़ेगा, तब तक आम जनता का यह भरोसा टूटता ही रहेगा कि ‘पुलिस हमारे लिए है’।




















