Vallabhacharya Jayanti 2026: वैशाख माह की कृष्ण एकादशी को मनाई जाने वाली वल्लभाचार्य जयंती इस वर्ष 13 अप्रैल 2026, सोमवार को पड़ रही है। भक्ति आंदोलन के स्वर्णिम युग में वल्लभाचार्य का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। उन्होंने श्रीकृष्ण भक्ति को एक नई दिशा दी और समाज को आध्यात्मिक रूप से समृद्ध किया।
आइए जानते हैं उनके जीवन से जुड़ी 5 खास और प्रेरक बातें—
1. जन्म और पारिवारिक जीवन
वल्लभाचार्य का जन्म 1479 ईस्वी में छत्तीसगढ़ के चंपारण्य में हुआ था। वे एक विद्वान तैलंग ब्राह्मण परिवार में जन्मे। उनके पिता लक्ष्मण भट्ट और माता इलम्मागारू थे। उनकी पत्नी का नाम महालक्ष्मी था और उनके दो पुत्र—गोपीनाथ और विट्ठलनाथ—थे। यद्यपि उनका जन्म दक्षिण भारत से जुड़े परिवार में हुआ, उनकी प्रमुख कर्मभूमि ब्रज और काशी रही।
2. शिक्षा और आध्यात्मिक मार्ग
उन्होंने काशी में रहकर वेद-शास्त्रों की गहन शिक्षा प्राप्त की। आगे चलकर उन्होंने महान आचार्यों से दीक्षा लेकर अपने आध्यात्मिक जीवन की दिशा तय की। वे वैष्णव परंपरा के प्रमुख स्तंभ बने और उन्होंने विष्णु स्वामी की परंपरा को नए रूप में विकसित किया।
3. शुद्धद्वैत और पुष्टिमार्ग की स्थापना
वल्लभाचार्य ने ‘शुद्धद्वैत’ दर्शन का प्रतिपादन किया, जिसमें ब्रह्म को शुद्ध और माया रहित माना गया है। उन्होंने ‘पुष्टिमार्ग’ की स्थापना की, जो ईश्वर की कृपा पर आधारित भक्ति मार्ग है। उनके प्रमुख ग्रंथों में अणुभाष्य, सुबोधिनी टीका और तत्वार्थदीप निबंध शामिल हैं।
4. श्रीनाथजी की भक्ति और सेवा परंपरा
उन्होंने भगवान कृष्ण के श्रीनाथजी स्वरूप की उपासना को विशेष महत्व दिया। इस स्वरूप में भगवान गोवर्धन पर्वत उठाए हुए हैं। आज राजस्थान के नाथद्वारा में श्रीनाथजी की पूजा अत्यंत विधिपूर्वक आठ प्रहरों में की जाती है, जो भक्तों को ईश्वर से जुड़ने का सजीव अनुभव कराती है।
5. शिष्य परंपरा और जल-समाधि
वल्लभाचार्य के 84 प्रमुख शिष्य थे, जिनमें भक्ति साहित्य के महान कवि भी शामिल थे। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम समय में काशी के हनुमान घाट पर गंगा में जल-समाधि ली। मात्र 52 वर्ष की आयु में उनका यह त्यागमय अंत उनके आध्यात्मिक उत्कर्ष का प्रतीक माना जाता है।























