कॉकरोच जनता पार्टी चींटी जनता पार्टी
---Advertisement---

मोदी युग और नेहरू युग का अंतर

26 मई को 12 साल पूरे होने और 27 मई को 62 साल बीत जाने का यह संयोग एक संदेश देता है। शक्ति और संसाधनों के बावजूद, यदि आप जनता के दिल में जगह नहीं बना पाते, तो आपका शासन केवल सत्ता का खेल बनकर रह जाता है। मोदी का 'सेवा सुशासन' अब भी सवालों के घेरे में है, जबकि नेहरू की याद आज भी लाखों लोगों को सकारात्मक ऊर्जा देती है। यही उनकी अमरता है। सत्य की यही जीत है।

नेहरू का त्याग और आज की राजनीति

HIGHLIGHTS

  • 12 साल बनाम 62 साल की विरासत
  • मोदी का जश्न, नेहरू की अमरता
  • सत्ता का उत्सव या राष्ट्र निर्माण?
  • 12 वर्षों का प्रचार, 62 वर्षों की प्रेरणा
  • सेवा सुशासन या सत्ता का प्रदर्शन?

History: The Modi Era and the Nehru Era News: इतिहास में अक्सर संयोग ऐसे होते हैं, जो समय की गहराई में छिपी सच्चाई को सामने ला देते हैं। हाल ही में भारतीय राजनीति में एक ऐसा ही संयोग देखने को मिला, जिसने देश के दो अलग-अलग युगों के बीच की तुलना को फिर से मुखर कर दिया। 26 मई को देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आए 12 वर्ष पूरे हो गए।

भाजपा और उसके समर्थकों के लिए यह एक उत्सव का अवसर था, जिसे ‘सेवा सुशासन स्थापना दिवस’ का नाम दिया गया। लेकिन इस उत्सव की रौनक बिखेरने के लिए समय ने ठीक अगले दिन, यानी 27 मई को एक ऐसी तारीख पेश कर दी, जो आधुनिक भारत के निर्माता पंडित जवाहरलाल नेहरू की 62वीं पुण्यतिथि थी। एक ओर 12 साल की सत्ता का जश्न मनाया जा रहा था, वहीं दूसरी ओर 62 साल पहले खोए गए एक दूरदर्शी नेता को याद किया जा रहा था। यह संयोग महज तारीखों का खेल नहीं है, बल्कि यह दो विचारधाराओं और दो शासन व्यवस्थाओं के बीच का अंतर स्पष्ट करता है।

बारह वर्षों में मोदी सरकार का कार्यकाल

पिछले बारह वर्षों में मोदी सरकार का कार्यकाल ‘उत्सवों की सरकार’ बनकर रह गया है। हर छोटी-बड़ी बात, और कई बार हार व नाकामी को भी जश्न के रूप में पेश किया गया। ‘ऑपरेशन सिंदू’ जैसी सैन्य कार्रवाई, जिसमें सेना को पीछे हटना पड़ा, या पुलवामा जैसे आतंकी हमले, जिसमें हमारे 40 जवान शहीद हुए, का भी राजनीतिक फायदे के लिए उत्सव मनाने जैसा व्यवहार किया गया। इसके विपरीत, नेहरू की छवि ऐसी रही है जो राजनीतिक चमक-दमक से परे है। मोदी और उनकी सरकार द्वारा लगातार एक दशक से अधिक समय तक नेहरू को बदनाम करने और उनकी विरासत पर सवाल उठाने के बावजूद, वे आज भी लाखों करोड़ों भारतीयों के दिलों में अमर हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि झूठ और प्रचार के बूते सत्य को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता।

‘जल जीवन मिशन’ महज कागजी प्रचार बनकर

मोदी के इन 12 वर्षों में सबसे चौंकाने वाली बात रही है सरकारी खजाने पर एक व्यक्ति के प्रचार और विलासिता में हुआ भारी खर्च। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले 12 वर्षों में मोदी सरकार ने अपनी पब्लिसिटी पर 5,987.46 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। यह औसतन रोजाना डेढ़ से पौने दो करोड़ रुपए है। क्या किसी लोकतांत्रिक देश में शासक के प्रचार पर इतना धन खर्च करना उचित है? इसके अलावा, मोदी की सुरक्षा पर सालाना 600 करोड़ रुपए और 2014 से 2026 तक उनके विदेश दौरों पर 16,815 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है।

10 हजार करोड़ का विमान, दस लाख का सूट, लाखों की घड़ी और चप्पलें—यह वह छवि है जो एक गरीबी भोग चुके और चाय बेचकर सियासत में आए नेता के वादों के ठीक विपरीत है। जनता की तिजोरी से खुद पर इतना भारी खर्च करना वहीं तब और दुखद हो जाता है, जब देश का 60 प्रतिशत आबादी आज भी शुद्ध पीने का पानी तक नहीं पा रही है। ‘जल जीवन मिशन’ जैसी योजनाएं महज कागजी प्रचार बनकर रह गई हैं।

इसके ठीक विपरीत, पंडित नेहरू का नेतृत्व स्वतंत्रता आंदोलन की भट्ठी में तपकर निखरा था। उन्हें करोड़ों रुपए की झूठी पब्लिसिटी की कभी जरूरत नहीं पड़ी। वे स्वयं ही एक आभामंडल थे। उनकी जैकेट, शेरवानी और टोपी महज कपड़े नहीं थे, बल्कि स्वतंत्र भारत की एक सभ्य और आत्मविश्वासी पहचान थी। जब नेहरू प्रधानमंत्री बने, तो देश भूख, गरीबी और महज 500 करोड़ रुपए के बजट से जूझ रहा था। फिर भी, उन्होंने आईआईटी, एम्स, इसरो और परमाणु अनुसंधान केंद्र जैसी दीर्घकालिक संस्थागत संरचनाएं खड़ी कीं। आज मोदी के पास 53.47 लाख करोड़ रुपए का बजट है, लेकिन इन 12 वर्षों में नेहरू जैसी कोई ठोस और संस्थागत उपलब्धि कहां है? इस सवाल का जवाब देश के सामने है ही नहीं।

हम यह भूल जाते हैं विकास

मोदी के 12 वर्षों को सफलता की कहानी कहने वाले यह भूल जाते हैं कि विकास केवल सड़कों और इमारतों से नहीं मापा जाता, बल्कि लोकतंत्र के स्वास्थ्य और न्यायपालिका की स्वतंत्रता से भी मापा जाता है। पिछले 12 वर्षों में लोकतंत्र और संविधान पर लगातार प्रहार हुए हैं। चुनाव आयोग और जांच एजेंसियों को ‘जेब में’ डालकर चुनाव जीतना इस शासन की पहचान बन गया है।

शुभेंदु अधिकारी, हिमंत बिस्वा सरमा और एकनाथ शिंदे जैसे नाम उस राजनीतिक पोंगा पंजे की गवाही हैं, जिसे ‘ऑपरेशन कमल’ के नाम से जाना जाता है। विपक्षी विधायकों को करोड़ों रुपए में खरीदकर सरकार गिराना और बनाना आजादी के बाद का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है, जिसकी छाया सीधे तौर पर सत्ता के गलियारों से जुड़ती है।

आर्थिक रूप से भी देश की स्थिति चिंताजनक है। रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर पर है, महंगाई चरम पर है और बेरोजगारी युवाओं के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। राहुल गांधी द्वारा किए गए आर्थिक मंदी के आगाह को सिरे से खारिज किया गया, लेकिन आज हालात वैसे ही बनते जा रहे हैं। विदेशों से काला धन वापस लाने का जुमला अब गायब हो चुका है और सवाल उठता है कि कहीं यही पैसा लेख-जोखा देखने के लिए विदेश दौरों में तो खर्च नहीं हो रहा है? नाम बदलने का खेल चल रहा है—राजपथ से कर्तव्यपथ, राजभवन से लोकभवन। ये नाम बदलकर सरकार को लगता है कि उसने अपना कर्तव्य निभा लिया है, लेकिन सच्चाई यह है कि यह महज दिखावा है।

नेहरू जी की यादे

जहां तक सुरक्षा और एकता का सवाल है, प्रधानमंत्री का ‘राम राज्य’ लाने का वादा ‘अडानी राज्य’ में बदलकर रह गया है। अयोध्या में राम मंदिर बनकर तैयार है, लेकिन राम के सद्गुणों—सत्य, प्रेम और त्याग—को समाज में बसाना कहीं भी सरकार की प्राथमिकता नहीं रही। मणिपुर जैसे राज्य जल रहे हैं और प्रधानमंत्री वहां जाने की बजाय सोशल मीडिया पर गर्मी से बचाव की सलाह दे रहे हैं।

इसके विपरीत, नेहरू ऐसे नेता थे, जो दंगों के बीच कूद पड़ते थे। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए अपनी पूरी संपत्ति (जो आज की कीमत से 12,000 करोड़ रुपए से अधिक हो सकती है) दान कर दी थी। यही ‘त्याग’ है। मोदी के इन 12 वर्षों के सामने नेहरू का यह त्याग एक कठिन सच की तरह खड़ा है, जो बताता है कि राष्ट्र निर्माता और सत्ता के भोगी में क्या फर्क है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

Join WhatsApp

Join Now

Join Telegram

Join Now