सदन की गरिमा या राजनीतिक ड्रामा?

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने बीएसी बैठक में एक बार फिर वह बात दोहराई है, जो भारतीय जनतंत्र की आत्मा है—रचनात्मक बहस, सार्थक भागीदारी और सदन के सुचारू कामकाज को सुनिश्चित करना। संसद का मतलब केवल यह नहीं है कि सत्ता पक्ष अपने बहुमत के बल पर विधेयक पारित करा ले, बल्कि इसका असल मतलब विपक्ष की आवाज सुनना और उसकी चिंताओं को सदन की कार्यवाही के माध्यम से समाधान की ओर ले जाना है।

स्पीकर के फैसले से बदल सकता है सदन का समीकरण

HIGHLIGHTS

  • बिल पास कराना है या सदन उखाड़ना?
  • लोकसभा में कामकाज का खाका तैयार
  • अवरोध की राजनीति बंद करे विपक्ष
  • सरकार और विपक्ष के बीच टकराव?
  • सदन में रचनात्मक बहस, हंगामा नहीं

भारतीय संसदीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत और सबसे बड़ी कमजोरी दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं—’संसदीय कार्यवाही’। जिस तरह से सदन में कानून बनते हैं, उससे लाखों-करोड़ों नागरिकों के जीवन की दिशा तय होती है। लेकिन, पिछले कुछ वर्षों से हम देख रहे हैं कि यही कार्यवाही अक्सर शोर-शराबे और अवरोधों की भेंट चढ़ जाती है। ऐसे में, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की अध्यक्षता में हुई बिजनेस एडवाइजरी कमेटी (BAC) की बैठक और उसमें तय किया गया मानसून सत्र का एजेंडा एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। इस बैठक में छह प्रमुख विधेयकों पर चर्चा के लिए समय निर्धारित किया गया है, जो न सिर्फ सरकार की नीतिगत दिशा को दर्शाते हैं, बल्कि विपक्ष की भूमिका की भी परीक्षा लेंगे।

रचनात्मक बहस की जरूरत

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने बीएसी बैठक में एक बार फिर वह बात दोहराई है, जो भारतीय जनतंत्र की आत्मा है—रचनात्मक बहस, सार्थक भागीदारी और सदन के सुचारू कामकाज को सुनिश्चित करना। संसद का मतलब केवल यह नहीं है कि सत्ता पक्ष अपने बहुमत के बल पर विधेयक पारित करा ले, बल्कि इसका असल मतलब विपक्ष की आवाज सुनना और उसकी चिंताओं को सदन की कार्यवाही के माध्यम से समाधान की ओर ले जाना है। जब स्पीकर सदन को ‘उत्पादक और गरिमापूर्ण’ बनाने की अपील करते हैं, तो यह एक औपचारिकता भर नहीं है। यह जनादेश की रक्षा का संकल्प है। जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनकर दिल्ली भेजती है, न कि टेबल थपथपाने और नारेबाजी करने के लिए, बल्कि उनकी समस्याओं का समाधान ढूंढने के लिए।

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू द्वारा विपक्ष को दी गई चेतावनी को दो तरह से देखा जा सकता है। एक तरफ यह सरकार का दबाव है, लेकिन दूसरी तरफ यह एक निर्वाचित सरकार का अधिकार भी है कि वह अपने विधायी कार्यक्रम को अवरुद्ध न होने दे। रिजिजू का कहना कि “अगर विपक्ष ने सुबह हंगामा किया तो नुकसान होगा,” यह एक तथ्यात्मक बयान है। सदन में हंगामे का सबसे बड़ा नुकसान देश की जनता और संसदीय लोकतंत्र को होता है। जब कोई विधेयक बिना चर्चा के पास हो जाता है या फिर हंगामे के चलते लटक जाता है, तो इसका खामियाजा उस किसान, उस छोटे उद्योगपति और उस आम नागरिक को भुगतना पड़ता है, जिसके लिए वह कानून बनाया जा रहा था।

विपक्ष को यह समझना होगा कि अवरोधकारी रणनीति लंबे समय तक जनता का आधार नहीं बना सकती। अगर विपक्ष सरकार की नीतियों में कमियां देखता है, तो उसे सदन के भीतर ही आंकड़ों और तर्कों के साथ उसका घेराव करना चाहिए, न कि माइक तोड़ने और वेल में खड़े होकर नारे लगाने का रास्ता अपनाना चाहिए। इस सत्र में विपक्ष की असली परीक्षा यही होगी कि वह अपने पारंपरिक तरीकों से हटकर सदन की व्यवस्था का सहयोगी बनता है या फिर पुरानी राह पर अटल रहता है।

स्पीकर की अवधारणात्मक भूमिका

मानसून सत्र से ठीक पहले एक और राजनीतिक बवंडर खड़ा होने वाला है—तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों के एनसीपीआई (शरद पवार खेमा) में विलय का मामला। सूत्रों के अनुसार, स्पीकर ओम बिरला इस मुद्दे पर सत्र शुरू होने से पहले ही अपना फैसला ले सकते हैं। यह मामला सिर्फ राजनीतिक दलों का नहीं है, बल्कि यह दसवीं अनुसूची (एंटी-डिफेक्शन लॉ) की परीक्षा है। स्पीकर के इस फैसले का सीधा असर सदन के अंदर सत्ता पक्ष और विपक्ष के संख्याबल पर पड़ेगा। यदि स्पीकर का फैसला विपक्ष के खिलाफ जाता है, तो सत्र के पहले दिन से ही तीखी बहस और हंगामे की आशंका बनी रहेगी। ऐसे में स्पीकर की सांविधानिक निष्पक्षता और न्यायिक प्रक्रिया के प्रति उनकी प्रतिबद्धता सबसे अधिक कसौटी पर कसी जाएगी।

छह विधेयक: भारत की नई दिशा के अड्डे

BAC बैठक में जिन छह विधेयकों पर चर्चा का समय तय किया गया है, वे भारत के विभिन्न पहलुओं—न्यायिक प्रशासन, डिजिटल पहचान, राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक संप्रभुता और औद्योगिक विकास—से जुड़े हैं। आइए इन विधेयकों के गहराई से मूल्यांकन करते हैं:

1. उच्चतम न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या वृद्धि विधेयक

न्यायपालिका किसी भी लोकतंत्र की रीढ़ है। भारत के उच्चतम न्यायालय में लंबित मामलों का बोझ अब सीमा के बाहर पहुंच चुका है। प्रधान न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने का प्रस्ताव तात्कालिक राहत जरूर दे सकता है, लेकिन यह कोई स्थायी समाधान नहीं है। चार घंटे की चर्चा में सदन को यह विषय भी छूना चाहिए कि क्या केवल संख्या बढ़ाने से न्याय मिलेगा? न्यायिक अवकाश का दुरुपयोग, अधीनस्थ अदालतों की संरचना और मामलों की जटिलता पर भी चर्चा होनी चाहिए। हालांकि, यह कदम लंबित मामलों के निपटारे की दिशा में एक सकारात्मक संकेत अवश्य है।

2. जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्र संबंधी विधेयक

डिजिटल भारत की कहानी में डेटा की शुद्धता सबसे महत्वपूर्ण अध्यारोहण है। जन्म और मृत्यु प्रमाणपत्रों में सख्ती लाने का विधेयक सतह पर सामान्य लगता है, लेकिन इसके गहरे सामाजिक और आर्थिक प्रभाव हैं। पहचान पत्र (आधार), वोटर आईडी, पासपोर्ट और सरकारी योजनाओं का आधार जन्म प्रमाणपत्र है। इस प्रक्रिया में पारदर्शिता और सख्ती लाने से फर्जी पहचान और धोखाधड़ी पर रोक लगेगी। विपक्ष को इस बात की चिंता करनी चाहिए कि ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में इस सख्ती से आम नागरिकों को परेशानी तो नहीं होगी? चार घंटे की चर्चा में इस विधेयक के कार्यान्वयन की जमीनी हकीकत पर प्रकाश डालना होगा।

3. राष्ट्रीय सम्मान के अपमान के रोकथाम संबंधी विधेयक

यह विधेयक सबसे अधिक संवेदनशील और चर्चित होने वाला है। राष्ट्रीय प्रतीकों (जैसे तिरंगा, राष्ट्रगान, राष्ट्रीय चिन्ह) के अपमान को लेकर और सख्त दंडात्मक प्रावधान करने का प्रस्ताव है। देशप्रेश का अनुभव करना एक बात है, लेकिन इसे कानूनी फ्रेमवर्क में बांधना एक अलग चुनौती है। सदन में इस पर चार घंटे की जो चर्चा होगी, उसमें ‘अपमान’ की परिभाषा को लेकर स्पष्टता आनी अत्यंत आवश्यक है। लोकतंत्र में असहमति की आजादी होती है, लेकिन यह सीमा कहां खत्म होती है और राष्ट्रविरोधी गतिविधि कहां से शुरू होती है, यह रेखा खींचना कठिन है। यदि इस कानून का दुरुपयोग राजनीतिक विरोद्धियों को दबाने के लिए होने लगा, तो यह लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला होगा। इसलिए यह विधेयक संसद की समझदारी का परचम लहराएगा।

4. विदेशी अंशदान (विनियमन) या FCRA संबंधी विधेयक

विदेशी चंदा और अनुदान हमेशा से राष्ट्रीय सुरक्षा और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का मुद्दा रहा है। सरकार का लक्ष्य इन अनुदानों की पारदर्शिता बढ़ाना है, जो एक स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि क्या इससे गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) का काम अवरुद्ध होगा? भारत जैसे विकासशील देश में सिविल सोसाइटी की भूमिका बेहद अहम होती है, चाहे वह आपदा राहत हो, पर्यावरण संरक्षण हो या शिक्षा। चार घंटे की बहस में सदन को यह संतुलन स्थापित करना होगा कि राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंता के बीच वास्तविक समाजसेवी कार्यों को बाधित न होने दिया जाए।

5. आयकर संबंधी विधेयक

वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में भारत की पहचान एक मजबूत अर्थव्यवस्था के रूप में कायम करने के लिए यह विधेयक ऐतिहासिक हो सकता है। अध्यादेश के रूप में आ रहे इस विधेयक का उद्देश्य भारत के सॉवरेन डेट मार्केट (Sovereign Debt Market) को मजबूती देना है। सरकारी बॉन्ड या ऋणपत्रों में विदेशी निवेश आकर्षित करना और बाजार में तरलता लाना इसका मुख्य उद्देश्य है। जब विदेशी निवेशक भारतीय सरकारी ऋण में पैसा लगाएंगे, तो भारत की ऋण लागत कम होगी और रुपया मजबूत होगा। हालांकि, इसमें वैश्विक बाजार की अस्थिरता का जोखिम भी छुपा है। विपक्ष को इस बहस का इस्तेमाल इस बात को उजागर करने के लिए करना चाहिए कि वैश्विक मंदी की स्थिति में भारत की आर्थिक संप्रभुता कैसे सुरक्षित रहेगी।

6. सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) विकास संबंधी विधेयक

इस सत्र में सबसे अधिक समय (5 घंटे) इसी विधेयक को दिया गया है, जो इसके महत्व को दर्शाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ MSME हैं, जो रोजगार सृजन के सबसे बड़े स्रोत हैं। कोविड-19 महामारी और जीएसटी के शुरुआती दौर में इस क्षेत्र को भारी झटका लगा। इस विधेयक के तीन मुख्य स्तंभ हैं—देरी से भुगतान की समस्या को हल करना, ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को बढ़ावा देना और राज्यों को अधिकार देना। विशेष रूप से ‘देरी से भुगतान’ का मुद्दा MSMEs के लिए सबसे बड़ा अभिशाप रहा है। बड़ी कंपनियां उनका पैसा फंसा कर उन्हें दिवालिया कर देती हैं। अगर इस विधेयक में देर से भुगतान पर स्वचालित और कड़ी कार्रवाई का प्रावधान है, तो यह क्रांतिकारी कदम होगा। इस पर पांच घंटे की चर्चा में सदन को केंद्र और राज्यों के बीच संघवाद को लेकर भी बातचीत करनी चाहिए, ताकि जमीनी स्तर पर इस कानून का क्रियान्वयन आसान हो सके।

समय का आवंटन

एक गंभीर संसदीय विश्लेषक की नजर में इन जटिल विधेयकों पर 4 से 5 घंटे की चर्चा हल्की लग सकती है। उदाहरण के लिए, आयकर संबंधी विधेयक या FCRA जैसे विधेयकों में तकनीकी और कानूनी जटिलताएं इतनी अधिक होती हैं कि उन्हें समझने और उन पर विस्तृत बहस के लिए अधिक समय की आवश्यकता होती है। हालांकि, वर्तमान संसदीय व्यवस्था और सत्र की सीमित अवधि को देखते हुए यह समय निर्धारण व्यावहारिक भी है। लेकिन सच्ची सफलता तभी है, जब यह चार घंटा सिर्फ नेताओं के भाषणों की बौछार न हो, बल्कि विधेयक की धाराओं पर गहन मंथन हो। इसके लिए संसदीय स्थायी समितियों (Standing Committees) की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। सरकार को चाहिए कि वह विधेयकों को सदन में लाने से पहले समितियों को भेजे, जहां विषय विशेषज्ञों की राय ली जा सके।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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