न्याय व्यवस्था की बेरुखी: आम जनता का दर्द

सच्चा विकास तभी संभव है जब आम आदमी की ऊर्जा अदालत के चक्करों में नहीं, बल्कि अपने परिवार और देश के निर्माण में लगेगी। न्यायालयों और पुलिस स्टेशनों के दरवाजे आम आदमी के लिए राहत का केंद्र होने चाहिए, भय और उलझन का अड्डा नहीं।

कानून का मजाक उड़ाती निचली अदालतें (फाइल फोटो)

HIGHLIGHTS

  • तारीख पर तारीख: न्याय का अपमान
  • छोटे झगड़े, बड़ी सजा
  • थाने की लापरवाही, कोर्ट का जंजाल
  • इलाका छोड़ा, लेकिन कोर्ट नहीं छोड़ा

The Apathy of the Judicial System, The Pain of the Common People: भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत इसका संविधान और स्वतंत्र न्यायपालिका मानी जाती है। किसी भी नागरिक को न्याय मिलने का अधिकार संवैधानिक गारंटी के तहत सुरक्षित है। लेकिन, जब हम इस सिद्धांत को जमीनी स्तर पर, यानी देश की जिला और अनुविभागीय निचली अदालतों (Lower Courts) के कोर्टरूम में उतरकर देखते हैं, तो यह आदर्य वास्तविकता के आईने में बुरी तरह टूटता दिखता है। आज निचली अदालतों की जमीनी हकीकत यह है कि एक मामूली कहासुनी, पड़ोसियों का छोटा-मोटा झगड़ा, या रास्ते से गुजरते समय हुई एक तकरार भी कई-कई सालों तक “तारीख पर तारीख” के अजीब और दुखद जाल में फंसकर रह जाती है।

यह वह जाल है जिसमें कोई जहरीला सांप नहीं होता, ना ही कोई शिकारी जानवर, बल्कि यह जाल बुना है न्याय व्यवस्था की अकर्मण्यता, पुलिस प्रशासन की लापरवाही और कानूनी जटिलताओं के उस तंत्र ने, जो आम आदमी की जिंदगी को नरक बना देता है। सबसे दुखद पहलू यह है कि इस खामियाजे को सबसे ज्यादा भुगतना पड़ता है समाज के उस सीधे-सादे, शरीफ और कानून का सम्मान करने वाले व्यक्ति को, जिसने कभी सोचा भी नहीं था कि उसकी जिंदगी एक थाने और कोर्ट की चक्की में पीस जाएगी।

‘जांच का ढकोसला और तुच्छ घटनाओं का पहाड़ बनना’

किसी भी आपराधिक मामले की नींव थाने से ही शुरू होती है। अक्सर देखा गया है कि छोटे-मोटे आपसी विवादों में पुलिस का रवैया या तो सक्रियता से ज्यादा का होता है, या फिर बेरुखी भरा। मौके पर पहुंचकर एक समझदार पुलिस अधिकारी या कर्मचारी का काम यह होना चाहिए कि वह दोनों पक्षों को शांत कराए, बातचीत के जरिए मामले को सुलझाने की कोशिश करे और समझौता कराकर शांति बहाली करे। लेकिन आज का दौर ऐसा नहीं है।

आज की पुलिस या तो अपनी जांच की जिम्मेदारी से बचने के लिए, या फिर मामले को औपचारिकता पूरी करने के नाम पर, बिना किसी तर्क-वितर्क के सीधा एफआईआर (FIR) दर्ज कर देती है। एक गाली या एक थप्पड़ के मामले को भी पुलिस आपराधिक साजिश की तरह पेश करती है। इसके बाद शुरू होता है ढीली तफ्तीश का दौर। चश्मदीद गवाहों के बयान दर्ज न होना, मेडिकल रिपोर्ट में देरी, और चार्जशीट दाखिल करने में लगने वाला महीनों का समय—ये सब मिलकर एक मामूली बहस को सालों लंबे क्रिमिनल केस में बदल देते हैं। पुलिस जब अपनी जांच पूरी करके चार्जशीट लगाती है, तब तक दोनों पक्षों का गुस्सा शांत हो चुका होता है, लेकिन कानूनी पेंच तो अब अदालत में जकड़ चुका होता है।

इलाका छोड़ दिया, पर कोर्ट का पीछा नहीं छूटा

हमारे देश में परिवार और पड़ोस के रिश्ते बहुत गहरे होते हैं, और इनी रिश्तों में टकराव भी उतना ही तीखा होता है। हैरानी की बात यह है कि कई बार विवाद इतना बढ़ जाता है कि शांति से जीने की चाह रखने वाला शरीफ आदमी, अपनी मानसिक शांति बनाए रखने के लिए, उस इलाके या शहर को ही छोड़कर दूसरी जगह बस जाता है। वह अपनी पुश्तैनी संपत्ति या घर भी बेच देता है, बस उस झगड़े से दूर होने के लिए।

तार्किक तौर पर, जब एक पक्ष वहां से चला गया हो और दोनों पक्षों के बीच अब कोई व्यावहारिक या भौतिक विवाद ही नहीं बचता, तो मामले का अस्तित्व ही समाप्त हो जाना चाहिए। लेकिन हमारी कोर्ट की फाइलें ऐसी नहीं होतीं। सालों बाद भी अदालतें उस शरीफ व्यक्ति के नए पते पर समन (Summon) और तारीखें भेजती रहती हैं। उसे अपनी नई नौकरी छोड़कर, अपने नए शहर से सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर वकीलों की फीस देकर अदालत का चक्कर लगाना पड़ता है। जिस मामले को एक-दो सुनवाई में आपसी समझौते या जुर्माने के साथ बंद किया जा सकता था, उसे सालों तक खींचना सिर्फ आम जनता को परेशान करने जैसा ही है। यहीं से नागरिक के मन में कानून के प्रति घृणा पैदा होती है।

लंबित मामलों का बोझ और आम आदमी का दर्द

राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (National Judicial Data Grid) और अन्य आंकड़े यह बयां करते हैं कि देश की अदालतों में 5 करोड़ से भी ज्यादा मामले लंबित (Pending) हैं। इनमें से एक बहुत बड़ा और चौंकाने वाला हिस्सा ऐसे ही छोटे-मोटे विवादों, तुच्छ अपराधों (Petty Offences) और आपराधिक डराने-धमकाने वाले मामलों का है।

इन तुच्छ मामलों के कारण दो बड़ी समस्याएं पैदा होती हैं। पहला, अदालतों का कीमती समय बर्बाद होता है। एक जज के पास जो सीमित समय और संसाधन होते हैं, वे इन फालतू मामलों में दबकर खत्म हो जाते हैं। जिसका असर उन गंभीर मामलों पर पड़ता है जिनमें किसी निर्दोष की जिंदगी दांव पर लगी हो या जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हों। दूसरा, इन छोटे मामलों के चलते जेलों में बंद अंडरट्रायल्स (Undertrials) की संख्या भी आसमान छूती है। एक सर्वे बताता है कि जेलों में बैठे करीब 70 प्रतिशत से अधिक कैदी अभी तक दोषी नहीं करार दिए गए हैं,त्र और इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिन पर गैर-जमानतीय (Non-bailable) धाराओं में छोटे झगड़े के केस दर्ज हो गए। वे जमानत न मिलने के कारण या जमानत की रकम भरने में असमर्थ होने के कारण सालों तक जेल की हवा खाते हैं। क्या यह न्याय है?

कानूनी प्रावधान: कागजों पर उपाय हैं, लेकिन जमीन पर अमल नहीं

जब हम इस समस्या का गहराई से विश्लेषण करते हैं, तो हमें पता चलता है कि कानून में इन छोटे मामलों को सुलझाने के उपाय मौजूद हैं, लेकिन न तो पुलिस और न ही अदालतें उनका इस्तेमाल करना चाहती हैं।

पहला बिंदु है धारा 320 दण्ड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और अब नए भारतीय न्याय संहिता (BNSS) में ‘समझौता योग्य अपराध’ (Compounding of Offences) का प्रावधान। कानून में स्पष्ट रूप से लिखा है कि छोटे-मोटे झगड़े, मारपीट (जिसमें गंभीर चोट न आई हो), गाली-गलौज, और चोरी जैसे कई मामलों को कोर्ट के बाहर या कोर्ट की सहमति से आपसी समझौते (Compromise) द्वारा खत्म किया जा सकता है। लेकिन अदालतों में इसकी प्रक्रिया इतनी जटिल और लंबी होती है कि वकील समझौता कराने के बजाय तारीखें बढ़ाने में ही रुचि लेते हैं। न्यायालयों को चाहिए कि वे ऐसे मामलों में सक्रियता दिखाते हुए, दोनों पक्षों से बात करें और समझौते को बढ़ावा देकर केस तुरंत बंद करने का रास्ता निकालें।

दूसरा बिंदु है लोक अदालत (Lok Adalat) का। भारत में लोक अदालत की अवधारणा दुनिया की सबसे सफल वैकल्पिक विवाद समाधान प्रणालियों में से एक है। हर कुछ महीनों में राष्ट्रीय लोक अदालत (National Lok Adalat) लगती है, जिसका मकसद ही यही है कि छोटे और पेंडिंग मामलों को आपसी समझौते से तुरंत खत्म किया जाए, जिससे न्याय के साथ-साथ दोनों पक्षों की गरिमा भी बनी रहे। लेकिन दुख की बात यह है कि पुलिस और निचली अदालतें छोटे मामलों को सीधे लोक अदालत में भेजने की पहल करने के बजाय, उन्हें न्यायिक प्रक्रिया के उस चक्रव्यूह में फंसा कर रखती हैं। अगर थाने पर ही एफआईआर के स्थान पर दोनों पक्षों को लोक अदालत के अगले सत्र के लिए तैयार कर लिया जाए, तो लाखों मामलों का निस्तारण हो सकता है।

कानून का भय बन रहा है सामाजिक शत्रु

आम आदमी आज अदालतों के चक्कर काटकर थक चुका है। उसकी कोई सीधी सुनवाई नहीं होती। कोर्ट परिसर में घूसखोरी, वकीलों की मनमानी फीस और हर बार छुट्टी होने के डर का अंदाजा केवल वही लगा सकता है जिसने इस चक्कर को कभी काटा हो। एक छोटे किसान, एक मध्यमवर्गीय कर्मचारी, या एक छोटा व्यापारी जब कोर्ट के चक्कर में पड़ता है, तो उसकी पूरी जिंदगी, उसके बच्चों की पढ़ाई और उसकी आर्थिक स्थिति तबाह हो जाती है।

इसका एक गंभीर मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी दिखता है। जो व्यक्ति शरीफ होता है, वह अक्सर डर का शिकार हो जाता है। उसे लगता है कि कानून उसके साथ नहीं है। उल्टा, जो व्यक्ति चतुर, बदमाश और पैसे वाला होता है, वह कानून को मखौल समझता है। वह जानता है कि वकीलों की फीस देकर तारीखें बढ़वाई जा सकती हैं। ऐसे में कानून का भय समाज के अच्छे लोगों के लिए एक सामाजिक शत्रु बनकर खड़ा हो जाता है।

समाधान का रास्ता: त्वरित निपटारे और तंत्र की सक्रियता

जब तक छोटे मामलों के त्वरित निपटारे के लिए पुलिस और न्यायपालिका मिलकर कड़े कदम नहीं उठाएंगे, तब तक आम जनता न्याय के नाम पर केवल प्रताड़ित होती रहेगी। कुछ ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है:

  1. थाना स्तर पर समझौते को बढ़ावा: पुलिस को छोटे विवादों में एफआईआर लिखने से पहले ‘समझौता निबंधन’ कराने का अधिकार और प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। गैर-गंभीर मामलों में एफआईआर दर्ज करने को अंतिम उपाय माना जाना चाहिए, पहला उपाय वार्ता होना चाहिए।
  2. न्यायिक मैजिस्ट्रेट की भूमिका: जब पुलिस चालान (चार्जशीट) पेश करती है, तो न्यायिक मैजिस्ट्रेट को पहली सुनवाई में ही दोनों पक्षों से पूछना चाहिए कि क्या वे समझौता चाहते हैं। अगर दोनों पक्ष राजी हों, तो फाइल को तुरंत लोक अदालत या समझौते की प्रक्रिया के लिए भेज देना चाहिए, बजाय इसके कि गवाहों की लिस्ट बनाकर सालों का इंतजार किया जाए।
  3. तुच्छ मामलों में जमानत की सुविधा: जिन मामलों में सजा 3 साल या उससे कम की हो, उनमें थाने पर ही जमानत की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि कोई निर्दोष जेल की सलाखों के पीछे न डाला जाए। नए भारतीय न्याय संहिता (BNSS) में इस दिशा में कुछ प्रावधान हैं, लेकिन उनका कठोरता से पालन सुनिश्चित करना होगा।
  4. वकीलों की जवाबदेही: कई बार वकील अपनी फीस बढ़ाने के लिए गलत लक्ष्य देकर मामले को लटकाते हैं। बार काउंसिल को ऐसे वकीलों पर नजर रखनी चाहिए जो तुच्छ मामलों में जानबूझकर टालमटोल कराते हैं।

अगर हम चाहते हैं कि भारत का नागरिक अपने संविधान और कानून पर भरोसा करे, तो हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि उसे “तारीख” नहीं, बल्कि समय पर “न्याय” मिले। न्याय का अर्थ केवल दोषी को सजा देना नहीं है, बल्कि निर्दोष को उसके दुखों से मुक्ति देना भी है।

एक समझदार समाज वह है जो छोटी बातों पर बलिदान और समझौता कर सके और एक समझदार न्यायपालिका वह है जो नागरिकों के इस समझौते का सम्मान करे, उसे कानूनी तौर पर मान्यता दे और उन्हें उस जाल से मुक्त करे जो “तारीख पर तारीख” कहलाता है। सच्चा विकास तभी संभव है जब आम आदमी की ऊर्जा अदालत के चक्करों में नहीं, बल्कि अपने परिवार और देश के निर्माण में लगेगी। न्यायालयों और पुलिस स्टेशनों के दरवाजे आम आदमी के लिए राहत का केंद्र होने चाहिए, भय और उलझन का अड्डा नहीं।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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