Delhi News: देश की अर्थव्यवस्था की असली रीढ़ माने जाने वाले असंगठित क्षेत्र के लगभग 43 करोड़ श्रमिकों के अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ा मंथन हुआ। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) समेत श्रम मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने एक स्वर में कहा कि श्रमिकों के अधिकारों को ‘मानवाधिकार’ के दृष्टिकोण से देखना अब समय की सबसे बड़ी मांग है।
भारतीय रेलवे माल गोदाम श्रमिक संघ (BRMGSU) की ओर से राजधानी के ‘कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया’ में आयोजित इस राष्ट्रीय सम्मेलन में नीतिगत चुनौतियों और जमीनी वास्तविकताओं पर गहन चर्चा की गई।
ILO का स्पष्ट संदेश- “अर्थव्यवस्था की रीढ़ असुरक्षित”
सम्मेलन को संबोधित करते हुए आईएलओ के मुख्य तकनीकी अधिकारी जियोवानी सोलेदाद ने बेहद कड़ी बातें कहीं। उन्होंने कहा, “ये श्रमिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, लेकिन दुखद सच यह है कि वे औपचारिक मान्यता और सुरक्षा से वंचित हैं।”
सोलेदाद ने चेतावनी दी कि प्रतिनिधित्व की कमी और सामूहिक सौदेबाजी न होने के कारण ये श्रमिक शोषण के लिए सबसे अधिक संवेदनशील हैं। उन्होंने बताया कि इनमें से अधिकतर श्रमिकों के पास न तो कोई औपचारिक अनुबंध है और न ही स्वास्थ्य बीमा, पेंशन या दुर्घटना मुआवजे जैसी सामाजिक सुरक्षा। उन्होंने अपर्याप्त आय को ‘बाल श्रम’ की सबसे बड़ी वजह बताया और झारखंड-राजस्थान में आईएलओ द्वारा चलाए गए सफल मॉडलों का जिक्र किया।
NHRC ने श्रमिक अधिकारों को मानवाधिकार से जोड़ा
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के सदस्य प्रियांक कानूनगो ने नए श्रम कानूनों की जानकारी देते हुए बताया कि इस बारे में श्रमिकों में काफी उत्साह और जागरूकता देखी जा रही है। कानूनगो ने कहा, “श्रमिकों के अधिकारों को मानवाधिकार के रूप में देखना आवश्यक है। केंद्र सरकार द्वारा लाए गए नए श्रम कानूनों का लाभ लगभग 43 करोड़ श्रमिकों तक पहुंचाने का हमारा लक्ष्य है।” उन्होंने नीतियों की जानकारी ग्राम स्तर तक पहुंचाने पर जोर दिया।
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“निश्चित वेतन और नियुक्ति पत्र जरूरी”
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे BRMGSU के राष्ट्रीय अध्यक्ष परिमल कांती मंडल ने श्रमिकों की जमीनी मांगों को रखा। उन्होंने कहा कि बिना निश्चित वेतन, नियुक्ति पत्र और श्रम कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन के श्रमिकों का सम्मान सुनिश्चित नहीं हो सकता।
उन्होंने बताया कि उनके संगठन का मुख्य उद्देश्य असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को एक मंच पर लाकर उन्हें सरकारी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ना है, ताकि उन्हें सम्मानजनक जीवन और स्थायी आजीविका मिल सके।
सरकार और संगठनों के बीच बनेगी बहु-स्तरीय रणनीति
इस मंच पर श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के लेबर वेलफेयर असिस्टेंट संदीप चौरसिया, एटीएसईसी के संजय कुमार मिश्रा और विश्वजीत घोष समेत कई विशेषज्ञों ने अपने विचार रखे।
सम्मेलन के अंत में सभी पक्षों ने इस निष्कर्ष पर सहमति जताई कि श्रमिकों को सुरक्षा के दायरे में लाने के लिए सिर्फ सरकार ही नहीं, बल्कि एनजीओ, श्रमिक संघों और उद्योगों के बीच ‘बहु-स्तरीय सहयोग’ (Multi-level cooperation) अनिवार्य है। उम्मीद जताई गई कि इस तरह के संवाद से भविष्य में ठोस नीतिगत बदलाव आएंगे और जमीनी स्तर पर श्रमिकों के जीवन में सुधार होगा।

























