मोहन गार्डन में ठेकेदारों की मनमानी, नगर निगम की चुप्पी

कूड़े की गाड़ी के न आने के कारण लोगों के घरों में कचरा जमा होता जा रहा है। जब लोगों की मजबूरी की हद पार हो जाती है, तो उन्हें अपने ही मोहल्ले की सड़कों और खाली प्लॉट्स पर यह कचरा फेंकना पड़ता है। आने-जाने वाले लोगों, जानवरों और सड़कों पर बिखरे कूड़े के कारण एक अजीब सी उठग-बैठग मची रहती है।

मोहन गार्डन की गंदगी बनी बड़ा सवाल

HIGHLIGHTS

  • नई गाड़ियां कहां? जनता पूछ रही सवाल
  • कूड़ा नहीं उठा, सड़कें बनीं डंपिंग ग्राउंड
  • मोहन गार्डन में सफाई का संकट गहराया
  • गंदगी के ढेर, जिम्मेदार बेखबर

दिल्ली, जिसे अक्सर भारत की धड़कन और एक विश्वस्तरीय राजधानी होने का दर्जा दिया जाता है, आज अपनी ही बुनियादी समस्याओं से घिरी हुई है। सड़कें चमकदार हों, मेट्रो की रफ्तार तेज हो, लेकिन जब बात सबसे बुनियादी जरूरत—सफाई और स्वच्छता—की आती है, तो यह शहर कई बार एक गंवार और उपेक्षित गांव से भी बदतर नजर आता है। दिल्ली के पश्चिमी क्षेत्र में स्थित मोहन गार्डन आज इसी बदहाली और तंत्र की नाकामी का जीता-जागता उदाहरण बनकर सामने आया है। यहां कई दिनों से कूड़े की गाड़ी के न आने का सिलसिला लगातार जारी है, जिसने स्वच्छता पर गहरा कलंक लगा दिया है और आम जनता के जीवन को नरक बना दिया है।

गलियों में फैला कूड़ा और जनता की मजबूरी

किसी भी सभ्य समाज में सुबह की शुरुआत ताजी हवा और साफ-सुथरे वातावरण से होती है, लेकिन मोहन गार्डन की गलियों में आज सुबह का मतलब कूड़े के ढेर और दुर्गंध है। आम जनता अपने घरों में जो कचरा इकट्ठा करती है, उसे सुबह कूड़े की गाड़ी आने पर ही फेंकने की परंपरा और जिम्मेदारी निभाती रही है। लोग सुबह उठकर अपना कचरा लेकर गलियों में खड़े हो जाते हैं, ताकि गाड़ी आते ही उन्हें इस गंदगी से छुटकारा मिल सके। लेकिन पिछले कई दिनों से जो नजारा देखने को मिल रहा है, वह हैरान करने वाला है।

कूड़े की गाड़ी के न आने के कारण लोगों के घरों में कचरा जमा होता जा रहा है। जब लोगों की मजबूरी की हद पार हो जाती है, तो उन्हें अपने ही मोहल्ले की सड़कों और खाली प्लॉट्स पर यह कचरा फेंकना पड़ता है। आने-जाने वाले लोगों, जानवरों और सड़कों पर बिखरे कूड़े के कारण एक अजीब सी उठग-बैठग मची रहती है। लोग एक-दूसरे पर अनजाने में ही आरोप लगाते हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि यह उठग-बैठग तंत्र की विफलता का परिणाम है। आम जनता स्वच्छता बनाए रखने के लिए तत्पर है, लेकिन सिस्टम उसे कूड़ा फेंकने के लिए मजबूर कर रहा है।

फोटो-ऑप की स्वच्छता बनाम जमीनी हकीकत

यहां सबसे दुखद और निंदनीय पहलू यह है कि दिल्ली सरकार और नगर निकाय इस मामले में पूरी तरह से संवेदनहीन नजर आ रहे हैं। कुछ दिन पहले ही दिल्ली सरकार ने जोर-शोर से ‘स्वच्छ दिल्ली’ अभियान के तहत कूड़े की नई गाड़ियों का उद्घाटन किया था। टीवी चैनलों और अखबारों में फ्लैश न्यूज चलाई गई, बड़े-बड़े बैनर लगाए गए और नेताओं ने तस्वीरें खिंचवाईं। दावा किया गया कि अब दिल्ली की सड़कें और गलियां चमकेंगी, कूड़ा उठाने की व्यवस्था पूरी तरह से चुस्त और दुरुस्त की जा रही है।

लेकिन मोहन गार्डन जैसे इलाकों की जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। वह चमचमाती हुई नई गाड़ियां, जिनका फीता काटा गया था, आज तक मोहन गार्डन की गलियों में नजर नहीं आई हैं। यह खुलासा करता है कि ये उद्घाटन केवल फोटो-ऑप और चुनावी या प्रशासनिक राजनीति के लिए थे, जनता की सेवा के लिए नहीं। अगर सरकार के पास नई गाड़ियां आई हैं, तो वे कहां हैं? क्या वे केवल वीआईपी इलाकों या उन सड़कों तक सीमित हैं जहां नेताओं का आना-जाना लगा रहता है? क्या मोहन गार्डन जैसे आम और घनी आबादी वाले इलाके इस बुनियादी सुविधा के हकदार नहीं हैं? यह विरोधाभास ही दिल्ली सरकार की नीतियों पर सवालिया निशान खड़ा करता है। कागजों पर स्वच्छ दिल्ली बनाने के दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जमीन पर गंदगी का अंबार लगा हुआ है, जो स्वच्छता पर कलंक के रूप में सामने आ रहा है।

स्वास्थ्य और पर्यावरण पर गंभीर खतरा

कूड़े के ढेर लगना केवल एक दृश्य परेशानी नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर स्वास्थ्य आपदा की ओर इशारा करता है। मोहन गार्डन जैसे क्षेत्रों में आबादी बहुत घनी है। यहां बच्चे, बुजुर्ग और बीमार लोग रहते हैं। कई दिनों से सड़ा हुआ कूड़ा जहरीली गैसों उत्पन्न कर रहा है, जो हवा में मिलकर दमा, अस्थमा और सांस से जुड़ी अन्य बीमारियों को न्योता दे रहा है।

इसके अलावा, सड़कों पर पड़े कूड़े में मच्छरों और कीटाणुओं का प्रजनन तेजी से होता है। दिल्ली में डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया जैसी बीमारियां हर साल तबाही मचाती हैं। कूड़े के ढेर इन बीमारियों के लिए एक पोषक क्षेत्र का काम करते हैं। जब बारिश का मौसम आएगा, तो यही कूड़ा पानी में बहकर नलों और नालियों को जाम करेगा, जिससे जलभराव और संक्रमण का खतरा कई गुना बढ़ जाएगा।

आवारा जानवरों—खासकर सड़कों पर घूमने वाले कुत्तों और गायों को यह सड़ा हुआ कचरा खाने को मिलता है, जिससे उनके स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है और वे आक्रामक हो जाते हैं। प्लास्टिक के कूड़े को जानवर निगल लेते हैं, जिससे उनकी मौत भी हो सकती है। यह पूरा माहौल इंसानों और जानवरों दोनों के लिए जहरीला बन चुका है। क्या सरकार को इस बात का अंदाजा नहीं है कि स्वच्छता का मतलब सिर्फ सड़कें धोना नहीं है, बल्कि जनता को बीमारियों से बचाना भी है?

तंत्र की विफलता और जवाबदेही का अभाव

मोहन गार्डन में कूड़े न उठने की समस्या अचानक उत्पन्न नहीं हुई है। यह तंत्र की लचरता और जवाबदेही के अभाव का परिणाम है। जब एक दिन कूड़ा नहीं उठता, तो इसका अर्थ है कि कोई तालमेल टूट गया है, लेकिन जब कई दिनों तक यह स्थिति बनी रहे, तो इसका मतलब साफ है कि संबंधित विभाग को इसकी कोई परवाह ही नहीं है।

आज के दौर में तकनीक इतनी उन्नत है कि कूड़े की गाड़ियों में GPS लगा हुआ है। नियंत्रण कक्ष में बैठे अधिकारी रियल-टाइम में देख सकते हैं कि गाड़ी कहां है। फिर भी मोहन गार्डन जैसे इलाकों में गाड़ियों को रोका या रूट बदला जा रहा है, तो इसके पीछे स्पष्ट रूप से माफिया राज, ठेकेदारों की मनमानी या अधिकारियों की लापरवाही शामिल है। शायद ठेकेदार ईंधन की बचत कर रहा है, या फिर ड्राइवरों और सफाई कर्मचारियों की कमी का बहाना किया जा रहा है।

लेकिन जनता को इन बहानों से कोई मतलब नहीं है। जनता सिर्फ इतना जानना चाहती है कि जब उसने टैक्स भरा है, जब सरकार ने नई गाड़ियां खरीदने के लिए बजट पास किया है, तो उसके मोहल्ले में सफाई क्यों नहीं हो रही है? इस मामले में क्षेत्रीय पार्षद, विधायक और नगर निगम के अधिकारी सब के सब चुप्पी साधे बैठे हैं। चुनाव के समय ये नेता गली-गली घूमकर स्वच्छता के वादे करते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद वे जनता की समस्याओं से मुंह मोड़ लेते हैं।

करदाताओं की अनदेखी

इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा धक्का उन नागरिकों को लगता है, जो ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करते हैं। मोहन गार्डन के लोग प्रॉपर्टी टैक्स, वाटर टैक्स और अन्य सरकारी शुल्क समय पर भरते हैं। उनका यह अधिकार बनता है कि उन्हें बुनियादी सुविधाएं मिलें। स्वच्छता कोई इनाम या तोहफा नहीं है, बल्कि यह नागरिकों का मौलिक अधिकार है।

जब सरकार करदाताओं के पैसे से नई गाड़ियां खरीदती है, तो उन गाड़ियों को सड़कों पर उतारना भी उसकी जिम्मेदारी है। अगर गाड़ियां डिपो में खड़ी रहेंगी, तो उनका क्या फायदा? मोहन गार्डन की जनता जब सुबह अपना कचरा लेकर सड़क पर खड़ी होती है और गाड़ी का इंतजार करती है, तो उसके मन में एक निराशा और गुस्सा आता है। यह गुस्सा तब और बढ़ जाता है जब उसे पता चलता है कि सरकार ने नई गाड़ियों का उद्घाटन तो कर दिया, लेकिन उन्हें चलाने की व्यवस्था नहीं की। यह लोकतंत्र में तंत्र और जनता के बीच की बढ़ती दूरी को दर्शाता है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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