जब देश के सर्वोच्च न्यायालय ने तीन हास्य कलाकारों (कॉमेडियन्स) से यह प्रश्न पूछा कि ‘‘क्या आप लोगों को न्यायालय को खेल समझ लिया है?’’, तो शायद यह प्रश्न उन कलाकारों से ज्यादा न्यायपालिका को खुद से पूछना चाहिए था। इस एक सवाल ने उस दर्द और कुंठा को सामने ला दिया, जिसे लेकर आज देश का एक बड़ा तबका बेचैन है। जिन लोगों ने न्याय की अंतिम उम्मीद के रूप में अदालतों को देखा, उनके चेहरों पर तब एक कृत्रिम हंसी छा गई, जो अपने आप में न्याय व्यवस्था की विफलता का सबसे बड़ा सबूत है। पिछले एक दशक से भी अधिक समय में भारत के विभिन्न स्तरों—जिला, उच्च और सर्वोच्च न्यायालयों—ने खुद को इतना निरुत्साहित और कमजोर किया है कि उसकी मजाकिया प्रस्तुतियां अब किसी को आश्चर्यचकित नहीं करतीं।
यह सवाल उस घटनाक्रम के बाद और तीखा हो जाता है, जब देश के मुख्य न्यायाधीश लगभग पचास वरिष्ठ न्यायाधीशों के साथ इंग्लैंड के दौरे पर गए। उस दौरे की तस्वीरें, जिनमें न्यायाधीश तत्कालीन कानून मंत्री किरेन रिजिजू के साथ बैडमिंटन कोर्ट पर रैकेट लेकर खड़े नजर आ रहे थे, जनता के दिमाग में एक गहरा तमाचा थीं। सत्ता और न्यायपालिका के बीच इतनी घनिष्ठ और मैत्रीपूर्ण नजरिया, जहां वे एक ही टीम में खेल रहे हों, इस बात की पुष्टि करता है कि न्याय के तराजू में जो तकलीफन बैठ गई है, वह अब साफ दिख रही है। इसलिए, अब सर्वोच्च न्यायालय चाहे कितनी भी आक्रामकता दिखाए, चाहे कितनी भी आत्म-रक्षा की बातें करे, वह खो चुकी प्रतिष्ठा और जनता का विश्वास वापस पाने में सक्षम नहीं दिख रहा है।

न्यायालय के कॉरिडोर में इंसानियत की मौत
पिछले कुछ दिनों में सुप्रीम कोर्ट में घटी तीन घटनाएं भारतीय न्याय व्यवस्था की मानसिकता को उजागर करती हैं। सबसे हृदयविदारक घटना तब हुई, जब एक महिला मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने सिसकियां लेते हुए बिलख पड़ी। उसकी चीखें कानूनी भाषा से परे थीं। उसने कहा कि साहब, मेरे पारिवारिक मुकदमे का फैसला कर दें। इस सुप्रीम कोर्ट के चक्कर काटते-काटते मेरी जान ही निकल गई है। मेरे घर में खाने को अनाज नहीं बचा है, बच्चे भूख से बेहाल हैं। मुझमें अब लड़ने की ताकत नहीं बची है, आज ही सुनवाई करें। एक संवेदनशील न्याय व्यवस्था को ऐसी गरीब और असहाय महिला के लिए कम से कम एक मिनट का समय निकालना चाहिए था। लेकिन मुख्य न्यायाधीश का दिल नहीं पसीजा। उन्होंने न्याय के इस रूप को ठंडी सी अगली तारीख की चिट्ठी में बदल दिया। इस घटना ने साबित कर दिया कि न्यायालय के कॉरिडोरों से आंसू, असहायता और मानवता पूरी तरह से विदा हो चुकी है।
इसके ठीक विपरीत, इससे पहले के दिनों में एक अन्य घटना घटी। एक याचिकाकर्ता ने अदालत में उपस्थित होकर मुख्य न्यायाधीश को अपशब्द कहे और कागजात उछालकर कार्यवाही में बाधा डाली। आम धारणा के विपरीत, न्यायमूर्तियों ने उस आक्रामक व्यक्ति के प्रति असाधारण सहानुभूति दिखाई। कोर्ट ने कहा कि व्यक्ति अत्यधिक व्यथित है, यह उनका उद्वेग है और हम उनकी पीड़ा को समझते हैं।
यह दोहरा व्यवहार सोचने पर मजबूर करता है। जिस महिला ने न्याय की गुहार लगाते हुए अपनी बेचैनी का इजहार किया, उसे अगली तारीख का इंतजार करना पड़ा, जबकि जिसने अदालत की गरिमा को भंग करते हुए गालियां दीं और कागज फेंके, उसे सहानुभूति का पात्र माना गया। क्या इसका मतलब यह है कि सर्वोच्च न्यायालय स्वयं यह स्वीकार कर चुका है कि उसकी हालत इतनी खस्ता हो गई है कि वह गालियां खाने और अपमान सहने के लायक ही रह गया है?
नैतिकता का पतन और चोरी का माल
भारत में न्याय अब कानूनी किताबों में कैद होकर रह गया है; व्यावहारिक और सामाजिक धरातल पर यह बिक चुका है। न्याय का अर्थ सिर्फ धाराओं का विचार नहीं है। न्याय इंसानियत, लोकतंत्र और सत्य की जीवन रेखा है। न्यायालय के साथ खड़ा होना मतलब भविष्य के साथ खड़ा होना’’—यह विचार आज एक बदनुमा जोक बनकर रह गया है। भारत में नैतिकता का वह पवित्र वृक्ष पूरी तरह से उखड़ चुका है, जिसके नीचे लोकतंत्र के चारों स्तंभ—विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका—कुचले पड़े हैं।
यदि न्यायपालिका सक्रिय और प्रभावशाली होती, तो महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे जैसे नेता सत्ता हड़पने के लिए पार्टी तोड़कर और जनादेश को ठोकर मारकर दिल्ली की सड़कों पर ‘चोरी का माल’ लेकर खुलेआम नहीं घूमते। उन्होंने शिवसेना से तोड़े गए सांसदों को लेकर सीधे गृहमंत्री अमित शाह के दरबार में प्रवेश किया और उस अवैध सत्ता हस्तांतरण को वैधता देने की कोशिश की। चोरी करने वाले और चोरी का सामान ग्रहण करने वालों के बीच की इस खुली सांठगांठ को राजनीति का नाम दे दिया गया और देश की अदालतें इस राजनीतिक बदरंग पर मौन रहीं। जिस सुप्रीम कोर्ट में एक छोटे से मामले पर तत्काल ‘सुओ मोटो’ (अपनी तरफ से) संज्ञान लेने की परंपरा रही है, वह लोकतंत्र के इस खुले अपमान पर आंखें मूंद कर बैठा रहा।
वंचितों की पीड़ा और न्यायपालिका का अभिजात्य दृष्टिकोण
इस संदर्भ में दो ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर सर्वोच्च न्यायालय को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए, लेकिन वहां उसे कोई दिलचस्पी नहीं दिखती। पहला मुद्दा NEET परीक्षा पेपर लीक और परीक्षा व्यवस्था की बर्बादी को लेकर प्रख्यात पर्यावरणविद् और शिक्षाविद् सोनम वांगचुक द्वारा शुरू किया गया अनशन है। जब तक ये शब्द प्रकाशित होंगे, उनका अनशन तीन सप्ताह पार कर चुका होगा और उनकी शारीरिक स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। वांगचुक का यह आंदोलन किसी एक व्यक्ति या प्रदेश के लिए नहीं, बल्कि देश के लाखों-करोड़ों ऐसे छात्रों के भविष्य के लिए है, जिनके सपनों को भ्रष्टाचार की बलि चढ़ा दिया जा रहा है।

लेकिन दिल्ली स्थित सर्वोच्च न्यायालय को इस अनशन का संज्ञान लेने की जरूरत ही नहीं महसूस हो रही। इसके पीछे एक बेहद क्रूर और अभिजात्यवादी (Elitist) वजह है। न्यायमूर्तियों और उच्च पदस्थ अधिकारियों के बच्चों को किसी प्रतियोगी परीक्षा में बैठकर अपनी किस्मत आजमाने की जरूरत नहीं पड़ती। वे आराम से नौकरी पाने के वैकल्पिक रास्ते तलाश लेते हैं। इसलिए, वांगचुक के अनशन की आंच उनके घरों तक पहुंच ही नहीं रही। न्यायालय को उनके अनशन का संज्ञान लेकर सरकार को कड़े आदेश देने चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता आए, लेकिन ऐसा होने के आसार नजर नहीं आ रहे।
अयोध्या की डकैती और ‘रामराज्य’ का अपमान
दूसरा और बेहद शर्मनाक मुद्दा अयोध्या के श्रीराम मंदिर में दान पेटियों की चोरी और भूमि घोटाले का है। भगवान श्रीराम की आंखों के सामने, उनके अपने निवास स्थल में दानपेटियां चोरी होना देश के करोड़ों श्रद्धालुओं के साथ एक अनंतिम विश्वासघात है। पिछले डेढ़ दशक में राम मंदिर निर्माण के नाम पर जनता से जो हजारों करोड़ रुपये एकत्र किए गए, उसका कोई लेखा-जोखा नहीं है। संघ परिवार से जुड़ी उन संस्थाओं और व्यक्तियों (जैसे चंपत राय के नेतृत्व वाले गटबंधन) ने अयोध्या और उसके आसपास के कई मंदिरों और ट्रस्टों पर अपना कब्जा जमा लिया और वहां करोड़ों का अवैध लेन-देन शुरू कर दिया। ‘फकीरे राम मंदिर’ कैसे बेचा गया, इसका दर्द संतोष दुबे जैसे लोगों से सुना जा सकता है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिस सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले से राम मंदिर निर्माण की बाधाएं दूर हुईं, उसी मंदिर में हो रही लूट-खसोट और डकैती पर उसी कोर्ट को ‘सुओ मोटो’ संज्ञान लेने की याद नहीं आ रही। श्रीराम का चरित्र तो व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं से परे था। उन्होंने सदैव प्रजा के कल्याण और लोकभावना को व्यक्तिगत भावनाओं से ऊपर रखा। रामराज्य कभी किसी व्यक्ति या संस्था की निजी संपत्ति नहीं था, लेकिन आज के अयोध्या में चोरों का बोलबाला है और दिल्ली में शिंदे जैसे लोग चोरी का माल लेकर घूम रहे हैं। कानून का कोई पता नहीं है।
संवैधानिक संस्थाओं की बदली भूमिका
आज जिस तरह से देश चल रहा है, वह शायद ‘राम भरोसे’ चल रहा है, क्योंकि संविधान और कानून के भरोसे तो कुछ भी नहीं बचा है। गैरकानूनी कार्यों को वैधता देना और सत्ता पक्ष को हर हाल में बचाना ही अब न्यायालयों का प्रमुख कार्य रह गया प्रतीत होता है। इसकी तुलना उस दौर से की जा सकती है, जब देश में संवैधानिक मर्यादाओं का कुछ अलग ही आदर था।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भाजपा ने ‘मौनी बाबा’ कहकर खूब खिंचवाया था और उसी नाम से उनका मजाक उड़ाया गया था। लेकिन जब देश की स्वतंत्रता, संप्रभुता और संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा खतरे में पड़ती थी, तब वे बोलते भी थे। इसका एक ज्वलंत उदाहरण पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस. वाई. कुरैशी ने दिया था। उत्तर प्रदेश के 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने मुस्लिम आरक्षण को लेकर एक ऐसा वादा किया, जो आचार संहिता के दायरे में आता था। भाजपा ने इसकी शिकायत चुनाव आयोग से की। आयोग ने सुनवाई के बाद खुर्शीद को कड़ी फटकार लगाई। (यह अलग बात है कि मुख्य चुनाव आयुक्त कुरैशी खुद मुसलमान होने के बावजूद समुदाय विशेष के दबाव में नहीं आए और संवैधानिक धर्म निभाया)।
इस फटकार से नाराज कांग्रेस नेतृत्व ने चुनाव आयोग पर हमले शुरू कर दिए। तभी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कुरैशी को बुलाया और एक बेहद संवेदनशील बात कही—‘‘आप पर हो रही आलोचना से मैं व्यथित हूं। चुनाव आयोग हमारे लोकतंत्र की आत्मा है। अगर हमने उसी को खो दिया तो सब कुछ खो जाएगा।’’
आज उस लोकतंत्र की आत्मा (चुनाव आयोग) बहरा और अंधा हो चुका है। वह सत्ता के अंधभक्त की तरह व्यवहार कर रहा है। बिहार और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में चुनाव से पहले महिलाओं को लुभाने के लिए सरकाी खजाने का दुरुपयोग किया गया। मतदान के दिन तक महिलाओं के बैंक खातों में रुपये भेजे जा रहे थे। इस खुले तौर पर हो रहे चुनावी रिश्वतखोरी को न तो चुनाव आयोग ने रोका और न ही सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सवाल उठाया। यही कारण है कि शिंदे जैसे नेताओं को लगता है कि वे अपने साथ चोरी का माल लेकर गृहमंत्री के घर जा सकते हैं और कुछ नहीं बिगड़ेगा।
तब किसका क्या होगा?
आज देश एक गंभीर संकट से गुजर रहा है। प्रेस की स्वतंत्रता, पर्यावरण संरक्षण और भ्रष्टाचार नियंत्रण के मामलों में भारत का वैश्विक सूचकांक लगातार गिरता जा रहा है। अर्थव्यवस्था तो आम आदमी के लिए मर चुकी है, लेकिन साथ ही साथ न्याय का ढांचा भी ढहता जा रहा है। सोनम वांगचुक के रूप में सत्य, ईमानदारी और छात्रों का भविष्य दिल्ली के जंतर-मंतर पर कमजोर होकर गिरा पड़ा है। अयोध्या में तो भगवान राम की पादुकाएं और सीता माता के आभूषण तक सुरक्षित नहीं हैं।
न्याय के इस व्यापार और संस्थाओं की इस निष्क्रियता के बीच अंत में सिर्फ एक ही सवाल उठता है—‘‘किसी को क्या?’’ एक असहाय महिला को अदालत के चक्कर काटकर भूखे पेट मरना है; एक ईमानदार शिक्षाविद् को अनशन पर बैठकर अपनी जान गंवानी है; और करोड़ों भक्तों की आस्था को ठगा जा रहा है। लेकिन इन सबके बीच जो व्यवस्था चल रही है, वह अपने अहंकार में इतनी डूबी है कि उसे अपनी कमजोरी का अहसास तक नहीं हो रहा।
जब तक न्यायपालिका यह समझ नहीं लेती कि उसकी असली ताकत भवनों और पदकों में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास में निहित है, तब तक वह इस गिरावट को रोक नहीं पाएगी। चोरी का माल लेकर घूमने वालों को संरक्षण देने वाली व्यवस्था को शायद यह याद रखना चाहिए कि इतिहास किसी भी अदालत के फैसले को माफ नहीं करता। जब न्याय का पेड़ गिर जाता है, तो उसके नीचे डेरा डालने वाले शक्तिशाली भी बच नहीं पाते। भारत को अभी जागने का इंतजार है, लेकिन क्या न्यायालय जागेगा?






















