Learn how lightning is formed: मानव जीवन में मौसम का प्रभाव बहुत बड़ा होता है, खासकर मानसून के दौरान जब आसमान में घने बादल छाए रहते हैं और बारिश के साथ ही बिजली की चमक भी देखने को मिलती है। यह बिजली इतनी तेज और खतरनाक होती है कि यदि इसका संपर्क मानव जीवन या किसी भी जीव-जंतु से हो जाए, तो बहुत नुकसान पहुंचा सकता है। लेकिन सवाल यह है कि आखिर ये आकाशीय बिजली बनती कैसे है? और इसमें कितने वोल्ट का झटका लगता है? आइए, इन सवालों का जवाब विस्तार से समझते हैं।
आकाशीय बिजली की खोज और इसकी वैज्ञानिक समझ
प्राचीन काल में जब आसमान में गर्जना और चमक दिखाई देती थी, तो लोग इसे ईश्वर का प्रकोप मानते थे। उस समय वैज्ञानिक ज्ञान का अभाव था और लोग इसे देवताओं का क्रोध समझते थे। लेकिन 18वीं सदी में जब वैज्ञानिकों ने विज्ञान के माध्यम से प्रकृति के रहस्यों को समझना शुरू किया, तो इस पहेली का हल भी खोजा गया। 1752 में अमेरिकी वैज्ञानिक बेंजामिन फ्रेंकलिन ने प्रयोगात्मक रूप से साबित किया कि आकाशीय बिजली कोई देवी-देवताओं का प्रकोप नहीं, बल्कि प्राकृतिक रूप से उत्पन्न होने वाला एक विद्युत् विस्फोट है। उनके प्रयोग और अवलोकनों ने यह स्पष्ट कर दिया कि बादलों के बीच बिजली का निर्माण कैसे होता है और यह कैसे मानव जीवन को प्रभावित करता है।
बादलों में बिजली कैसे बनती है?
आसमान में बिजली बनने की प्रक्रिया बेहद जटिल और रोचक है। यह प्रक्रिया मुख्य रूप से बादलों के अंदर मौजूद पानी की बूंदों और बर्फ के कणों के बीच रगड़-छील के कारण शुरू होती है। जब तेज हवा इन बूंदों और कणों को आपस में टक्कर देती है, तो उनमें इलेक्ट्रोस्टैटिक चार्ज उत्पन्न होता है। इस प्रक्रिया को समझना आसान है:
- पॉजिटिव चार्ज का निर्माण: जब हवा तेज़ी से बहती है, तो हल्के पानी की बूंदें और बर्फ के कण ऊपर की ओर खिसकने लगते हैं। इससे इन बूंदों में पॉजिटिव चार्ज जमा हो जाता है।
- नेगेटिव चार्ज का निर्माण: वहीं, भारी बूंदें और बर्फ के कण नीचे की ओर खिसकते हैं, जिससे निचले हिस्से में नेगेटिव चार्ज इकठ्ठा हो जाता है।
- विज्ञापनात्मक विद्युत् प्रवाह: जब ये दोनों चार्ज अलग-अलग हिस्सों में जमा हो जाते हैं, तो उनके बीच विद्युत् धारा प्रवाहित होने लगती है। यदि इन चार्जों के बीच पर्याप्त अंतर हो, तो यह विद्युत् डिस्चार्ज तेज़ी से होकर गुजरता है, जिससे बिजली उत्पन्न होती है।
इस प्रक्रिया में, जब बादलों के ऊपरी और निचले हिस्से में मौजूद चार्जेस अधिक मात्रा में हो जाते हैं, तो उनके बीच अचानक से विद्युत् प्रवाह शुरू हो जाता है। इसी पल को हम आकाशीय बिजली कहते हैं। यह विद्युत् धारा लाखों वोल्ट का होता है और बहुत ही तीव्र गति से गुजरता है।
मानसून में बिजली क्यों गरजने लगती है?
मानसून के मौसम में जब भारी मात्रा में पानी और बर्फ के कण बादलों में जमा हो जाते हैं, तो उनके बीच विद्युत् चार्ज का विभाजन और अधिक हो जाता है। जैसे ही यह चार्ज बहुत अधिक हो जाता है, तो गरजने वाली आवाज यानी गड़गड़ाहट उत्पन्न होती है। यह आवाज तब बनती है जब गरजते हुए बिजली का विस्फोट हवा में तेज़ी से फैलता है और आसमान में धमाके की आवाज पैदा होती है।
आसमान में गरजने का कारण यह है कि जब बिजली की किरणें अपने रास्ते में मौजूद हवा, बादल और वातावरण से टकराती हैं, तो वे बहुत अधिक तापमान और ऊर्जा उत्पन्न करती हैं। यह तापमान लगभग 30,000 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकता है, जो सूरज की सतह के तापमान से भी पाँच गुना ज्यादा है। इस तापमान के कारण आसपास की हवा बहुत तेजी से फैलने लगती है, जिससे गरजने की आवाज पैदा होती है।
चमक और गड़गड़ाहट के बीच का वैज्ञानिक संबंध
आसमान में बिजली चमकने और आवाज गूंजने का एक अनूठा संबंध है। जब बिजली की किरणें आकाश से जमीन की ओर गिरती हैं, तो यह प्रकाश की तेज़ रफ्तार से फैलती है, जो लगभग 3,00,000 किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से चलती है। दूसरी ओर, आवाज की गति केवल 332 मीटर प्रति सेकंड है। इस गति के भिन्नताओ के कारण, हमें चमक पहले दिखाई देती है और गड़गड़ाहट बाद में सुनाई देती है।
उदाहरण के लिए, यदि बिजली की चमक हमें 3 सेकंड बाद सुनाई देती है, तो इसका मतलब है कि बिजली की किरणें जमीन तक लगभग 1 किलोमीटर की दूरी पर गिरती हैं। इसी तरह, जितनी अधिक देर तक हमें गड़गड़ाहट सुनाई दे, उतनी ही दूर बिजली गिर रही होती है। यह वैज्ञानिक नियम हमें यह समझने में मदद करता है कि बिजली कब और कहाँ गिर रही है।
आकाशीय बिजली का विद्युत् दबाव और वोल्टेज
आसमान से गिरने वाली बिजली इतनी अधिक शक्तिशाली होती है कि इसका प्रभाव मानव शरीर पर बहुत ही खतरनाक हो सकता है। सामान्य घर की बिजली सप्लाई लगभग 120 से 220 वोल्ट की होती है, लेकिन आकाशीय बिजली का वोल्टेज लगभग 10 करोड़ वोल्ट या 100 मिलियन वोल्ट तक हो सकता है।
यह इतना प्रचंड वोल्टेज होता है कि यदि यह किसी भी जीवित प्राणी या वस्तु से टकराए, तो उसकी ऊर्जा का स्तर अत्यधिक हो जाता है। यह बिजली मानव शरीर को भस्म कर सकती है, पेड़-पौधों को जला सकती है, और इमारतों को भी नष्ट कर सकती है।
जब यह बिजली धरती की ओर गिरती है, तो इसका तापमान लगभग 30,000 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इसकी लंबाई लगभग 4 से 5 किलोमीटर तक हो सकती है। इस अत्यधिक तापमान के कारण आसपास का वातावरण बहुत तेजी से गर्म हो जाता है और तुरंत ही जलने या नष्ट होने लगती है। इसी कारण, यदि कोई वस्तु इसकी सीधी टक्कर में आ जाती है, तो वह तुरंत नष्ट हो जाती है या जल जाती है।

























