Delhi News: उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के बाद उपराष्ट्रपति पद की कमान संभालने वाले सीपी राधाकृष्णन ने आज उपराष्ट्रपति निवास (उपराष्ट्रपति भवन) में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और साहित्यिक आयोजन में भाग लिया। इस अवसर पर उन्होंने प्रसिद्ध लेखक और साहित्यकार द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘द लाइब्रेरी मैन ऑफ इंडिया: द स्टोरी ऑफ पी.एन. पणिक्कर’ (The Library Man of India: The Story of P.N. Panicker) का विमोचन किया। यह पुस्तक भारत के ग्रंथालय आंदोलन के जनक माने जाने वाले पी.एन. पणिक्कर के जीवन और कार्यों पर आधारित एक विस्तृत दस्तावेज है।
उपराष्ट्रपति भवन में आयोजित इस कार्यक्रम में कई गणमान्य व्यक्ति, साहित्यकार, शिक्षाविद और पी.एन. पणिक्कर फाउंडेशन के सदस्य उपस्थित थे। मंच पर पुस्तक के विमोचन के बाद उपराष्ट्रपति श्री राधाकृष्णन ने संबोधित करते हुए पणिक्कर जी के योगदान को याद किया और आधुनिक भारत में पठन-पाठन की संस्कृति को बढ़ावा देने पर जोर दिया।
ज्ञान के प्रसारक: पी.एन. पणिक्कर
अपने संबोधन में उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्षण ने कहा कि पी.एन. पणिक्कर केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि एक आंदोलन है। उन्होंने कहा, “पणिक्कर जी ने समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को ग्रंथालयों के माध्यम से व्यक्त किया। वे मानते थे कि किसी भी राष्ट्र की प्रगति का मापदंड उसके नागरिकों की शिक्षा और जागरूकता है।” उन्होंने याद दिलाया कि किस प्रकार केरल में पणिक्कर जी ने 1945 में ‘सनातन धर्म ग्रंथालय’ की स्थापना करके एक ऐसी क्रांति की शुरुआत की, जिसने बाद में पूरे भारत को प्रभावित किया। उनका ‘ग्रंथालय संघम’ (Library Association) केवल किताबों को इकट्ठा करने की जगह नहीं था, बल्कि यह सामाजिक बदलाव लाने का केंद्र बना।
राधाकृष्णन ने कहा कि पी.एन. पणिक्कर को ‘भारत के ग्रंथालय महामानव’ (Library Man of India) कहना उनके योगदान के लिए कम है। उन्होंने 19 जून को ‘राष्ट्रीय पठन दिवस’ (National Reading Day) के रूप में मनाने की शुरुआत कराई, जो आज पूरे देश में उत्साह के साथ मनाया जाता है। यह उनकी दूरदृष्टि का परिणाम है कि आज हम पठन अभियानों पर ध्यान केंद्रित कर पा रहे हैं।
ग्रंथालय: समाजिक जागरण का केंद्र
उपराष्ट्रपति ने अपने भाषण में ग्रंथालयों के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, “ग्रंथालय केवल ईंट-पत्थर से बनी इमारतें नहीं होतीं, बल्कि वे ज्ञान के मंदिर हैं।” उन्होंने कहा कि एक अच्छा ग्रंथालय समाज के हर वर्ग के लिए खुला होना चाहिए, चाहे वह गरीब हो या अमीर, शहरी हो या ग्रामीण। उन्होंने बताया कि पणिक्कर जी ने किस प्रकार ग्रामीण क्षेत्रों में चलते-फिरते पुस्तकालयों (Travelling Libraries) की शुरुआत की, ताकि जो लोग शहर नहीं जा पा रहे हैं, वे भी ज्ञान ग्रहण कर सकें।
Vice President of India Shri C. P. Radhakrishnan released the book ‘The Library Man of India: The Story of P.N. Panicker’ authored by Shri P.P. Sathyan at Uprashtrapati Bhavan today.
Paying tributes to Shri P.N. Panicker, the Vice President described him as a visionary who… pic.twitter.com/zibpoj1i4T
— Vice-President of India (@VPIndia) May 22, 2026
राधाकृष्णन ने कहा कि भारत विश्व गुरु रहा है और हमारी विरासत ज्ञान-विज्ञान की है। पुस्तकें इस विरासत को आगे बढ़ाने का माध्यम हैं। उन्होंने आज के दौर में भी भौतिक पुस्तकालयों की प्रासंगिकता पर बल देते हुए कहा कि डिजिटल युग में भी पुस्तकों का स्पर्श और वातावरण अपना महत्व बनाए हुआ है।
डिजिटल युग और पठन की चुनौतियां
आज के डिजिटल दौर में सोशल मीडिया और शॉर्ट-वीडियो के चलन को देखते हुए उपराष्ट्रपति ने चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि जानकारी और ज्ञान के बीच एक बड़ा अंतर है। सोशल मीडिया हमें केवल जानकारी देता है, लेकिन गहरा ज्ञान पुस्तकों के अध्ययन से ही मिलता है।
उन्होंने युवा पीढ़ी से अपील करते हुए कहा, “आज के युवाओं को स्क्रीन के सामने समय गंवाने के बजाय पुस्तकों के साथ समय व्यतीत करना चाहिए। पुस्तकें हमारी सोचने की क्षमता बढ़ाती हैं और हमें आलोचनात्मक रूप से विश्लेषण करना सिखाती हैं।” उन्होंने कहा कि ‘द लाइब्रेरी मैन ऑफ इंडिया’ पुस्तक को युवाओं को पढ़ना चाहिए, ताकि वे जान सकें कि कैसे एक व्यक्ति अपनी लगन और मेहनत से पूरी सामाजिक संरचना को बदल सकता है।
पुस्तक का महत्व
इस अवसर पर पुस्तक के लेखक और प्रकाशकों ने भी अपने विचार रखे। यह पुस्तक पी.एन. पणिक्कर के जीवन की एक आकर्षक कहानी प्रस्तुत करती है। यह केवल उनके संघर्षों की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक मार्गदर्शक है जो बताता है कि सामाजिक कार्य को किस तरह से व्यवस्थित और प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। पुस्तक में पणिक्कर जी के जीवन के वे किस्से शामिल हैं जो आज भी प्रेरणादायक हैं—जैसे कि कैसे उन्होंने केरल के हर गांव तक पुस्तकालय पहुंचाने का संकल्प लिया और उसे पूरा किया।
उपराष्ट्रपति ने पुस्तक के प्रकाशन की सराहना करते हुए कहा कि यह समय की मांग थी कि पणिक्कर जी के जीवन और दर्शन को नए पीढ़ी के सामने लाया जाए। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक शिक्षाविदों, नीति निर्माताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए एक अनमोल खजाना है।






















