Corporate Drinking Culture: आधुनिक कॉर्पोरेट दुनिया में शाम को ऑफिस छोड़कर लाउंज या बार में जाना अब कोई व्यक्तिगत आदत नहीं रहा। स्पष्ट है कि रात में शराब पीना केवल एक नशा नहीं, बल्कि आधुनिक कामकाजी संस्कृति का एक अभिन्न अंग बन चुका है। आज के दौर में इसका मुख्य उद्देश्य सिर्फ नशा करना नहीं, बल्कि प्रोफेशनल तनाव को खत्म करना और ऑफिस के आपसी रिश्तों को सुधारना है।
हाल के कुछ कॉर्पोरेट सर्वे और मनोवैज्ञानिकों के अध्ययनों से जो तस्वीर सामने आई है, वह काफी चौंकाने वाली है। ‘हैप्पी ऑवर’ के नाम पर शुरू हुआ यह रिवाज, अब एक तरह की ‘अनौपचारिक नेटवर्किंग’ का सबसे बड़ा प्लेटफॉर्म बन गया है।
नशे के पीछे ‘नेटवर्किंग’ का तड़का
मल्टीनेशनल कंपनियों और स्टार्टअप्स में काम करने वाले प्रोफेशनल्स का मानना है कि ऑफिस की सीधी कुर्सियों पर बैठकर जो बातचीत नहीं हो पाती, वह शराब की दो पैग के बाद आसानी से हो जाती है। बॉस और सबऑर्डिनेट के बीच की दीवारें टूटती हैं और टीम में ‘वी फीलिंग’ (We feeling) पैदा होती है। आजकल बड़ी डील्स और प्रमोशन की चर्चाएं भी इन्ही ‘ड्रिंकिंग सेशन’ में तय होती हैं।
प्रोफेशनल बर्नआउट से बचाव का ‘झूठा’ ढाल
लगातार 10-12 घंटे की शिफ्ट, डेडलाइन का दबाव और जॉब सिक्योरिटी का खतरा—आज का कामकाजी इंसान गंभीर ‘बर्नआउट’ (जलन) का शिकार है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि शराब को कार्पोरेट युवा एक तरह के ‘इमोशनल रिलीज वाल्व’ के रूप में इस्तेमाल कर रहा है। रात को एक गिलास से दिमाग को ‘शटडाउन’ करने की कोशिश की जाती है, ताकि सुबह फ्रेश माइंड से ऑफिस जाया जा सके।
सवालिया निशान: क्या ये रिश्ते सच में सुधर रहे हैं?
हालांकि, हेल्थ एक्सपर्ट्स इस ‘कल्चर’ को लेकर गंभीर चिंता जता रहे हैं। एक वरिष्ठ मनोचिकित्सक कहते हैं, जिस रिश्ते को सुधारने के लिए शराब की जरूरत पड़ती है, वह रिश्ता कभी असली नहीं होता। यह एक खतरनाक भ्रम है। शराब के नशे में बने हुए प्रोफेशनल रिश्ते सुबह ऑफिस में उतने ही कड़वे नजर आते हैं, जितने पहले थे।
इसके अलावा, जो लोग शराब नहीं पीते हैं, वे अक्सर इस ‘अनौपचारिक नेटवर्किंग’ से कटे हुए महसूस करते हैं। कई बार ऐसे कर्मचारियों को प्रमोशन और अहम प्रोजेक्ट्स से इसलिए दूर रखा जाता है, क्योंकि वे ‘टीम कल्चर’ में फिट नहीं हो पाते।
कॉर्पोरेट जिम्मेदारी पर सवाल
अब सवाल यह उठता है कि क्या कॉर्पोरेट घराने इस बदलते कल्चर को लेकर जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हैं? क्या ‘लिक्वर नेटवर्किंग’ की जगह असली मेंटल हेल्थ सपोर्ट, थेरेपी सेशन और बिना शराब के आपसी बातचीत के प्लेटफॉर्म बनाए जा सकते हैं?
अगर इस तेजी से बदलती कामकाजी संस्कृति पर नजर डालें, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि शराब की गिलास में आज आधुनिक प्रोफेशनल की परेशानियां और उसके रिश्तों की कमजोरियां डूबी हुई हैं। अब देखना यह है कि कॉर्पोरेट दुनिया इस नशे को ‘नॉर्मलाइज’ करती रहेगी, या इसके लिए कोई नया और स्वस्थ विकल्प तलाशेगी।



























