वर्तमान डिजिटल युग में साइबर क्राइम की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। इनमें से एक प्रमुख मामला टेलीग्राम एप के माध्यम से जालसाजी गिरोह का है, जो अमेरिका से करोड़ों रुपये की ठगी कर रहा था।
इस गिरोह का सनसनीखेज खुलासा पुलिस की जांच में हुआ है, जिसने इस गिरोह के संचालन के तरीकों को उजागर किया है। आइए जानते हैं कैसे यह गिरोह टेलीग्राम के जरिए जालसाजों की भर्ती करता था, उनकी ट्रेनिंग, और कैसे यह गिरोह करोड़ों की ठगी को अंजाम दे रहा था।
टेलीग्राम के माध्यम से जालसाजों की
यह गिरोह मुख्य रूप से टेलीग्राम एप का इस्तेमाल कर जालसाजों की भर्ती करता था। गिरोह का काल सेंटर का हेड प्रियांशु उर्फ शिवा, टेलीग्राम पर प्रचार प्रसार कर लोगों से संपर्क करता था। वह जालसाजों के लिए ऑनलाइन इंटरव्यू का आयोजन करता था, जिसके बाद उन्हें लखनऊ बुलाकर 15 से 20 दिनों का कठोर प्रशिक्षण दिया जाता था। इस प्रशिक्षण में जालसाजों को ठगी की स्क्रिप्ट रट्टा मार कर याद कराई जाती थी, ताकि वे आसानी से अमेरिकी नागरिकों को धोखा दे सकें।
प्रशिक्षण के दौरान, सभी को स्क्रिप्ट पढ़ाई जाती थी और इसे रट्टा मार कर याद किया जाता था। इस पूरी प्रक्रिया का अंतिम निर्णय अहमदाबाद में बैठा मास्टरमाइंड लेता था, जो वीडियो कॉल के माध्यम से साक्षात्कार भी लेता था। यह तरीका जालसाजों को अमेरिकी नागरिकों को झांसे में लेने का तरीका समझाने का था, ताकि वे बिना किसी संदेह के काम कर सकें।
जालसाजों की शैक्षिक योग्यता और वेतन
गिरोह में शामिल जालसाजों की शैक्षिक योग्यता विभिन्न स्तरों की थी। इनमें बीटेक, एमबीए, स्नातक, 12वीं कक्षा और कुछ 10वीं पास भी शामिल थे। इन जालसाजों को मासिक वेतन के रूप में 25 से 30 हजार रुपये दिए जाते थे। उनके रहने और खाने का प्रबंध सेंटर हेड द्वारा किया जाता था, और यह व्यवस्था पूरी तरह निशुल्क थी। रात के खाने की व्यवस्था भी सेंटर पर ही की जाती थी, जिसमें ऑनलाइन डिलीवरी एजेंसियों से भोजन मंगवाया जाता था। यह गिरोह अमेरिकी ड्यूटी ऑवर्स में ही काम करता था, ताकि अमेरिकी नागरिकों को धोखा देना आसान हो सके।
हवाला के जरिए रकम ट्रांसफर और वित्तीय लेनदेन
गिरोह के पास कोई अपना बैंक खाता नहीं था। पुलिस की प्रारंभिक जांच में पाया गया है कि गिरोह हवाला के जरिए अमेरिका से रकम मंगवाता था। हवाला के माध्यम से रकम पहले अहमदाबाद आती थी, वहां से लखनऊ भेजी जाती थी। इस रकम का उपयोग जालसाजों के वेतन, इमारत का किराया और अन्य खर्चों के लिए किया जाता था। इस गिरोह की वित्तीय लेनदेन की जटिलता को देखकर पुलिस भी हैरान रह गई है कि आखिरकार इस गिरोह का कोई लॉग इन बैंक खाता क्यों नहीं मिला है।
क्रिप्टो और गिफ्ट कार्ड के माध्यम से धोखाधड़ी
अमेरिका से जुड़ी ठगी के दौरान, यदि कोई पीड़ित क्रिप्टोकरेंसी या गिफ्ट कार्ड में रकम देने में असमर्थता दिखाता था, तो गिरोह के सदस्य उससे जेवरात ले लेते थे। इस प्रक्रिया में, गिरोह का हैंडलर घर जाकर उस व्यक्ति के जेवरात सरकारी खजाने में सुरक्षित रखने का झांसा देता था। यह सब जालसाजों की योजनाबद्ध रणनीति का हिस्सा था, ताकि रकम का स्रोत सुरक्षित रहे और गिरोह बेखौफ तरीके से अपने काम को अंजाम दे सके।
पुलिस की कार्रवाई और बरामद साक्ष्य
पुलिस ने गिरोह के जालसाजों के मोबाइल और लैपटॉप से कई महत्वपूर्ण सबूत बरामद किए हैं। इन साक्ष्यों में उन कॉल्स, स्क्रिप्ट्स और ट्रांसफर के साक्ष्य शामिल हैं, जो इस गिरोह के नेटवर्क की जड़ता को दर्शाते हैं। सहायक पुलिस आयुक्त शशि प्रकाश मिश्र ने बताया कि जालसाजों की भर्ती टेलीग्राम पर की जाती थी। अंग्रेजी और कम पढ़े-लिखे कर्मचारियों को हिंदी में अंग्रेजी के वाक्य लिखकर स्क्रिप्ट दी जाती थी, ताकि वे आसानी से अमेरिकी नागरिकों को धोखा दे सकें।


























