The Political Earthquake at Delhi’s Jantar Mantar: आधुनिक लोकतंत्र के इतिहास में कई बार ऐसे मोड़ आए हैं, जब किसी एक घटना ने मात्र एक सामाजिक या प्रशासनिक मुद्दा होने का आवरण तोड़ा और खुद को एक व्यापक राजनीतिक और सांस्कृतिक विरोध का केंद्र बिंदु घोषित किया। वर्तमान में भारत एक ऐसे ही ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा दिखता है।
नीट पेपर लीक होने का मामला सतही तौर पर शिक्षा व्यवस्था की एक चूक लगता है, लेकिन इसकी जड़ें इतनी गहरी हैं कि इसने पूरे भारतीय राजनीतिक ढांचे की कलई उघाड़ दी है। छात्र समुदाय का गुस्सा, जो अब एक व्यवस्था परिवर्तन के आंदोलन का रूप ले चुका है, केवल किसी परीक्षा के उत्तरकुंजी टेलीग्राम पर लीक होने का विरोध नहीं है। यह एक ऐसे भारत की असहमति है, जो पिछले एक दशक से चल रही सत्तावादी राजनीति, नौकरियों के सूखे तालाब, निजीकरण की बेरहमी और संस्थाओं के घुटने टेकने का शिकार हो चुका है।

यदि हम इस छात्र आंदोलन को बृहत्तर राजनीतिक परिदृश्य में रखकर देखें, तो यह स्पष्ट होता है कि यह विरोध भाजपा की अगुवाई वाली सरकार की नीतिगत विफलताओं का एक सीधा प्रतिफलन है। 2014 में सत्ता में आने के बाद भाजपा ने जिस ‘अच्छे दिन’ और ‘न्यू इंडिया’ के नैरेटिव को स्थापित किया था, वह अब नीट जैसे घोटालों और सड़कों पर उतरे युवाओं के चेहरों पर चिंता, भ्रम और गुस्से के कारण कलंकित हो रहा है।
मेधावी युवाओं के साथ विश्वासघात
किसी भी देश में शिक्षा व्यवस्था उसके सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता का सबसे मजबूत स्तंभ होती है। भारत जैसे विकासशील देश में, जहां अधिकांश आबादी मध्यम या निम्न मध्यम वर्ग से आती है, मेडिकल प्रवेश परीक्षा जैसी प्रतियोगिताएं किसी जादुई द्वार के समान हैं। लाखों छात्र अपने किशोरावस्था के सुनहरे वर्षों को कोचिंग सेंटरों, यात्राओं और दिन-रात की मेहनत में न्योछावर कर देते हैं। ऐसे में जब परीक्षा से कुछ घंटे पहले ही नीट पेपर लीक हो जाए, तो यह कोई प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि लाखों मेहनतकश छात्रों और उनके परिवारों के साथ एक सामूहिक ठगी और भावनात्मक हत्या है।
नीट पेपर लीक इसलिए और भी खतरनाक है, क्योंकि यह सीधे स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र को प्रभावित करता है। जो छात्र रिश्तेदारी या पैसे के बल पर परीक्षा पास करेंगे, वे भविष्य में असक्षम डॉक्टर बनकर आम जनता की जान के खतरे में डालेंगे। अतः, यह मुद्दा किसी एक बैच का नहीं है, बल्कि यह पूरे देश के स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे को खोखला करने वाला साजिशन कदम है। सरकार की लापरवाही इस मामले में इसलिए भी अक्षम्य है, क्योंकि यह पहली बार नहीं हो रहा। पिछले कुछ वर्षों में रेलवे, एसएससी और अन्य भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक होने का सिलसिला जारी रहा है, लेकिन सरकार ने इसे रोकने के लिए न तो कोई ठोस कानूनी ढांचा बनाया और न ही तकनीकी स्तर पर पारदर्शी व्यवस्था अपनाई। यह एक प्रकार से शासन तंत्र की संस्थागत अवमूल्यन की गवाही देता है।

जंतर-मंतर से लेकर सड़कों तक
जब कोई व्यवस्था लगातार अपने नागरिकों को निराश करती है, तो विरोध की भाषा भी स्वयं को ढाल लेती है। नीट घोटाले के बाद छात्रों का गुस्सा सोशल मीडिया की सीमाओं से उबरकर भौतिक स्थानों पर आ धमका। दिल्ली जंतर-मंतर, जो अतीत में जनतंत्र की रक्षा के लिए कई ऐतिहासिक आंदोलनों का गवाह रहा है, एक बार फिर इस नई पीढ़ी के रोष का केंद्र बन गया।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता इसके नेतृत्व का स्वरूप रहा है। अभिजीत दिपके जैसे युवा चेहरों का उभार इस बात का संकेत है कि भारत की युवा शक्ति अब पारंपरिक राजनीतिक दलों के ‘हाथों में पिलाए जाने’ वाले नेताओं पर भरोसा नहीं करती। यह एक ‘स्पॉन्टेनियस’ आंदोलन है, जहां नेतृत्व कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक ‘विचार’ बन चुका है। लद्दाख से सोनम वांगचुक जैसे पर्यावरणविद् और शिक्षाविद् का इस आंदोलन से सहानुभूति जताना और उसकी आवाज से जुड़ना, इस बात को दर्शाता है कि भारत में विभिन्न क्षेत्रों और वर्गों के लोग एक सूत्र में बंध रहे हैं। एक तरफ लद्दाख में पहाड़ों की सुरक्षा और जलवायु को लेकर संघर्ष है, तो दूसरी तरफ मैदानी भारत में शिक्षा और रोजगार को लेकर लड़ाई। दोनों का आधार एक है—केंद्र सरकार की असंवेदनशील और तानाशाही नीतियां।
भूख हड़ताल, रात्रि विश्राम किए बिना धरने पर बैठना और सड़कों पर कविताएं और नारे गुनगुनाना—ये सभी इस आंदोलन की शांतिपूर्ण लेकिन तीखी भाषा का हिस्सा हैं। यह आंदोलन किसी एक जाति, धर्म या भाषा का नहीं है, जो भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ घटना है। यह आंदोलन ‘मेहनत करने वाले भारत’ का आंदोलन है, जो ‘पैसे और राजनीतिक पहुंच वाले भारत’ के खिलाफ खड़ा हो गया है।

भाजपा सरकार और नई शिक्षा नीति: निजीकरण का एजेंडा
इस आंदोलन को समझने के लिए यह आवश्यक है कि हम भाजपा सरकार की शिक्षा नीति, विशेषकर ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020’ (NEP 2020) के बौद्धिक और आर्थिक आधार को समझें। विगत कुछ वर्षों में सरकार ने शिक्षा को एक मौलिक अधिकार होने के बजाय एक ‘वस्तु’ (के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया है। सरकारी स्कूलों और कॉलेजों को बंद किया जा रहा है या उन्हें अवमूल्यन के लिए छोड़ दिया जा रहा है, जबकि निजी विश्वविद्यालयों और कोचिंग माफियाओं को खुली छूट दी जा रही है।
नीट पेपर लीक का घोटाला इसी ‘कोचिंग-परीक्षा माफिया’ का दुष्परिणाम है। जब तक परीक्षा प्रणाली और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता नहीं आएगी और निजीकरण पर लगाम नहीं कसी जाएगी, तब तक ऐसे घोटाले होते रहेंगे। भाजपा सरकार ने जिस तरह से एकल चरण में नीट परीक्षा आयोजित करने का निर्णय लिया, उसके पीछे भी एक तरह से निजी शिक्षा व्यवसायियों को फायदा पहुंचाने की कोशिश मानी जा रही है। यह नीतिगत दिशा छात्रों के हित में नहीं है, बल्कि शिक्षा को एक लाभदायक उद्योग बनाने की साजिश का हिस्सा है, जिसका खामियाजा आम मध्यवर्गीय परिवारों को भुगतना पड़ रहा है।
सत्ता का अहंकार और विपक्ष की निष्क्रियत
जब कोई जनआंदोलन उभरता है, तो सत्ता और विपक्ष दोनों की भूमिकाएं उसकी दिशा तय करती हैं। प्रारंभ में भाजपा सरकार ने जिस तरह से इस मुद्दे को नजरअंदाज करने की कोशिश की और शुरुआती दिनों में मंत्रियों द्वारा दिए गए बयानों में छात्रों को ‘अफवाहों’ से भड़काया जाने वाला बताया गया, वह सरकार के अहंकार को दर्शाता है। सत्ता में बैठे लोगों को लगता है कि चुनावी जीत का अर्थ है कि जनता ने उन्हें हर मुद्दे पर बिना जवाब दिए शासन करने का लाइसेंस दे दिया है। लेकिन जैसे-जैसे आंदोलन बढ़ा और दिल्ली उच्च न्यायालय जैसी संवैधानिक संस्थाओं ने सरकार को फटकार लगाई, सरकार की नाकामी सामने आ गई।
विपक्षी दलों की भूमिका भी यहां बहुत हद तक खोखली रही है। कांग्रेस सहित कई विपक्षी दल तब तक चुप्पी साधे हुए थे, जब तक कि छात्रों ने खुद सड़कें नहीं संभाल लीं। विपक्ष को लगता है कि शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दे चुनाव नहीं जीता सकते, इसलिए उन्होंने स्वाभाविक रूप से इस आंदोलन का नेतृत्व करने में अनिच्छा दिखाई। हालांकि, जब आंदोलन ने जनसमर्थन जुटाना शुरू किया, तब विपक्षी दल भी इसमें कूद पड़े। लेकिन सच्चाई यह है कि यह आंदोलन किसी एक राजनीतिक दल का नहीं है। अगर विपक्ष ने भी सत्ता में आकर इसी व्यवस्था को बरकरार रखा, तो युवा उसका भी घेराव करेगा। यही वजह है कि इस आंदोलन में पारंपरिक राजनीतिक दलों के झंडे नजर नहीं आते, बल्कि तिरंगे और संविधान के प्रतीक चस्पां हैं।
सामाजिक न्याय और असमानता का मुद्दा
नीट घोटाला और उसके विरोध में उभरा आंदोलन भारतीय समाज में बढ़ती आर्थिक और सामाजिक असमानता का भी प्रतीक है। एक तरफ वे छात्र हैं जिनके पास लाखों रुपये खर्च करके दिल्ली या कोटा जाकर कोचिंग लेने के साधन हैं, और दूसरी तरफ गांवों और छोटे शहरों के वे मेहनती छात्र जो सरकारी स्कूलों की किताबों और यूट्यूब पर उपलब्ध लेक्चर्स के सहारे इस परीक्षा की तैयारी करते हैं।
जब पेपर लीक होता है, तो इसका सबसे बड़ा शिकार यही पिछड़ा और गरीब वर्ग होता है, क्योंकि उसके पास पैसे देकर सीट खरीदने का साधन नहीं होता। भाजपा सरकार ने अपने कार्यकाल में आरक्षण और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर जो राजनीति की है, वह इस आंदोलन की पृष्ठभूमि को और भी स्पष्ट करती है। जब सरकारी नौकरियां कम होती जा रही हैं और निजी क्षेत्र में पैसे और पहुंच के बिना प्रवेश नहीं मिलता, तो ऐसे में प्रवेश परीक्षाओं में धांधली करना आर्थिक रूप से कमजोर तबकों के साथ एक सामूहिक धोखाधड़ी है। यह आंदोलन इसलिए भी खतरनाक है क्योंकि यह भारतीय जनता के धैर्य का पिटारा खत्म होने का संदेश दे रहा है।
न्यायपालिका की भूमिका, लोकतंत्र का अंतिम आश्रय
इस पूरे प्रकरण में न्यायपालिका, विशेषकर दिल्ली उच्च न्यायालय की भूमिका सराहनीय रही है। जब कार्यपालिका (सरकार) पूरी तरह से विफल और असंवेदनशील नजर आ रही थी, तब न्यायपालिका ने अपनी सक्रियता दिखाई। अभिजीत दिपके जैसे छात्र नेताओं की गिरफ्तारी पर न्यायालय द्वारा सरकार को फटकार लगाना और जल्द सुनवाई का आदेश देना, यह दर्शाता है कि भारत की संवैधानिक व्यवस्था अभी जीवित है।
हालांकि, न्यायपालिका के हस्तक्षेप को लोकतंत्र की सफलता नहीं माना जा सकता। एक स्वस्थ लोकतंत्र में सरकार को इतना जिम्मेदार होना चाहिए कि न्यायालय को हर छोटे-बड़े मुद्दे में हस्तक्षेप करने की नौबत न आए। न्यायालयों में इन मामलों की लंबी लड़ाई लड़ना भी एक आम छात्र के लिए संभव नहीं होता। इसलिए, न्यायपालिका का यह कदम सरकार की नीतिगत विफलता का एक और प्रमाण है।
भविष्य का राजनीतिक मानचित्र: एक नई शुरुआत की ओर
यह छात्र आंदोलन भारतीय राजनीति के लिए एक नए अध्याय की शुरुआत कर सकता है। यदि हम गत कुछ वर्षों के रुझानों पर नजर डालें, तो पता चलता है कि भारत की राजनीति धीरे-धीरे जाति और धर्म के आधार पर चलने वाले पुराने मॉडल से बाहर निकलकर ‘मुद्दागत राजनीति’ की ओर मुड़ रही है। चाहे वो किसान आंदोलन हो, अग्निवीर योजना के खिलाफ विरोध हो, या फिर नीट पेपर लीक का आंदोलन—सभी में एक आम धागा है, और वह है ‘अवसर की कमी और व्यवस्था का अन्याय’।
यह आंदोलन भाजपा को एक राजनीतिक चेतावनी दे रहा है कि चुनावी जीत को स्थायी जनादेश नहीं माना जा सकता। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटों में जो कमी आई है, उसकी एक वजह युवा वर्ग का उससे मुखातिब होना भी है। यदि सरकार ने इस आंदोलन को केवल एक ‘कानून-व्यवस्था’ का मुद्दा मानकर उसे दबाने की कोशिश की, तो इसके परिणाम भविष्य में और भी विनाशकारी हो सकते हैं। इस आंदोलन ने जो नेतृत्व पैदा किया है, वह भविष्य में भारत की राजनीति को नई दिशा दे सकता है। यह नेतृत्व न तो किसी परिवार का गुलाम है और न ही किसी विचारधारा का दलाल। यह सीधा-सादा, जमीनी और मुद्दों पर आधारित नेतृत्व है।
























