भारतीय का इतिहास विरोध का इतिहास रहा है। महात्मा गांधी ने जब दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत की धरती तक ‘सत्याग्रह’ और ‘अहिंसा’ के हथियार उठाए, तो ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिल गई थी। गांधीवादी दर्शन का मूल मंत्र था—जब कोई अन्याय हो, तो उसके खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाना हर नागरिक का जन्माधिकार है। आजादी के बाद यह अधिकार संविधान के माध्यम से सुरक्षित किया गया। लेकिन आज, स्वतंत्रता के सात दशक से अधिक बाद देखने को मिल रहा है कि यह शांति आंदोलन कहीं रुका नहीं, बल्कि इसके स्वरूप बदले हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर झारखंड की राजधानी रांची तक, एक त्रासद कथा बार-बार दोहराई जा रही है—’सरकारें तब तक सुनती नहीं, जब तक किसी की जान नहीं चली जाती।’
जंतर-मंतर पर किसी प्रदर्शनकारी की हालात गंभीर के बाद सरकार के जागने का नजारा हमने हाल ही में देखा है। उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए अब झारखंड की राजधानी रांची में एक ऐसा चेहरा सामने आया है, जो मौत की ओर तेजी से बढ़ रहा है और सरकार की चुप्पी इसे और भयावह बना रही है। प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों को लेकर जारी छात्र आंदोलन के बीच, लगातार नौ दिनों की भूख हड़ताल पर बैठे छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो की हालत नाजुक हो गई है। रांची के सदर अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में जब एक युवा अपनी जान की बाजी लगा रहा हो, तो सवाल यह उठता है कि क्या लोकतंत्र में न्याय की गुहार लगाने का यही तरीका है? क्या किसी की मौत ही सरकारों के कान खोलने का आखिरी और सबसे प्रभावी जरिया बन चुका है?
झारखंड का विस्फोट
झारखंड में चल रहा यह आंदोलन कोई अचानक उभरा हुआ विरोध नहीं है। यह कई वर्षों की असंतोष की भूमिका पर खड़ा है। प्रतियोगी परीक्षाओं, विशेषकर जेपीएससी (झारखंड लोक सेवा आयोग) और अन्य राज्य स्तरीय भर्तियों में लगातार गड़बड़ियों के आरोप लगते रहे हैं। पेपर लीक, पैटर्न में अचानक बदलाव, पारदर्शिता का अभाव और परिणामों में अनियमितताओं ने झारखंड के लाखों युवाओं का भविष्य अंधकारमय कर दिया है। एक ऐसे राज्य में, जहां प्राकृतिक संसाधनों का खजाना होने के बावजूद बेरोजगारी और पलायन एक गंभीर समस्या है, वहां सरकारी नौकरी केवल रोजगार नहीं, बल्कि किसी परिवार के लिए सम्मान और आर्थिक सुरक्षा का प्रतीक है।
जब युवा देखते हैं कि उनकी कड़ी मेहनत, रातों की नींद और संसाधनों की कमी के बावजूद हासिल की गई योग्यता को एक कथित ‘सिस्टम’ धूल में मिला दे रहा है, तो उनका आक्रोश स्वाभाविक है। छात्रों की मांग सरल और न्यायसंगत है—परीक्षाओं में हुई गड़बड़ियों की सीबीआई (केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो) जांच। जब तक राज्य की एजेंसियों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, तब तक केंद्रीय एजेंसी की मांग को अवैध या अति-आक्रामक नहीं कहा जा सकता। लेकिन सरकारें इसे अपने अहं का प्रश्न बना लेती हैं। सीबीआई जांच की मांग मान लेना सरकारों के लिए अपनी नाक कटवाने जैसा माना जाता है, जबकि वास्तविकता यह है कि यह न्याय दिलाने का पहला कदम हो सकता है।
शांतिपूर्ण मार्च और राज्य का ‘दमनचक्र’
इस आंदोलन का सबसे दुखद पहलू यह है कि छात्रों ने हिंसा का रास्ता नहीं अपनाया। उनका इरादा विधानसभा का ‘घेराव’ करना था, ताकि वे अपनी बात सत्ता के केंद्र तक पहुंचा सकें। लोकतंत्र में विधानसभा जनता का सबसे बड़ा मंच है। जनप्रतिनिधियों का घर होने के नाते यही वह जगह है, जहां जनता की पीड़ा सुनी जानी चाहिए। लेकिन रांची पुलिस और राज्य प्रशासन ने इसे किसी ‘आपदा’ या ‘दुश्मनी’ की तरह लिया।

विधानसभा के गेट नंबर 1 के बाहर जब छात्र शांतिपूर्ण तरीके से जमा हो गए, तो प्रशासन की प्रतिक्रिया बेहद विवादित रही। बैरिकेड्स लगाना प्रशासनिक सावधानी हो सकती है, लेकिन बिना किसी उकसावे के पानी की बौछार, आंसू गैस के गोले और लाठीचार्ज का इस्तेमाल एक सुविचारित दमन की नीति का प्रतीक है। प्रदर्शनकारियों के अनुसार, पुलिस ने बर्बरता की सारी हदें पार कर दीं। सिर, हाथ, चेहरे और शरीर के हर हिस्से पर लाठियां बरसाई गईं। इतना ही नहीं, महिला छात्राओं के साथ भी बर्बरता से पेशा आया गया।
झारखंड पुलिस के चार कर्मियों के घायल होने की खबरें भी आई हैं, जो दुखद है, लेकिन इससे यह सवाल उठता है कि आखिर झड़प कैसे शुरू हुई? क्या शांतिपूर्ण तरीके से खड़े छात्रों ने पहले पुलिस पर हमला किया, या पुलिस के आक्रामक रवैये ने छात्रों को बचाव के लिए मजबूर किया? अक्सर देखा गया है कि प्रशासन पहले आक्रामकता अपनाता है और फिर उसे औचित्य देने के लिए ‘पथराव’ या ‘हिंसा’ के बहाने ढूंढता है। छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो के सहयोगी पंकज कुमार का दावा है कि विधानसभा के पास हुए लाठीचार्ज में ही महतो गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिसके बाद उनकी तबीयत बिगड़ती गई और अब उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। अगर यह दावा सच है, तो राज्य सरकार की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।
एक लड़ते हुए शरीर की कहानी
रांची सदर अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में पड़े देवेंद्र नाथ महतो केवल एक छात्र नेता नहीं हैं, वे आज झारखंड के उस निराश युवा वर्ग का प्रतीक बन चुके हैं, जिसने सिस्टम से न्याय की उम्मीद छोड़ दी है। नौ दिनों का लंबा अनशन किसी बच्चे के खेल का विषय नहीं है। यह एक ऐसा कदम है, जिसे इंसान तब उठाता है, जब उसके पास दुनिया में कोई और विकल्प नहीं बचता।

डॉक्टरों के अनुसार, महतो का ब्लड शुगर लेवल खतरनाक रूप से नीचे गिर गया है और उनकी हालत गंभीर बनी हुई है। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, लंबे समय तक भूख हड़ताल पर रहने से शरीर की मांसपेशियां टूटने लगती हैं, अंग काम करना बंद कर देते हैं और अंततः मृत्यु हो जाती है। मेडिकल ऑफिसर नैन्सी प्रिया द्वारा दी गई जानकारी इस बात की पुष्टि करती है कि स्थिति नियंत्रण से बाहर जा सकती है।
मौत की इस कगार पर खड़े देवेंद्र के माध्यम से मौत ही सरकार से अब आक्रोश मांग रही है। यह एक डरावनी परिस्थिति है। क्या हम एक ऐसे लोकतंत्र में जी रहे हैं जहां एक 20-22 साल के युवा को अपनी जान दाव पर लगानी पड़ रही है और सरकार महज एक ‘निष्क्रिय दर्शक’ बनकर बैठी है? क्या हेमंत सोरेन सरकार इस बात को समझ नहीं रही कि अगर रांची के किसी अस्पताल में देवेंद्र की मौत हुई, तो यह आंदोलन खत्म नहीं होगा, बल्कि एक विस्फोटक ज्वालामुखी बनकर सामने आएगा? इतिहास गवाह है कि जब शांतिपूर्ण आंदोलनों को रोकने के लिए राज्य अत्याचार का सहारा लेता है और कोई शहीद होता है, तो वह शहीद आंदोलन की आत्मा बन जाता है।
जनदर्शन से जनविद्रोह तक का सफर
झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की नींव ही आदिवासियों, किसानों और पिछड़े वर्गों के अधिकारों की लड़ाई को लेकर हुई थी। शिबू सोरेन से लेकर हेमंत सोरेन तक, इस पार्टी ने हमेशा सत्ता के दमन के खिलाफ आवाज उठाई है। परंपरागत रूप से JMM आंदोलनों की पृष्ठभूमि से आई है। लेकिन सत्ता का यह दुष्प्रभाव है कि जो लोग सड़कों पर विरोध करके सत्ता तक पहुंचते हैं, वहीं लोग सत्ता में आने के बाद उसी सड़क पर उतरे विरोधियों को कुचलने लगते हैं।
हेमंत सोरेन सरकार पर आज यह आरोप लग रहा है कि वह युवाओं के मुद्दे को गंभीरता से नहीं ले रही। पुलिस पर लाठीचार्ज का आदेश किसने दिया? क्या विधानसभा के बाहर शांतिपूर्ण जुटाव को रोकने का कोई अन्य लोकतांत्रिक तरीका नहीं था? सरकार का रवैया ‘सुनने से इनकार’ जैसा प्रतीत हो रहा है। एक ओर जहां सरकार अपनी योजनाओं और नीतियों को लेकर बड़े-बड़े दावे करती है, वहीं दूसरी ओर उसके ही राज्य के युवा अस्पताल की बेड पर जान गवां रहे हैं। यह विरोधाभास ही झारखंड की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था की कमजोरी को दर्शाता है।
प्रतियोगी परीक्षाओं का ‘मिथ्या’ और युवाओं का ‘मानसिक शोषण’
इस संपादकीय को लिखने का उद्देश्य केवल एक घटना की समीक्षा करना नहीं है, बल्कि इस पीछे छिपी गहरी बीमारी को उजागर करना है। आज पूरे भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं का जो जाल बुना गया है, वह युवाओं के लिए एक मानसिक यातनागृह बन चुका है। लाखों युवा कई-कई साल तक कोचिंग सेंटरों में रहकर, परिवार की पूंजी खर्च करके, अपनी जवानी की सबसे खूबसूरत उम्र केवल ‘सिलेबस’ के नोट्स रटने में गुजार देते हैं।
इसके बाद जब परीक्षा में धांधली होती है, तो यह कोई सिर्फ कागजों पर गलती नहीं है; यह किसी युवा के सपनों की हत्या है। यह एक परिवार की आर्थिक नैतिक हत्या है। जब यह बार-बार होता है, तो युवाओं के मन में राज्य व्यवस्था के प्रति घृणा पैदा होती है। वे समझते हैं कि बिना ‘सिफारिश’ और ‘पैसे’ के कुछ नहीं मिलेगा। ऐसे में जब वे सड़कों पर उतरते हैं, तो उनमें आक्रोश न्यायसंगत होता है।
उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार और अब झारखंड—हर राज्य में पेपर लीक और भर्ती घोटालों के खिलाफ आंदोलन छिड़ चुके हैं। कुछ राज्य सरकारों ने समझदारी दिखाते हुए परीक्षा रद्द की और नए सिरे से कराई, जबकि कुछ सरकारें जिद पर अड़ी रहीं और उन्हें न्यायिक हस्तक्षेप (हाईकोर्ट/सुप्रीम कोर्ट) के आदेश पर झुकना पड़ा। झारखंड सरकार को भी यह समझना होगा कि छात्रों की मांग पर अड़ियल रुख अपनाना उसके लिए राजनीतिक रूप से घातक साबित हो सकता है।
लोकतंत्र को असुरक्षित करने वाला कदम
जब कोई भी सरकार शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज करती है, तो वह संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 का उल्लंघन करती है। विधानसभा के बाहर नारेबाजी करना, धरना देना या घेराव करना अगर अवैध है, तो फिर संविधान में ‘विधानसभा के समक्ष ध्यान आकर्षित करने’ का प्रावधान क्यों है? प्रशासन को चाहिए कि वह प्रदर्शनकारियों के प्रतिनिधिमंडल को बुलाकर बातचीत करे, न कि उन्हें दुश्मन की तरह खदेड़े।
पानी की कैनन और आंसू गैस के गोले आतंकवादियों या दंगाइयों से निपटने के लिए बनाए गए हैं, न कि अपने ही देश के बेरोजगार, निर्दोष छात्रों को सबक सिखाने के लिए। जब पुलिस छात्राओं पर लाठियां बरसाती है, तो उस दृश्य की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होती हैं और देश-विदेश में भारत की लोकतांत्रिक छवि धूमिल होती है। यह अत्याचार केवल झारखंड की समस्या नहीं है, यह भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी कमी है, जहां राज्य अपनी ताकत का दुरुपयोग करने से पहले संयम नहीं खोता।
मौत के इंतजार में सरकार
दिल्ली के जंतर-मंतर की घटना अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि झारखंड ने उसी फिल्म की रीक्रिएट कर दी है। रांची सदर अस्पताल में देवेंद्र नाथ महतो की सांसें उतर रही हैं। उनका शरीर कमजोर हो चुका है। उनके परिवार, उनके साथियों और उनके पीछे खड़े लाखों छात्रों की नजरें अब सरकार पर टिकी हैं। अगर सरकार चाहती है कि बदले में कोई उग्र हिंसक आंदोलन न खड़ा हो जाए।
तो उसे तुरंत दो कदम उठाने चाहिए पहला—तुरंत चिकित्सा जरूरतों को पूरा करते हुए देवेंद्र नाथ महतो से उनके परिवार के सदस्यों और विश्वसनीय छात्र नेताओं की मौजूदगी में बातचीत करनी चाहिए और उन्हें भूख हड़ताल तोड़ने के लिए आश्वस्त किया जाना चाहिए। दूसरा—परीक्षा घोटाले की जांच की मांग पर तुरंत सकारात्मक संकेत देते हुए एक उच्चस्तरीय समिति का गठन करना चाहिए या सीबीआई जांच की सिफारिश करनी चाहिए।























