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जाने प्राचीन काल में दांत दर्द का इलाज कैसे होता था?

The History of Teeth Cleaning News: प्राचीन काल में इंसान अपने आसपास के वातावरण से बहुत कुछ सीखता था। कहा जाता है कि दांत साफ करने का तरीका इंसानों को जानवरों से मिला। आपने कभी हाथियों को अपनी सूंड में पानी भरकर मुंह धोते हुए देखा होगा या बंदरों को पेड़ की टहनियों को चबाते हुए। कई जंगली जीव अपनी जीभ या पेड़ की डालियों से अपने दांत साफ करते हैं।

दांतों की सड़न रोकने का हजारों साल पुराना प्राकृतिक उपाय

HIGHLIGHTS

  • इंसानों ने बनाया दांत साफ करने का तरीका
  • प्राचीन भारत की अनोखी डेंटल साइंस
  • टूथपेस्ट से पहले क्या इस्तेमाल करते थे लोग?
  • नीम की दातुन क्यों थी हमारे पूर्वजों की पहली पसंद?
  • आधुनिक विज्ञान भी मानता है मिस्वाक और दातुन के फायदे

The History of Teeth Cleaning News: आज के दौर में दांत में तकलीफ होने पर हम सबसे पहले डॉक्टर के पास दौड़ते हैं या फिर दर्द निवारक दवाइयों का सहारा लेते हैं। हमारी बाथरूम की शेल्फ पर सॉफ्ट ब्रश, फ्लेवर टूथपेस्ट और माउथवॉश होना आम बात है। लेकिन क्या आप उस युग की कल्पना कर सकते हैं जब ये सभी सुविधाएं नहीं बनी थी। जब इंसान शिकार करके खाता था और कच्चे मांस के टुकड़े दांतों के बीच फंस जाते थे? तब वे उस सड़न और दर्द से कैसे निपटते होंगे?

इतिहास के पन्नों में झांकने पर पता चलता है कि हमारे पूर्वज बहुत ही समझदार और प्रकृति के करीब थे। दांत साफ करने की कहानी बेहद रोचक है, जिसकी शुरुआत जानवरों से प्रेरणा लेने से हुई।

जंगल से मिली पहली ‘ब्रशिंग’ की सीख

प्राचीन काल में इंसान अपने आसपास के वातावरण से बहुत कुछ सीखता था। कहा जाता है कि दांत साफ करने का तरीका इंसानों को जानवरों से मिला। आपने कभी हाथियों को अपनी सूंड में पानी भरकर मुंह धोते हुए देखा होगा या बंदरों को पेड़ की टहनियों को चबाते हुए। कई जंगली जीव अपनी जीभ या पेड़ की डालियों से अपने दांत साफ करते हैं।

पुरातत्वविदों और शोधकर्ताओं के अनुसार, इंसानों ने भी यही तरीका अपनाया। लगभग 3500 ईसा पूर्व, यानी करीब 5500 साल पहले, बेबीलोनिया, मिस्र और प्राचीन भारत में लोग पेड़ों की टहनियों का उपयोग करने लगे थे। इन्हें ‘च्यूइंग स्टिक्स’ या ‘फाइबर स्टिक्स’ कहा जाता था। यह आधुनिक टूथब्रश का पहला रूप था।

मिस्वाक और दातुन: प्राकृतिक चिकित्सा का खजाना

सबसे प्रसिद्ध और प्रभावी च्यूइंग स्टिक था ‘मिस्वाक’, यह साल्वाडोरा पर्सिका नामक वृक्ष की टहनी से बनता था, जिसे अराक के पेड़ के नाम से भी जाना जाता है। इसका उपयोग करने का तरीका बहुत ही आसान था। लोग टहनी के एक सिरे को चबाकर नरम कर लेते थे। चबाने की प्रक्रिया से वह सिरा फाइबर्स में बदल जाता था, जो ब्रश के ब्रिसल्स जैसा दिखता था। इससे दांतों की सफाई हो जाती थी।

भारतीय संदर्भ में देखें, तो हमारी संस्कृति में इसे ‘दातुन’ कहा जाता है। आयुर्वेद में नीम, बबूल, गुलमोहर और अन्य औषधीय पेड़ों की लकड़ियों को दांत साफ करने के लिए अवश्य बताया गया है। प्राचीन ग्रंथ ‘सुष्रुत संहिता’ में भी दांतों की सफाई और मौखिक स्वच्छता के इन प्राकृतिक तरीकों का विस्तार से वर्णन है।

विज्ञान की नजर में प्राचीन तरीके

यह सिर्फ साफ-सफाई का साधन नहीं था, बल्कि एक प्राकृतिक दवा भी थी। चूंकि प्राचीन काल में लोग मांस और फाइबर युक्त भोजन अधिक खाते थे, अत: दांतों में फंसने वाले कणों से सड़न और बदबू की समस्या आम थी। मिस्वाक और दातुन में प्राकृतिक रूप से एंटीबैक्टीरियल, एंटी-फंगल और फ्लोराइड जैसे तत्व पाए जाते हैं।

आधुनिक विज्ञान भी अब इस बात की पुष्टि करता है। शोध बताते हैं कि मिस्वाक का नियमित उपयोग प्लाक को कम करता है, मसूड़ों को मजबूत बनाता है और मुंह की दुर्गंध को दूर रखता है। यह दांतों में सड़न को रोकने में भी प्रभावी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी कई विकासशील देशों में मौखिक स्वास्थ्य के लिए मिस्वाक के उपयोग को प्रोत्साहित किया है, क्योंकि यह सस्ता, पर्यावरण के अनुकूल और आसानी से उपलब्ध है।

टूथपिक्स का इतिहास और आधुनिक ब्रश का आविष्कार

टहनियों के अलावा, प्राचीन ग्रीस और रोम में लोग टूथपिक्स का भी उपयोग करते थे। खुदाई में मिले साक्ष्यों से पता चलता है कि वे पक्षियों के पंख, साही (porcupine) की कांटों या पतली हड्डियों का उपयोग करके दांतों के बीच फंसा मल साफ करते थे। दर्द के लिए नीम, लहसुन, नमक और बेकिंग सोडा जैसे प्राकृतिक पदार्थों का पेस्ट बनाकर इस्तेमाल करने का भी उल्लेख मिलता है।

जैसा कि हम आज जानते हैं, ब्रिसल्स (बालों) वाला आधुनिक टूथब्रश 15वीं शताब्दी में चीन में आविष्कार हुआ था। इसके हैंडल बांस के बने होते थे और ब्रश के बाल सूअर के पीछे के कठोर बालों से बने होते थे। हालांकि, इससे पहले तक पूरी दुनिया में च्यूइंग स्टिक्स ही दांत साफ करने का प्राथमिक साधन था। इस्लामिक परंपरा में भी पैगंबर मुहम्मद साहब ने मिस्वाक को बहुत पसंद किया और नमाज से पहले इसका उपयोग करने की सलाह दी। आज भी सऊदी अरब, अफ्रीका और एशिया के कई हिस्सों में मिस्वाक का चलन बरकरार है।

प्रकृति की ओर लौटने का दौर

आज के दौर में जहां बाजार भरा पड़ा है केमिकल युक्त टूथपेस्ट और प्लास्टिक के ब्रशों से, वहीं दुनिया फिर से धीरे-धीरे पुराने और प्राकृतिक तरीकों की ओर लौट रही है। लोग प्लास्टिक के कारण होने वाले प्रदूषण को कम करना चाहते हैं। नीम की दातुन, मिस्वाक और हर्बल टूथपाउडर आज फिर से बाजार में उपलब्ध हैं और लोगों की पहली पसंद बनते जा रहे हैं।

हेल्थ और ब्यूटी एक्सपर्ट्स भी मानते हैं कि प्राकृतिक तरीके न केवल हमारे दांतों के लिए बेहतर हैं, बल्कि पर्यावरण के लिए भी हितकारी हैं। प्लास्टिक ब्रश के बजाय बायोडिग्रेडेबल (जीवाणु-अपघट्य) उत्पादों का उपयोग करने से कचरा कम होता है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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