संध्या समय न्यूज संवाददाता
मुंबई। महाराष्ट्र समेत देशभर में स्पाइना बिफिडा (Spina Bifida) जैसे जन्मदोष के मामले चिंता का विषय बनते जा रहे हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, स्पाइना बिफिडा एक जन्मजात विकार है, जिसमें भ्रूण के विकास के दौरान रीढ़ की हड्डी और उसके आसपास की संरचनाओं का विकास पूरी तरह से नहीं हो पाता। गर्भावस्था के शुरुआती चरण में पर्याप्त फोलिक एसिड न मिलना इसके प्रमुख जोखिम कारकों में शामिल है।
लीलावती अस्पताल के सलाहकार बाल चिकित्सा सर्जन डॉ. संतोष करमरकर ने बताया कि स्पाइना बिफिडा रीढ़ की हड्डी से जुड़ा एक गंभीर जन्म दोष है। इसके कारण बच्चों में पैरों की कमजोरी या पक्षाघात जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं और कई मामलों में जीवनभर उपचार एवं पुनर्वास की आवश्यकता पड़ सकती है।
भारत में हर साल हजारों बच्चे प्रभावित
डॉ. संतोष करमरकर के अनुसार, भारत में हर साल 50,000 से अधिक बच्चे इस जन्मदोष के साथ पैदा होते हैं। उन्होंने कहा कि बीमारी की गंभीरता को देखते हुए गर्भावस्था की योजना बनाने वाली महिलाओं और गर्भवती माताओं में फोलिक एसिड के महत्व को लेकर जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है।
स्पाइना बिफिडा को आमतौर पर वंशानुगत बीमारी के रूप में नहीं देखा जाता। इसके विकास में आनुवंशिक और पर्यावरणीय दोनों कारकों की भूमिका हो सकती है, जबकि गर्भावस्था के शुरुआती दौर में फोलेट/फोलिक एसिड की कमी एक महत्वपूर्ण जोखिम कारक है।
फोलिक एसिड क्यों है जरूरी?
गर्भावस्था के शुरुआती हफ्तों में बच्चे की न्यूरल ट्यूब का विकास होता है। इसी दौरान फोलेट की पर्याप्त मात्रा न्यूरल ट्यूब के सामान्य विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए गर्भधारण से पहले और गर्भावस्था के शुरुआती चरण में डॉक्टर की सलाह के अनुसार फोलिक एसिड का सेवन स्पाइना बिफिडा सहित कुछ न्यूरल ट्यूब डिफेक्ट के जोखिम को कम करने में मदद कर सकता है।
गर्भवती महिलाओं को फोलिक एसिड की खुराक अपने डॉक्टर की सलाह के अनुसार ही लेनी चाहिए।



























