लोकतंत्र की नींव तभी तक मजबूत रहती है, जब तक उसकी रक्षा करने वाली संस्थाएं निष्पक्ष और विश्वसनीय बनी रहती हैं। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में निर्वाचन आयोग को हमेशा एक स्वतंत्र और प्रतिष्ठित संस्था के रूप में देखा गया है। लेकिन पिछले कुछ समय से इस संस्था की विश्वसनीयता को लेकर जो बहस देश की राजनीति में तेज हो रही है, वह किसी एक पार्टी का मुद्दा नहीं रह गई है।
मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर उठ रहे सवाल, निर्वाचन आयुक्तों के बीच कथित मतभेद की खबरें और अब देशभर में सड़कों पर उतर रहे प्रदर्शन—यह सब मिलकर एक गंभीर संकेत दे रहे हैं कि संवैधानिक संस्थाओं और जनता के बीच का भरोसा परीक्षा में है।

सोमवार को कांग्रेस द्वारा मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर झारखंड से लेकर जम्मू-कश्मीर, तेलंगाना से लेकर कर्नाटक और मणिपुर से लेकर गुजरात तक हुए प्रदर्शन इस बहस को एक नया आयाम दे गए हैं। यह सिर्फ एक राजनीतिक दल का आंदोलन नहीं है; यह उस बड़े सवाल का हिस्सा है कि क्या हमारा चुनावी तंत्र अब भी वह भरोसा कर रहा है, जो एक लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है?
एसआईआर विवाद
मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण अपने आप में कोई असामान्य कदम नहीं है। चुनाव आयोग का यह संवैधानिक दायित्व है कि मतदाता सूचियां सटीक, अद्यतन और समावेशी हों। लेकिन किसी भी प्रक्रिया की वैधता उसके इरादे और क्रियान्वयन दोनों पर निर्भर करती है।
कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों की चिंता इस बात को लेकर है कि पुनरीक्षण की प्रक्रिया में अपनाए जा रहे तरीके—खासकर फॉर्म 6 के इस्तेमाल और मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया—पारदर्शी नहीं हैं और इससे आम मतदाता के लिए कठिनाइयां बढ़ रही हैं।

श्रीनगर में प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले कांग्रेस सांसद पवन खेड़ा का कहना है कि पार्टी काफी समय से एसआईआर को लेकर चिंता जता रही है और चुनाव आयोग की ओर से मिल रही जानकारी ने उन सवालों को और मजबूत किया है। यह बात सुनने में सरल लगती है, पर इसके पीछे की चिंता गंभीर है।
मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया यदि इतनी जटिल हो जाए कि आम नागरिक—जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों के मतदाता, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और प्रवासी श्रमिक शामिल हैं—अपना मताधिकार सिद्ध करने के लिए कानूनी-प्रशासनिक उलझनों से जूझे, तो यह प्रक्रिया अपने मूल उद्देश्य से च्युत हो जाती है।
तेलंगाना के उपमुख्यमंत्री मल्लू भट्टी विक्रमार्का ने संविधान की प्रति हाथ में लेकर जो धरना दिया, वह प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण था। उनका तर्क था कि दो चुनाव आयुक्तों के कथित विवाद ने कांग्रेस की चिंताओं की पुष्टि कर दी है।

यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि जब विपक्ष किसी मुद्दे पर आवाज उठाता है और उसके बाद ऐसी खबरें सामने आती हैं जो उसके सवालों को बल देती हैं, तो बहस का केंद्र राजनीतिक नहीं रहकर संस्थागत बन जाता है।
रिपोर्ट जिसने बहस को बदल दिया
इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की वह रिपोर्ट है, जिसमें दावा किया गया कि निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले दस महीनों में कम से कम चौदह बार ऐसे फैसलों और आदेशों पर आपत्ति दर्ज कराई, जिन्हें उनकी जानकारी के बिना जारी बताया गया।
यह दावा, यदि सत्य है, तो अत्यंत गंभीर प्रकृति का है। तीन सदस्यों वाला निर्वाचन आयोग एक सामूहिक निकाय है। इसकी साख इसी सामूहिकता, आपसी विचार-विमर्श और अंतिम फैसले की पारदर्शिता पर टिकी होती है।
A heavy police contingent and concertina wires were deployed outside the @INCJammuKashmir office in Srinagar by the LG administration to foil a protest against #VoteChori and the weaponisation of the ECI to favour the BJP.
From Kashmir to Kanyakumari, the same demand is… pic.twitter.com/KyuTirLPWT
— Pawan Khera 🇮🇳 ಪವನ್ ಖೇರಾ (@Pawankhera) September 28, 2026
यदि आयुक्तों को उन फैसलों की जानकारी नहीं होती जो उनके नाम से जारी होते हैं, तो यह न केवल संस्थागत शिष्टाचार का उल्लंघन है, बल्कि आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली पर एक गहरा प्रश्नचिह्न भी है।
रांची में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश का आरोप है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त “भाजपा के एजेंट की तरह” काम कर रहे हैं। यह भाषा कटु है और इसे आधारहीन कहा जा सकता है, लेकिन यह भी देखना होगा कि ऐसी भाषा का इस्तेमाल करने के लिए विपक्ष को जिस अविश्वास की स्थिति तक पहुंचना पड़ा, वह खुद एक संकेत है। राजनीतिक दल तब तक इतनी तीखी टिप्पणियां नहीं करते, जब तक उन्हें लगता है कि संवाद के औपचारिक रास्ते बंद हो चुके हैं।
राजनीति या लोकतांत्रिक जिम्मेदारी?
किसी भी ईमानदार बहस के लिए दोनों पक्षों के तर्कों को समझना जरूरी है। विपक्ष का कहना है कि हरियाणा और महाराष्ट्र में राहुल गांधी द्वारा प्रस्तुत “वोट चोरी” के दावों के बाद, एसआईआर की प्रक्रिया, आयुक्तों के बीच मतभेद की खबरें और चुनाव आयोग की संवादहीनता मिलकर एक ऐसा बिंब बनाते हैं जिसमें चुनावी तंत्र की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
केरल के गृह मंत्री रमेश चेन्निथला का यह कहना कि मौजूदा आयोग के तहत एक और चुनाव कराना “धोखा” होगा, अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है, पर उनका यह सुझाव कि निर्वाचन आयुक्तों के चयन समिति में पुनः चief जस्टिस को शामिल किया जाए, एक वैधानिक-संस्थागत बहस को जन्म देता है। यह याद रखना होगा कि 2023 में संसद से पारित कानून के जरिए चयन समिति से प्रधान न्यायाधीश की जगह बदली गई थी, और विपक्ष तब भी इसका विरोध कर चुका है।
दूसरी ओर, सत्तारूढ़ पक्ष का तर्क भी सुनने योग्य है। गुजरात के सुरेंद्रनगर जिला भाजपा अध्यक्ष हार्दिक तमालिया का कहना है कि कांग्रेस जीतती है तो सिस्टम की तारीफ करती है और हारती है तो ईवीएम और चुनाव आयोग पर उंगली उठाती है। यह आरोप पूरी तरह बेबुनियाद नहीं कहा जा सकता। भारतीय राजनीति में चुनावी हार को संस्थाओं पर दोषारोपण से छिपाने की प्रवृत्ति समय-समय पर देखी गई है।
लेकिन यहां एक अंतर समझना जरूरी है—जब कोई पार्टी सिर्फ हार के बाद सवाल उठाती है तो वह राजनीति है; लेकिन जब मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया, आयुक्तों के बीच कथित असहमति और पारदर्शिता की कमी जैसे मुद्दों पर सवाल उठ रहे हों, तो उन्हें केवल ‘हार का रोना’ कहकर खारिज करना भी संस्थागत हित में नहीं है।
गुजरात में यह भी देखा गया कि बिना अनुमति रैली निकालने पर दो सौ से अधिक कांग्रेस कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया। विरोध प्रदर्शन का अधिकार लोकतंत्र का मौलिक हिस्सा है, और प्रशासनिक सतर्कता जरूरी होने के बावजूद यह सुनिश्चित करना भी लोकतंत्र की जिम्मेदारी है कि विरोध की आवाज दबाई न जाए।
जम्मू से मणिपुर तक
इस बार के प्रदर्शनों की एक खासियत उनका भौगोलिक विस्तार है। झारखंड के सभी जिला मुख्यालयों में धरने, जम्मू क्षेत्र के सात-आठ जिलों में प्रदर्शन, तेलंगाना में उपमुख्यमंत्री स्तर की भागीदारी, मणिपुर के कई जिलों में विरोध, कर्नाटक के मेंगलुरु में पैदल मार्च और महाराष्ट्र भर में ज्ञापन—यह तस्वीर बताती है कि चुनावी तंत्र को लेकर असंतोष अब केंद्रित नहीं रहा।
जम्मू में पूर्व मंत्री योगेश साहनी ने चार मांगें रखीं—इस्तीफा, जांच/गिरफ्तारी, कार्यकाल के फैसलों की समीक्षा और पीछे के ‘संचालकों’ का उजागर होना। इन मांगों की वैधता पर बहस हो सकती है, पर यह स्पष्ट है कि विपक्ष अब केवल नीतिगत विरोध नहीं, बल्कि संस्थागत जवाबदेही की मांग कर रहा है।
मणिपुर जैसे संवेदनशील राज्य में यह प्रदर्शन और भी मायने रखता है, क्योंकि वहां चुनावी प्रक्रियाओं की स्वच्छता पर ही शांति और प्रतिनिधित्व का भरोसा टिका होता है। कांग्रेस के उपाध्यक्ष अमीन शाह का कहना कि उनका उद्देश्य “लोकतांत्रिक संस्थाओं की रक्षा” करना है, इसी भावना को दर्शाता है।
संस्थागत स्वतंत्रता कैसे बनी रहे
इस पूरे घटनाक्रम को हमें एक बड़े प्रश्न के रूप में देखना चाहिए—संस्थागत स्वतंत्रता कैसे बनी रहती है? इतिहास गवाह है कि भारतीय निर्वाचन आयोग ने कई बार अपनी निष्पक्षता का लोहा मनवाया है। टी. एन. शेषन से लेकर एस. वाई. कुरैशी तक, कई आयुक्तों ने ऐसे फैसले लिए जिनसे सत्ताधारी दलों को नाखुश होना पड़ा। यही विरोधाभास और यही दबाव झेलने की क्षमता आयोग की प्रतिष्ठा की रीढ़ रही है।
जब यह धारणा बनने लगती है कि आयोग सरकार के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो गया है, तो नुकसान सिर्फ विपक्ष का नहीं होता। नुकसान उस मतदाता का होता है जो मतदान केंद्र पर जाते हुए सोचता है कि क्या उसका वोट वाकई गिना जाएगा?
नुकसान उस हारने वाले प्रत्याशी का होता है जो परिणाम स्वीकार करने के बजाय अदालत का दरवाजा खटखटाता है। और अंततः नुकसान लोकतंत्र का होता है, जिसमें हार-जीत का स्वीकार्य संस्थागत मंच धीरे-धीरे अविश्वास का शिकार हो जाता है।
चेन्निथला का सुझाव—कि चयन समिति में पुनः प्रधान न्यायाधीश को शामिल किया जाए—इस दिशा में एक ठोस सुधारात्मक कदम हो सकता है। इसी तरह, आयोग की आंतरिक कार्यप्रणाली को और पारदर्शी बनाना, आयुक्तों की असहमति दर्ज करने की औपचारिक व्यवस्था, और मतदाता सूची संशोधन की प्रक्रिया में राजनीतिक दलों को समय पर जानकारी देना—ये सब ऐसे उपाय हैं जो आयोग की साख को पुनर्स्थापित कर सकते हैं।
संतुलन की जरूरत
यह भी आवश्यक है कि हम विपक्ष के दृष्टिकोण में निहित संभावित जोखिमों को नजरअंदाज न करें। मुख्य चुनाव आयुक्त से इस्तीफे और “गिरफ्तारी” की मांग—बिना किसी न्यायिक प्रक्रिया के—एक गंभीर कदम है।
संस्थागत जवाबदेही के लिए सही मार्ग तथ्यों की जांच, संसदीय बहस, न्यायिक समीक्षा और सुधार है, न कि केवल इस्तीफे की बाजीगरी। यदि प्रत्येक सत्ता-परिवर्तन के बाद संस्थाध्यक्षों से इस्तीफे की मांग राजनीतिक साधन बन जाए, तो संस्थाओं की स्वतंत्रता उल्टे असर से प्रभावित होगी।
इसी प्रकार, सत्ताधारी गठबंधन के लिए भी यह समझना जरूरी है कि संस्थाओं की रक्षा का सबसे बड़ा हथियार पारदर्शिता है। यदि आयुक्तों के बीच मतभेद की खबरें लगातार आ रही हैं, तो आयोग को स्वयं आगे आकर स्पष्टीकरण देना चाहिए। चुप्पी अक्सर अविश्वास को और गहरा करती है। एक ऐसी संस्था जो देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक अभ्यास का संचालन करती है, उसकी सबसे बड़ी पूंजी उसका संवाद है—जनता से, राजनीतिक दलों से और मीडिया से।
भरोसा ही असली पूंजी
देशभर में हुए प्रदर्शन, आयुक्तों के बीच कथित मतभेद की रिपोर्ट्स और एसआईआर प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवाल—यह सब मिलकर एक स्पष्ट संदेश देते हैं: निर्वाचन आयोग की साख एक ऐसी पूंजी है जिसे बनाने में दशक लगते हैं, पर नुकसान कुछ ही वर्षों में हो सकता है।
इस स्थिति से निकलने के तीन रास्ते हैं। पहला, चुनाव आयोग स्वयं अपनी कार्यप्रणाली में असाधारण पारदर्शिता लाए—मतदाता सूची संशोधन के आंकड़े, आपत्तियां, निपटारा और आयुक्तों की सहमति का विवरण सार्वजनिक करे।
दूसरा, संसद में निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया, एसआईआर की विधिक वैधता और सुधारों पर गंभीर, गैर-द्विवेदी बहस हो। तीसरा, सभी राजनीतिक दल यह स्वीकारें कि संस्थाओं की साख राष्ट्रीय संपत्ति है और उसे दैनिक राजनीति का शस्त्र नहीं बनाया जा सकता—न आरोप लगाकर, न आरोपों को दबाकर।
जब तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त के इस्तीफे की मांगें जारी रहेंगी और जब तक सरकार उन्हें केवल राजनीति मानकर टालेगी, तब तक यह गतिरोध लोकतंत्र के लिए स्वस्थ नहीं होगा। असली समाधान इस्तीफे में नहीं, बल्कि भरोसे की पुनर्स्थापना में है। और भरोसा घोषणाओं से नहीं, कार्यों से बनता है—पारदर्शी कार्यों, खुले संवाद और उन फैसलों से, जिनका हर हिस्सा, हर आयुक्त और हर नागरिक जान सके।





















