भाजपा में उठी 2029 की राजनीतिक शतरंज

जंतर-मंतर के आंदोलन ने जो राजनीतिक तूफान खड़ा किया है, उसका सबसे बड़ा असर यह हुआ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब अपनी ही पार्टी और सरकार में घिरते महसूस कर रहे हैं। दिल्ली की राजनीतिक चर्चाओं का केंद्रबिंदु अब विपक्ष की कमजोरियां नहीं, बल्कि सत्ता के भीतर की ‘साजिशें’ हैं।

भाजपा का गृहयुद्ध: 2029 की तैयारी? (फाइल फोटो)

HIGHLIGHTS

  • ब्रूटस के हाथ में कमल
  • अभेद्य कवच टूटा, अब घिरे मोदी
  • शाह की खामोशी का राज़
  • दो गुटों की घातक शतरंज

BJP’s Civil War 2029: दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों और युवाओं का आंदोलन शायद सतही तौर पर एक शैक्षणिक सुधार या परीक्षा प्रणाली की व्यवस्था को लेकर उठा हुआ विरोध प्रतीत हो रहा हो, लेकिन राजनीति के गहरे समुद्र में डूबकर लगने वाले पर्यवेक्षकों के लिए यह घटनाक्रम बेहद संकेतक है। यह आंदोलन केवल शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे तक सीमित नहीं रहा, वास्तव में इसने उस मिथक को तोड़ दिया है, जिसे भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चारों ओर कवच-कुंडल के रूप में पिछले एक दशक से गढ़ा जा रहा था। यह पहली बार है जब मोदी सरकार की अंदरूनी मजबूती और उनकी निजी लोकप्रियता के अभेद्य किले में दरारें स्पष्ट रूप से दिखने लगी हैं और ये दरारें विपक्ष की वजह से नहीं, बल्कि सत्ता के अंदर बैठे उन लोगों की वजह से हैं, जिन्हें अब तक मोदी का सबसे वफादार ‘संघर्षशील साथी’ माना जाता रहा है।

जंतर-मंतर के आंदोलन ने जो राजनीतिक तूफान खड़ा किया है, उसका सबसे बड़ा असर यह हुआ है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब अपनी ही पार्टी और सरकार में घिरते महसूस कर रहे हैं। दिल्ली की राजनीतिक चर्चाओं का केंद्रबिंदु अब विपक्ष की कमजोरियां नहीं, बल्कि सत्ता के भीतर की ‘साजिशें’ हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या गृहमंत्री अमित शाह, जिन्हें मोदी की सत्ता का मुख्य रणनीतिकार माना जाता रहा है, 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री पद की राजनीतिक चाहत में अपने ही साथी के खिलाफ षड्यंत्र रच रहे हैं? महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे के साथ जो गद्दारी और गठबंधन तोड़ने का काम किया था, क्या अमित शाह उसी रणनीति को दिल्ली में नरेंद्र मोदी पर लागू करने की तैयारी में हैं?

नैतिक अकाल और सत्ता की बेशर्मी

इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए सबसे पहले उस घटना पर गौर करना होगा, जिसने देश की राजनीतिक नैतिकता को चुनौती दी। नीट (NEET) पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। एक मंत्री के इस्तीफे को सामान्यतः सरकार की नैतिक हार और जवाबदेही के तौर पर देखा जाता है। लेकिन इस्तीफे के अगले ही दिन जब प्रधान संसद भवन से बाहर निकले, तो भाजपा के समर्थकों ने उनका जिस तरह से स्वागत किया और फूलों की बारिश की, वह लोकतंत्र को आघात पहुंचाने वाली थी। यह राजनीतिक बेशर्मी की चरम सीमा थी, जहां एक विफल मंत्री को वीरता का पुरस्कार दिया जा रहा था।

अंग्रेजी कवि लॉर्ड टेनिसन ने कहा था—‘‘मेरा अंतःकरण चरित्र के कारण शुद्ध है, इसलिए मेरे शरीर में दस हाथियों का बल समाया हुआ है।’’ टेनिसन के इस कथन का तात्पर्य था कि नैतिक शक्ति और चरित्र ही वास्तविक शारीरिक और मानसिक बल प्रदान करते हैं। लेकिन आज की भारतीय राजनीति में चरित्र का भयंकर अकाल पड़ा है। सूखे की विषम परिस्थितियों में किसान वरुण देव से वर्षा की प्रार्थना करते हैं, लेकिन इस नैतिक अकाल को दूर करने के लिए राजनीति में किसकी ओर देखा जाए? चरित्र अब कोई सद्गुण नहीं रहा। आज सत्ता, संपत्ति और कपट से बल बनाया जा रहा है। इसी कृत्रिम बल का इस्तेमाल जंतर-मंतर पर बैठे निहत्थे छात्रों को कील-वाली लाठियों और छर्रे दागने वाली बंदूकों से कुचलने में किया गया। और ये सब करवाकर देश के गृहमंत्री अनजान बने रहे।

अमित शाह की रहस्यमय चुप्पी और षड्यंत्र के सूत्र

जंतर-मंतर का आंदोलन अचानक नहीं भड़का था। जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के साथ युवाओं का यह मोर्चा धीरे-धीरे सड़कों से संसद तक पहुंचा। एक ऐसे गृहमंत्री, जिसकी राजनीतिक प्रखरता और प्रशासनिक दक्षता का लोहा पार्टी हमेशा मानती रही है—चुनावी रणनीतिकार के तौर पर उनकी प्रतिष्ठा कायम रही है, वे कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्व तक की सबसे जटिल स्थितियों को संभालने का दावा करते हैं—ऐसे शख्स के लिए दिल्ली के बीचों-बीच एक छात्र आंदोलन को नियंत्रित करना कठिन नहीं था।

जब प्रदर्शनकारी शांतिपूर्ण ढंग से संसद की तरफ मार्च कर रहे थे, तब तक स्थिति नियंत्रण में थी। उस समय प्रदर्शनकारियों से बातचीत की जा सकती थी। लेकिन जिस तरह से अचानक लाठीचार्ज, आंसू गैस के गोले और बलपूर्वक दमन का इस्तेमाल किया गया, वह किसी भी प्रशासनिक विफलता से अधिक एक ‘सोची-समझी रणनीति’ लगती है। इसका उद्देश्य युवाओं के असंतोष में जानबूझकर खाद-पानी डालकर उसे उग्र और हिंसक रूप देना था।

इस पूरे दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि बदनाम हुई और उनके ही मंत्रिमंडल से एक सदस्य को घर जाना पड़ा, जबकि हर छोटे-बड़े मुद्दे पर दहाड़ने वाले अमित शाह रहस्यमय तरीके से चुप रहे। इस चुप्पी के पीछे क्या रहस्य है? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शाह या तो इस स्थिति को संभालने में विफल रहे (जो कि उनकी क्षमता पर प्रश्नचिह्न लगाता है), या फिर उन्होंने जानबूझकर यह अराजकता फैलाने वाले कदम उठाए।

क्यों? क्योंकि जंतर-मंतर के आंदोलन ने उन ताकतों को पहचानने और उन्हें कमजोर करने का मौका दिया, जो भविष्य में (2029 के बाद) नरेंद्र मोदी की जगह ले सकती थीं। युवाओं के गुस्से को मोदी के खिलाफ मोड़ दिया गया। एक तरह से देखा जाए तो युवा प्रधानमंत्री मोदी के राजनीतिक वस्त्रहरण कर रहे थे, और अमित शाह महाभारत के शकुनि की भूमिका में इस वस्त्रहरण को रोकने के बजाय उसे आगे बढ़ाते हुए खड़े नजर आ रहे थे।

2029 का खतरा और गुटबाजी

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का आखिरी दौर शुरू हो चुका है, यह बात अब दिल्ली के कॉरिडोर में चुभ रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को एकल बहुमत नहीं मिला, जिसे गठबंधन के बल पर छुपाया गया है। इस हार के बाद से ही मोदी की अजेयता का मिथक टूट चुका है। इसी वजह से 2029 से पहले भाजपा में कई नेताओं की प्रधानमंत्री बनने की आकांक्षाएं जाग गई हैं। इन आकांक्षाओं में सबसे आक्रामक और संगठनात्मक रूप से सबसे मजबूत स्थिति अमित शाह की बनी हुई है।

दिल्ली में चल रही गहरी राजनीतिक चर्चाओं के अनुसार, अमित शाह ने नरेंद्र मोदी पर दबाव बनाकर खुद को उप-प्रधानमंत्री के रूप में घोषित करवाने की भूमिका अख्तियार कर ली है, ताकि वे आधिकारिक रूप से मोदी के राजनीतिक उत्तराधिकारी के तौर पर स्थापित हो सकें। लेकिन मोदी को यह भूमिका कतई मंजूर नहीं है। मोदी की मानसिकता स्पष्ट है—‘मैं ही भाजपा का आखिरी और सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्री हूं, और मेरे बाद गुजरात का कोई भी नेता मुझसे आगे नहीं बढ़ेगा।’ यही सोच शाह को बेचैन कर रही है।

निष्ठा एक ऐसा धागा है जो महत्वाकांक्षा के तेज तूफान में आसानी से टूट जाता है। अमित शाह ने अपने लिए एक अलग राजनीतिक गुट तैयार करना शुरू कर दिया है। इस गुट में उन्होंने ऐसे नेताओं को शामिल किया है, जो प्रदेश की सत्ता में बैठे हैं और जिनकी अपने केंद्रीय नेतृत्व से निजी नजदीकियां हैं। पश्चिम बंगाल में सुवेंदु अधिकारी की अगुवाई, महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे का गुट, असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा और पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा—ये सभी नाम अमित शाह के प्रभाव क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं।

शाह यहीं नहीं रुके, उन्होंने अपने रास्ते में आने वाली बाधाओं को कुचलने की मशीनरी भी चला रखी है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और महाराष्ट्र के देवेंद्र फडणवीस जैसे नेता, जिनकी अपनी प्रदेश में अलग पहचान और सत्ता का आधार है, उन्हें जहां तक हो सके परेशान किया जा रहा है। विशेषकर महाराष्ट्र में नितिन गडकरी और देवेंद्र फडणवीस शाह के रास्ते की सबसे बड़ी रुकावट हैं, इसलिए शाह की राजनीतिक मशीनरी लगातार उनके खिलाफ सक्रिय है।

इसके अलावा, शाह ने पार्टी तोड़ने की अपनी पुरानी विरासत को भी जारी रखा है। तृणमूल कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव गुट) के बागी सांसदों को उन्होंने सीधे भाजपा में शामिल नहीं किया, बल्कि उन्हें एक अलग गुट के रूप में संगठित किया। शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के सांसदों को तोड़कर शिंदे गुट में मिलाने की योजना भी उन्हीं की देन मानी जा रही थी, हालांकि इस मुहिम को नरेंद्र मोदी ने अभी के लिए रोक दिया है। मोदी को समझ आ गया है कि शाह पार्टी के बागियों को अपने निजी संसाधन के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।

मोदी की काउंटर-स्ट्रैटेजी और महाराष्ट्र का चुनावी शतरंज

नरेंद्र मोदी किसी हद तक लाचार दिखते हैं। गृह मंत्रालय के अधीन आने वाली सभी जांच एजेंसियों—ईडी, सीबीआई, आईबी—की डोर अमित शाह के हाथ में है। पिछले दशक में मोदी ने दिल्ली की हर हलचल और साजिश के लिए शाह पर अंध विश्वास किया, लेकिन अब उन्हें इस निर्भरता का अहसास होने लगा है। एक ऐसे मोदी, जिन्हें दुनिया भर में एक मजबूत नेता के रूप में देखा जाता था, की पार्टी में बहुमत का फुलाया हुआ आंकड़ा भी अब शाह की खरीद-फरोख्त की नीतियों का शिकार होता दिख रहा है।

मोदी ने भी मोर्चा संभालना शुरू कर दिया है। सबसे बड़ा कदम उन्होंने महाराष्ट्र की राजनीति में उठाया है। उन्होंने देवेंद्र फडणवीस को दिल्ली बुलाकर केंद्रीय मंत्रिमंडल में कोई बड़ी जिम्मेदारी संभालने का प्रस्ताव दिया है। मोदी ने फडणवीस से कहा है कि अब दिल्ली में उन्हें फडणवीस की जरूरत है और बदले में महाराष्ट्र में उनकी (फडणवीस की) पसंद का कोई नेता मुख्यमंत्री बनाया जाएगा। मोदी की यह रचना भविष्य में भाजपा में होने वाली संभावित बगावत को रोकने और शाह के खिलाफ एक मजबूत धुरी तैयार करने की कवायद है।

महाराष्ट्र की राजनीति वास्तव में दिल्ली की राजनीति का एक सूक्ष्म प्रतिबिंब है। राज्य में सरकार आपसी लड़ाई में पूरी तरह फंसी हुई है। देवेंद्र फडणवीस और एकनाथ शिंदे का गठबंधन एक जबरदस्ती का रिश्ता है। पत्रकारवार्ताओं में ‘हम दोनों दोस्त हैं, हमारे बीच फूट नहीं पड़ेगी’ जैसे दावे करना दरअसल उन दरारों को छुपाने का प्रयास है, जो दोनों गुटों के बीच स्पष्ट दिख रही हैं। दिल्ली में जो छिपा हुआ संघर्ष चल रहा है, महाराष्ट्र में वह खुलकर सामने आ गया है। सत्ता के सूत्र ही इन्हें एक साथ बांधे हुए हैं। इनका रिश्ता एक तरह से ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ से कम नहीं है—जहां भावनाओं और इमोशन का कोई स्थान नहीं है, बस सत्ता का स्वार्थ और मतलब ही शामिल है। जंतर-मंतर पर छात्रों के साथ जिस निर्ममता का प्रदर्शन किया गया, उसने इस राजनीतिक गठजोड़ में शेष बचे हुए इमोशन को भी खत्म कर दिया है।

वैश्विक साख का क्षरण और अंतिम सत्य

नरेंद्र मोदी पहले से ही कुछ वैश्विक शक्तियों के निशाने पर थे, लेकिन जंतर-मंतर जैसे जन आंदोलनों को क्रूरता से कुचलने के बाद उनकी बची-खुची अंतरराष्ट्रीय साख भी धराशायी हो गई है। अब वैश्विक मंचों पर यह धारणा बलवती होती जा रही है कि मोदी कोई लोकतांत्रिक नेता नहीं रहे, बल्कि चुनावी मशीनरी को कब्जे में रखकर सत्ता में बने रहने वाले एक तानाशाह हैं। कुछ विश्लेषकों का तो यहां तक मानना है कि इस वैश्विक छवि को खराब करने और मोदी के पतन की नींव रखने में गृह मंत्रालय की बड़ी मशीनरी का इस्तेमाल किया गया, ताकि अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते मोदी कमजोर हों।

दिल्ली की आगे की राजनीति इन्हीं सूत्रों के इर्द-गिर्द घूमेगी। नरेंद्र मोदी की घेराबंदी अब उनकी ही पार्टी में हो गई है। इतिहास गवाह है कि जब भी किसी तानाशाह या सर्वेशक्तिमान नेता का अंतिम दौर शुरू होता है, तो सबसे बड़ा प्रहार बाहर से नहीं, बल्कि अपने ही दरबार में बैठे लोगों से होता है। रोमन साम्राज्य के महान शासक जूलियस सीजर की हत्या उसके सबसे करीबी और विश्वसनीय साथी ब्रूटस ने ही की थी।

आज भारतीय राजनीति में ब्रूटस के हाथ में कमल का फूल है। तलवार अभी निकाली नहीं गई है, लेकिन वह म्यान से बाहर आने वाली है। मोदी खुद अपनी इच्छा से राजनीतिक सन्यास लेंगे, या फिर उनकी ही पार्टी के ‘ब्रूटस’ उन्हें सत्ता से भगाएंगे—यह देखना अब केवल समय की बात बची है। लेकिन एक बात स्पष्ट है: भाजपा का वह पुराना दौर खत्म हो चुका है, जहां ‘एक नेता, एक पार्टी’ का नारा था। अब नई दिल्ली में नई साजिशें, नए गुट और नई तलवारें चल रही हैं। जंतर-मंतर की धूल अभी उतरी नहीं थी कि दिल्ली के सियासी अखाड़े में एक और घातक दंगल की तैयारी शुरू हो गई है।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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