सफेद रबर से काला टायर, ये विज्ञान जानकर चौंक जाएंगे

टायर बनाने वाला मूल प्राकृतिक रबर गाढ़े दूध जैसा सफेद होता है। रबर के पेड़ों से जो लेटेक्स निकलता है, वह किसी भी तरह से काला नहीं है। फिर आखिर वह सफेद तरल कैसे एक ऐसे काले और कठोर टायर में बदल जाता है जो सड़कों पर तेज़ रफ्तार का सामना करता है?

पेड़ से निकलता है सफेद रबर, फिर टायर क्यों होते हैं काले? जानिए इसके पीछे का विज्ञान

HIGHLIGHTS

  • टायर काला क्यों होता है? जानिए इस छुपे राज़ को
  • काला न हो तो टायर कुछ ही दिनों में घिसे
  • धूप से बचाता है काला रंग, जानें टायर का सच
  • इस एक चीज़ से टायर की उम्र हो जाती दसगुना
  • क्या आपने कभी सोचा टायर काला ही क्यों होता है?

Find out how carbon black is used to make tires: हम रोज़ाना सड़कों पर अलग-अलग रंगों और डिज़ाइन की गाड़ियां दौड़ते हुए देखते हैं। लाल, नीले, सफेद और हरे रंग की शानदार कारें हमारा ध्यान खींचती हैं, लेकिन एक चीज़ जो लगभग हर वाहन में एक जैसी होती है, वह है—काले रंग के टायर। आपने कभी यह सवाल अपने दिमाग में उठाया है? अगर नहीं, तो अब उठाइए।

दरअसल, टायर बनाने वाला मूल प्राकृतिक रबर गाढ़े दूध जैसा सफेद होता है। रबर के पेड़ों से जो लेटेक्स निकलता है, वह किसी भी तरह से काला नहीं है। फिर आखिर वह सफेद तरल कैसे एक ऐसे काले और कठोर टायर में बदल जाता है जो सड़कों पर तेज़ रफ्तार का सामना करता है? इसके पीछे कोई जादू नहीं, बल्कि एक बेहद दिलचस्प रसायनिक और वैज्ञानिक प्रक्रिया है। आइए इस रहस्य को विस्तार से समझते हैं।

प्राकृतिक रबर की उत्पत्ति

दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाला ज़्यादातर प्राकृतिक रबर एक विशेष पेड़ ‘हेविया ब्रासिलिएंसिस’ से प्राप्त होता है। जब किसान या मजदूर इस पेड़ की छाल में एक तिरछी कट लगाते हैं, तो उसमें से एक सफेद, दूधिया और गाढ़ा तरल बाहर निकलता है, जिसे ‘लेटेक्स’ कहते हैं।

यह लेटेक्स देखने में बिल्कुल वैसा ही होता है जैसे कोई पौधे से दूध निकला हो। इस तरल में लगभग 30 से 40 प्रतिशत रबर कण होते हैं, जबकि बाकी पानी और प्रोटीन होती है। इस सफेद लेटेक्स को प्रोसेसिंग यूनिट ले जाया जाता है, जहां पानी को वाष्पित करके उसे शीट्स या ब्लॉक्स के रूप में बदल लिया जाता है। यह कच्चा रबर बहुत लचीला, मजबूत और पानी को रोकने वाला होता है। लेकिन, यही कच्चा रबर अगर सीधे सड़क पर उतार दिया जाए, तो क्या होगा?

सिर्फ सफेद रबर से टायर बनाने में क्या दिक्कत आती है?

अगर कोई कंपनी सिर्फ सफेद प्राकृतिक रबर का इस्तेमाल करके टायर बनाए, तो वह टायर शायद ही कुछ किलोमीटर चल पाए। इसके पीछे तीन मुख्य वजहें हैं:

  1. घर्षण और टूटना : सड़क की सतह बहुत रफ़ होती है। जब सफेद रबर इस सतह से टकराता है, तो वह बहुत तेज़ी से घिसकर खत्म हो जाता है।
  2. गर्मी का प्रभाव: जब गाड़ी तेज़ रफ्तार से चलती है, तो टायर और सड़क के बीच जबरदस्त घर्षण होता है, जिससे बहुत तेज़ गर्मी पैदा होती है। सफेद रबर इस गर्मी को सहन नहीं कर पाता और पिघलने लगता है या फट जाता है।
  3. सूरज की हानिकारक किरणें: धूप में मौजूद अल्ट्रावायलेट (UV) किरणें प्राकृतिक रबर के पॉलिमर चेन को तोड़ देती हैं, जिससे रबर कड़ा होकर भूरे रंग का हो जाता है और चूरा-चूरा होने लगता है।

टायर को काला और अजेय बनाने वाला जादूई पदार्थ

तो इंजीनियरों ने इस समस्या का हल ढूंढा। उन्होंने सफेद रबर में एक विशेष केमिकल मिलाया, जिसे कहा जाता है ‘कार्बन ब्लैक’। कार्बन ब्लैक कोई साधारण स्याही या काला रंग नहीं है, बल्कि यह एक बेहद हल्का और बारीक पाउडर होता है जिसे भारी मात्रा में पेट्रोलियम पदार्थों (तेल) या कोयले को आंशिक रूप से जलाकर बनाया जाता है।

जब यह कार्बन ब्लैक सफेद रबर में मिलाया जाता है, तो यह रबर के अंदर एक मजबूत जाल बना लेता है। इसके फायदे बेहद अद्भुत हैं:

  • टिकाऊपन में भारी इजाफा: कार्बन ब्लैक रबर के पॉलिमर्स के साथ जुड़कर एक सुरक्षात्मक ढाल बनाता है। इसे मिलाने से टायर की उम्र 5 से 10 गुना तक बढ़ जाती है। बिना इसके टायर सिर्फ 5000 किलोमीटर चल पाते, लेकिन इसके बाद वे 50,000 से ज्यादा किलोमीटर आसानी से तय कर लेते हैं।
  • गर्मी को अवशोषित करना : यह टायर की सबसे बड़ी खासियत है। कार्बन ब्लैक एक अच्छा तापीय चालक है। वह सड़क और टायर के बीच पैदा होने वाली खतरनाक गर्मी को अपने अंदर सोख लेता है और उसे पूरे टायर में फैला देता है, जिससे टायर की किसी एक जगह ज़्यादा गर्मी जमा नहीं होती और टायर पिघलता या फटता नहीं है।
  • यूवी किरणों से बचाव: कार्बन ब्लैक सूरज की पराबैंगनी (UV) किरणों को अपने अंदर अवशोषित कर लेता है और उन्हें रबर तक पहुंचने से रोकता है। इस तरह टायर धूप में भी कमजोर नहीं पड़ता।
  • शारीरिक मजबूती: यह टायर को खींचने और मोड़ने की क्षमता (Tensile Strength) को बहुत बढ़ा देता है, जिससे टायर पर बैठे वाहन का भार आसानी से संभाल लिया जाता है।

टायर बनाने की जटिल वैज्ञानिक प्रक्रिया

टायर बनाना सिर्फ रबर और काले रंग को मिलाने जितना आसान नहीं है। यह एक बहुत ही उन्नत और बड़े पैमाने की औद्योगिक प्रक्रिया है।

  1. मिश्रण (Mixing): सबसे पहले बड़े-बड़े मिक्सर्स (Banbury Mixers) में सफेद प्राकृतिक रबर डाला जाता है। उसके बाद उसमें लगभग 20 से 30 प्रतिशत कार्बन ब्लैक, सल्फर, विभिन्न प्रकार के खनिज तेल (जिससे रबर सख्त न होकर थोड़ा नरम रहे), सिलिका और अन्य केमिकल्स को मिलाया जाता है। इस दौरान जो मिश्रण बनता है, वह गहरे काले रंग का हो जाता है।
  2. आकार देना (Shaping): इस काले मिश्रण को रोलर्स के बीच से निकालकर अलग-अलग परतों में बदल लिया जाता है। इन परतों को टायर के स्टील के ढांचे पर लपेटा जाता है।
  3. वल्केनाइजेशन-जादुई कड़ाही: यह टायर बनाने का सबसे अहम चरण है। टायर को एक विशेष मोल्ड (Mold) के अंदर रखा जाता है और बहुत तेज़ गर्मी और दबाव दिया जाता है। इस गर्मी के कारण मौजूद सल्फर रबर के अणुओं के बीच छोटे-छोटे पुल बना देता है। इस प्रक्रिया को चार्ल्स गुडयर ने खोजा था। इससे चिपचिपा रबर एकदम मजबूत, लचीला और गर्मी सहन करने वाला बन जाता है।

दरअसल, 20वीं सदी की शुरुआत में जब कारें आईं, तो उस दौर के टायर पूरी तरह सफेद या हल्के भूरे रंग के हुआ करते थे, क्योंकि उसमें कार्बन ब्लैक नहीं मिलाया जाता था। लेकिन वे टायर बहुत जल्दी खराब हो जाते थे। जब कार्बन ब्लैक के फायदे सामने आए, तो उद्योग ने काला रंग अपना लिया।

आजकल आपने कुछ लक्ज़री कारों में ‘व्हाइटवॉल टायर’ (White-wall Tires) देखे होंगे, जिनके किनारे सफेद रंग की एक पट्टी होती है। लेकिन ध्यान दें कि वह सिर्फ सजावट के लिए सफेद रबर की एक पतली लेयर होती है, जबकि जो भाग सड़क को छूता है (Tread), वह 100 प्रतिशत काला ही होता है। कुछ शौकीय बाइक्स या गाड़ियों में लाल, हरे या नीले रंग के टायर देखने को मिलते हैं, लेकिन वे विशेष प्रकार के सिलिका और महंगे पिगमेंट्स से बनते हैं और उनकी उम्र बहुत कम होती है।

पर्यावरण और भविष्य: क्या हम कभी काले टायरों से मुक्त होंगे?

जैसा कि हमने बताया, कार्बन ब्लैक पेट्रोलियम और जीवाश्म ईंधन (फॉसिल फ्यूल) से बनता है, जो पर्यावरण के लिए अच्छा नहीं है। इसके अलावा, जब टायर सड़क पर घिसते हैं, तो बहुत सूक्ष्म काले कण वातावरण में मिल जाते हैं, जो जल और मिट्टी के प्रदूषण का कारण बनते हैं।

इस समस्या को देखते हुए विज्ञानी लगातार रिसर्च में जुटे हुए हैं। आज के समय में ‘ग्रीन टायर’ की तरफ़ रुझान बढ़ रहा है। इन टायरों में कार्बन ब्लैक की जगह ‘सिलिका’ (का इस्तेमाल किया जाता है। सिलिका से बने टायर थोड़े हल्के रंग के (गहरे भूरे या ग्रे) हो सकते हैं और ये ईंधन की बचत भी करते हैं। हालांकि, ये पूरी तरह से काले टायरों की टिकाऊपन अभी तक हासिल नहीं कर पाए हैं। साथ ही, ‘डंडेलियन’ जैसे पौधों से रबर निकालने की तकनीक भी विकसित की जा रही है ताकि रबर के पेड़ों पर निर्भरता कम हो सके।

Sandhya Samay News

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