
Kejriwal Interview (Rishi Tiwari) : राजनीति में कोई बयान खाली नहीं होता। हर बयान के पीछे एक संदर्भ होता है, एक गणित होता है और एक संबोधित श्रोता होता है। जब यह बयान किसी पार्टी के संस्थापक का हो, जो तीन बार मुख्यमंत्री रह चुका हो, और तब दिया जाए जब उसकी पार्टी अपना गढ़ हार चुकी हो, तो उसकी परतें और गहरी हो जाती हैं।
आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हाल में एक टीवी चैनल के कार्यक्रम में कहा कि उनका मकसद कभी पार्टी बनाना नहीं था — उनका मकसद देश है। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अगर लोकपाल आंदोलन के दौरान सरकार लोकपाल बिल पारित कर देती, तो शायद पार्टी बनाने की ज़रूरत ही न पड़ती।
यह कथन सुनने में भावुक भी है और विश्वासप्रद भी — खासकर उनके समर्थकों के लिए, जो इसे केजरीवाल की राजनीति का आधारभूत सूत्र मानते हैं। लेकिन संपादकीय की जिम्मेदारी भावना के साथ चलना नहीं, कथनों को तथ्यों, संदर्भों और सवालों की कसौटी पर तौलना है। यह इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि इसी बातचीत में केजरीवाल ने वोटर लिस्ट से छेड़छाड़ के ऐसे आरोप लगाए हैं, जो किसी भी हालत में हल्के में लेने योग्य नहीं हैं। आइए, पूरी बातचीत को शांत दिमाग से खंगालते हैं।
आंदोलन से पार्टी तक: कहानी कितनी पूरी है?
केजरीवाल की स्थापना-कथा सीधी है — 2011 का लोकपाल आंदोलन भ्रष्टाचार के खिलाफ था, सरकार वादों पर अड़ी रही, जन लोकपाल बिल नहीं बना और फिर आंदोलनकारियों को यह सोचना पड़ा कि देश बदलने की कोशिश संसद के भीतर से भी की जाए। तो सबूत नवंबर 2012 में आम आदमी पार्टी अस्तित्व में आई और दिसंबर 2013 में केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गए।
इस कथा में सच्चाई भी है और अधूरापन भी। सच्चाई यह कि उस संसद में जन लोकपाल बिल पारित नहीं हुआ और केजरीवाल वाकई एक स्थापित सरकारी करियर छोड़कर सामाजिक कार्यकर्ता बने थे। अधूरापन यह कि वह आंदोलन किसी एक व्यक्ति का नहीं था — अन्ना हजारे की नैतिक ऊँचाई, किरण बेदी, प्रशांत भूषण जैसे साथियों की मेहनत और लाखों आम नागरिकों की ऊर्जा ने उसे संभव बनाया। इतिहास यह भी गवाह है कि पार्टी बनाने के फैसले पर आंदोलन के भीतर ही गहरा मतभेद था और अन्ना हजारे स्वयं इसके पक्ष में नहीं थे। यानी ‘पार्टी बनानी ही पड़ी’ वाली बाध्यता इतनी स्वाभाविक नहीं थी, जितनी आज प्रस्तुत की जा रही है।

यहाँ एक और बात रखनी होगी: लोकतंत्र में राजनीतिक दल बनाना कोई अपराध नहीं, बल्कि वैध अधिकार है। आंदोलन से पार्टी तक का सफर दुनिया के कई देशों में रहा है। दल बनाने पर आपत्ति नहीं है; आपत्ति उस सरलीकरण से है, जो सामूहिक आंदोलन को एक व्यक्ति की विवशता की कहानी बना देता है।
झुग्गियों के दस साल, इम्तिहान की ज़रूरत
केजरीवाल ने उस दौर की याद ताज़ा की, जब उन्होंने इनकम टैक्स विभाग में जॉइंट कमिश्नर के रूप में सुदृढ़ करियर छोड़ा और दिल्ली की झुग्गियों में दस साल काम किया। उनकी शिकायत है कि दुनिया को सिर्फ ‘सीएम बनने’ की कहानी याद रहती है, झुग्गियों के वे दस साल नहीं।
इस आत्म-पहचान को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। एक सरकारी अधिकारी का सुख-सुविधा छोड़कर ज़मीन पर उतरना दुर्लभ है और इसका श्रेय उन्हें मिलना चाहिए। ‘परिवर्तन’ जैसे अभियानों के ज़रिए उन्होंने सूचना का अधिकार और जनसुनवाई को ज़मीनी तौर पर इस्तेमाल किया। पर यह भी सवाल है कि जिस व्यवस्था के भीतर उन्होंने दस साल बिताए, उससे मिली समझ को उन्होंने बाद की राजनीति में संस्थागत रूप से कहाँ तक ढाला। यह सवाल उनके ईमानदारी के दावे को खारिज नहीं करता — बस याद दिलाता है कि राजनीति में हर कहानी का एक चुना हुआ फ्रेम होता है, और वही चुना हुआ फ्रेम कथा बन जाता है।

‘दिल्ली मॉडल’ का दावा और उसका दूसरा चेहरा
बता दें कि इंटरव्यू का एक बड़ा हिस्सा शासन के दावों के इर्द-गिर्द घूमता है। केजरीवाल ने सरकारी ठेकों का उदाहरण दिया, पहले ठेके पसंदीदा ठेकेदारों के पास रहते थे, हर साल 10-15 प्रतिशत ‘एडहॉक’ वृद्धि के साथ नवीनीकृत होते थे और इसमें भारी भ्रष्टाचार होता था। उनकी सरकार ने ऑनलाइन नीलामी की व्यवस्था बनाई, जिससे राजस्व ‘डबल-ट्रिपल’ हो गया। उनका तर्क अवधारणात्मक तौर पर सही है — जब दरें और ठेकेदार अफसर तय करते थे, तो मनमानी की गुंजाइश थी; खुली बोली सबको बराबर मौका देती है और राजस्व भी बढ़ाती है।
खरीद-प्रक्रिया में पारदर्शिता वाकई सुधार का विषय है। इसी कड़ी में दिल्ली मॉडल के अन्य दावे भी रखे जाते हैं — सरकारी स्कूलों में बुनियादी बदलाव, मोहल्ला क्लिनिक, बिजली-पानी की सब्सिडी, महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा। ये मुद्दे उस राजनीति के हिस्से हैं, जिसने चुनावी बहस को ‘पहचान’ से ‘सेवा’ की ओर मोड़ने की कोशिश की। यह योगदान मान्य है।
लेकिन संपादकीय ईमानदारी यह भी माँगती है कि तस्वीर का दूसरा पहलू भी देखा जाए। शराब नीति समेत भ्रष्टाचार के विभिन्न मामलों में उनकी पार्टी के प्रमुख नेता लंबे समय तक जेल रहे, विवादित नीति लागू होने से पहले ही वापस ले ली गई और मामले अदालतों में हैं। केजरीवाल इन्हें ‘फर्ज़ी केस’ बताते हैं; विपक्ष इन्हें भ्रष्टाचार का प्रमाण। दोनों में से कौन-सा कथन सही है, यह अदालतें तय करेंगी। संपादकीय इतना ही कह सकता है कि ‘पारदर्शी ठेका’ जैसे सुधारों का श्रेय और ‘आरोपों के बादल’ की जवाबदेही — दोनों एक ही खाते में दर्ज हैं और जनता के सामने दोनों ही रखे जाने चाहिए।
जेल से सरकार: विरोध की नई भाषा या संवैधानिक सवाल?
इंटरव्यू का सबसे चर्चित हिस्सा वह है, जहाँ केजरीवाल बताते हैं कि जेल जाने के बाद उन्होंने इस्तीफा क्यों नहीं दिया। उनका तर्क है कि भाजपा-नेतृत्व यही चाहता था, क्योंकि जहाँ भाजपा राज्य नहीं जीत पाती, वहाँ मुख्यमंत्रियों पर केस बनते हैं, गिरफ्तारी होती है और सरकारें गिराई जाती हैं।
उन्होंने केरल, तमिलनाडु, झारखंड और पश्चिम बंगाल की सरकारों के अनुभवों का हवाला दिया, जहाँ केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाइयों को लेकर विपक्षी सरकारों पर ‘दबाव’ के आरोप लगते रहे हैं। केजरीवाल के मुताबिक वे इस ‘फॉर्मूले’ को तोड़ना चाहते थे — गिरफ्तारी कर लो, पर इस्तीफा नहीं मिलेगा। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में हुई एक टिप्पणी का भी जिक्र किया कि सरकार जेल से क्यों नहीं चल सकती।
यहाँ दो परतें हैं और दोनों को अलग-अलग तौलना होगा
पहली परत राजनीतिक है। क्या केंद्रीय जांच एजेंसियों का इस्तेमाल वाकई विपक्ष को तोड़ने के लिए हो रहा है? यह आरोप केजरीवाल के अकेले नहीं है। हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी के बाद यह सवाल गंभीरता से उठा था, और यह भी सच है कि कई बड़े मामलों में अंततः ज़मानत मिली, जबकि दोषसिद्धि की रफ्तार बेहद धीमी रही है। जब एजेंसियों की कार्रवाइयों में चुनावी कैलेंडर से मेल खाता पैटर्न दिखे, तो नागरिकों का भरोसा डगमगाना स्वाभाविक है। यह चिंता गंभीर है और उसका जवाब केंद्र को देना होगा — लेकिन ध्यान रहे, यह जवाब ‘हर केस फर्ज़ी है’ वाले सामान्यीकरण से नहीं, बल्कि एजेंसियों की स्वतंत्रता और अदालती प्रक्रिया की पारदर्शिता से देना होगा।
दूसरी परत संवैधानिक-नैतिक है। क्या जेल से मुख्यमंत्री पद पर बने रहना उचित है? इस पर दो राय हो सकती है और अदालती टिप्पणियाँ भी दोनों दिशाओं में आई हैं। फिर भी एक तथ्य नहीं बदलता कि सितंबर 2024 में ज़मानत मिलने पर केजरीवाल ने इस्तीफा दे दिया और कहा कि जनता का फैसला आने तक वे सीएम नहीं बनेंगे। उस वादे की परीक्षा फरवरी 2025 के चुनाव में हुई — और दिल्ली की जनता ने उनकी पार्टी को बड़ी हार दी। यानी ‘जेल से सरकार’ की रणनीति ने न तो सत्ता बचाई, न ही उस बलिदान-कथा को वोट में बदलने की जनता ने इजाज़त दी। लोकतंत्र में यही होना चाहिए: हर रणनीति का अंतिम परीक्षक वोटर है।
सबसे गंभीर सवाल
लेकिन इस पूरी बातचीत का सबसे भारी हिस्सा शासन या केसों का नहीं — चुनाव-प्रक्रिया का है। केजरीवाल का आरोप है कि वोटर लिस्ट में नाम जोड़ने-हटाने की परंपरागत व्यवस्था, जिसमें इलाके का एसडीएम अपने स्टाफ से सत्यापन कराता था, कमज़ोर कर दी गई है। कई क्षेत्रों में एसडीएम की शक्तियाँ हटाकर ‘सॉफ्टवेयर’ के ज़रिए निर्णय लिए जा रहे हैं और ‘दिल्ली में बैठे लोग’ किसी भी नाम को जोड़ या काट सकते हैं। गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से 97 नामों को जोड़ने के लिए बार-बार पत्र लिखे जाने का उदाहरण देते हुए उन्होंने पूछा — अगर यह शक्ति स्थानीय प्रशासन के पास है, तो इस तरह के पत्राचार की ज़रूरत ही क्यों? और अगर शक्ति नहीं है, तो यह व्यवस्था कब, किसने और किस अधिकार से बदली?
केजरीवाल का निष्कर्ष सीधा है: अगर वोटर लिस्ट इस तरह हेरफेर-योग्य बन गई है, तो ‘सरकारें बदल ही नहीं सकतीं’ — क्योंकि लोकतंत्र की बुनियाद वही सूची है, जिस पर मतदान होता है। उन्होंने बताया कि पंजाब में आप की एक बड़ी टीम इस पूरी प्रक्रिया पर नज़र रख रही है।
यह मुद्दा किसी एक दल का नहीं है। पिछले कुछ समय से विभिन्न राज्यों के संदर्भों में वोटर लिस्ट की समीक्षा और ‘वोट चोरी’ के दावों को लेकर जो बहस खड़ी हुई है, वह भारतीय लोकतंत्र के सबसे अहम सवालों में से एक है। दोनों ओर की जिम्मेदारी साफ है। विपक्ष को अपने आरोप टीवी स्टूडियो तक सीमित रखने की बजाय सबूत के साथ निर्वाचन आयोग और अदालतों के सामने औपचारिक रूप से रखने होंगे — सबूत के बिना आरोप राजनीति तय करते हैं, लोकतंत्र नहीं। और निर्वाचन आयोग को ‘आरोप तथ्यहीन हैं’ कहकर पर्दा गिराने की बजाय डेटा, रिकॉर्ड और ऑडिट की पारदर्शिता से संदेह ही खत्म करना होगा। लोकतंत्र में संदेह का इलाज संदेहभरी टिप्पणी नहीं, प्रमाण है।
यह भी जोड़ा जाना चाहिए कि 75 साल की व्यवस्था कभी आदर्श नहीं रही — तकनीकी सुधार अपने आप में शत्रु नहीं हैं। असली सवाल तकनीक का नहीं, नियंत्रण और निगरानी का है: निर्णय की शक्ति किसके पास है, कौन उसकी जवाबदेही देगा और क्या ज़मीनी सत्यापन की कड़ी बनी रहेगी। अगर स्थानीय सत्यापन वाकई हटा दिया गया है, तो वह ‘सुधार’ नहीं, वापस लेने योग्य बदलाव है।
दूसरा पक्ष भी ज़रूरी है
केजरीवाल के प्रदर्शन का पूरा मूल्यांकन तभी होगा, जब दूसरी ओर के सवाल भी पूछे जाएँ। पहला सवाल चुनावी है — दिल्ली की जनता ने हाल में ही उनकी पार्टी को अस्वीकार किया है और लोकतंत्र में जनादेश सबसे बड़ा मूल्यांकन है। दूसरा सवाल विश्वसनीयता का है — उनकी पार्टी के शीर्ष नेता भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे रहे हैं और हर आरोप को केवल ‘राजनीतिक साज़िश’ कहना भी एक असुविधाजनक पैटर्न बन सकता है। तीसरा सवाल आंतरिक लोकतंत्र का है — वर्षों के दौरान जिन साथियों को दल से निकाला गया, उनके अनुभवों ने ‘एक सुप्रीमो’ वाली संरचना पर सवाल उठाए हैं। किसी भी दल के आंतरिक लोकतंत्र की परीक्षा उसके आलोचकों के साथ व्यवहार से होती है, घोषणापत्रों से नहीं।
इन सवालों के बावजूद एक तथ्य अस्वीकार नहीं किया जा सकता: केजरीवाल ने भारतीय राजनीति की बातचीत की दिशा बदली है। स्कूल और स्वास्थ्य को चुनावी एजेंडा बनाया, आम नागरिक की भाषा में राजनीति की, और यह दिखाया कि पारिवारिक विरासत और पारंपरिक संगठन के बिना भी नई पार्टी सत्ता जीत सकती है। आलोचक इसे ‘अच्छी मार्केटिंग’ कहें या समर्थक ‘वास्तविक परिवर्तन’ — दोनों ही स्वीकार करेंगे कि उन्होंने राजनीतिक बाज़ार में एक अलग जगह बनाई।
क्या कहानी नहीं, भविष्य की तैयारी है
बता दें कि स्पष्ट है कि यह बातचीत सिर्फ अतीत की व्याख्या नहीं है; यह आगामी राजनीतिक दौर की तैयारी भी है। दिल्ली हारने के बाद आप पार्टी के पास पंजाब ही बड़ा गढ़ है और केजरीवाल राष्ट्रीय राजनीति में अपनी प्रासंगिकता दोबारा स्थापित करने में जुटे हैं। ‘मकसद पार्टी नहीं, देश’ — यह वाक्य उसी दोबारा-स्थापना का हिस्सा है। राजनीति में यह पूरी तरह वैध है; हर नेता अपनी कथा गढ़ता है। पर नागरिक की जिम्मेदारी कथा पर भरोसा करना नहीं, कथा और कर्म का मिलान करना है।





















