भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत कभी अपनी संख्या नहीं रही — न मतदाताओं की उंगलियों पर लगी स्याही में, न लाखों वोटिंग मशीनों में। ताकत रही है एक संस्था की साख में, जिस पर हर पीढ़ी ने यह मानकर मतदान किया कि उसका वोट सुरक्षित है, उसकी आवाज़ गूंजेगी और जीत-हार का फैसला निष्पक्ष रूप से होगा।
निर्वाचन आयोग वह संस्था है जो सत्ता का बंटवारा करती है और इसीलिए उसकी निष्पक्षता किसी एक पार्टी की जीत-हार से कहीं ज्यादा बड़ा मामला है। स्वतंत्रता के बाद से सत्ता कई हाथों बदली, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री आए-गए, लेकिन इस संस्था पर जनता का भरोसा कायम रहा। वही भरोसा आज इतिहास के कठिनतम मोड़ पर खड़ा है।

एक दावा, जो महज़ खबर नहीं है
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध सवाल पहले भी उठते रहे हैं। पर पिछले दिनों सामने आया वह दावा है जो आम राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से बिल्कुल अलग प्रकृति का है। केरल के पूर्व मुख्य सचिव जी.जी. थॉमस ने खुलकर कहा है कि ज्ञानेश कुमार ने उनसे संपर्क कर केरल से लोकसभा चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा और साथ ही केंद्र में मंत्री बनने का आश्वासन भी दिया।
यह आरोप मीडिया रिपोर्ट्स — द इंडियन एक्सप्रेस सहित — का हिस्सा बन चुका है और अब यह लोकतंत्र के भीतर चल रही उस बड़ी बहस का केंद्र बन गया है, जिसमें सवाल यह है कि क्या देश की चुनावी प्रणाली सचमुच स्वतंत्र है।
इस दावे की गंभीरता समझने के लिए यह देखना जरूरी है कि बात किसकी हो रही है। बात किसी साधारण अधिकारी की नहीं, देश के सर्वोच्च चुनावी संरक्षक की हो रही है — उस व्यक्ति की, जिसके पास यह तय करने का अधिकार है कि चुनाव की प्रक्रिया कौन चलाएगा, कौन जवाब देगा और किस पर दबाव बनेगा।

यदि थॉमस का बयान सत्य निकला, तो यह किसी अधिकारी का पक्षपात भर नहीं होगा — संवैधानिक पद के दुरुपयोग, राजनीतिक प्रलोभन और प्रशासनिक तंत्र पर दबाव का साक्ष्य होगा। और यदि यह बयान असत्य है, तो भी सवाल उतना ही गंभीर बना रहता है: तब थॉमस से सार्वजनिक सफाई मांगी जानी चाहिए और जहां तक कानून जाता है, कार्रवाई भी।
दोनों ही स्थितियों में चुप्पी कोई जवाब नहीं है। अफसोस कि अब तक जनता के सामने इस दावे का वह खुला, सबूतों के साथ प्रस्तुत स्पष्टीकरण नहीं आया है, जो इस पद की गरिमा के अनुरूप हो।
संदेह की खाद
आरोपों से भी भारी वह मौन है, जो इन आरोपों के सामने सत्ता के शीर्ष स्तर से सुनाई दे रहा है। वे नेता जो हर सूक्ष्म मुद्दे पर नियम-कानून का पाठ पढ़ाते हैं, विपक्ष पर तंज कसते हैं और देश को प्रवचन देने से नहीं थकते, उनकी ओर से इस मुद्दे पर गहराई से उतरती कोई टिप्पणी सामने नहीं आई है।

सोशल मीडिया पर एक कार्यक्रम का वीडियो व्यापक रूप से वायरल हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री डफली बजाते दिखे — पर इन शीर्ष पदों से चुनावी तंत्र पर उठे सवालों के बारे में एक शब्द तक नहीं निकला। गृह मंत्री की ओर से भी इस विषय पर कोई अर्थपूर्ण सार्वजनिक बयान नहीं मिला।
लोकतंत्र में मौन भी एक कथन होता है। और यह मौन उस मानसिकता का कथन है, जिसमें सत्ता मानती है कि उसे किसी से जवाब देने की जरूरत ही नहीं। याद रखिए, जब विपक्ष द्वारा “वोट चोरी” के आरोप लगाए गए थे, तो सत्ता-पक्ष की ओर से घंटों की प्रेस कॉन्फ्रेंस, सैकड़ों बयान और टीवी बहसें हुई थीं।
वही ऊर्जा अब कहां गई? जब चुनावी संरक्षक पर ऐसे आरोप लगें जिनमें सत्ता का प्रत्यक्ष नाम जुड़ा हो, तो सत्ता-शिखर की चुप्पी स्वाभाविक रूप से संदेह को और पोषित करती है। यह संदेह किसी एक व्यक्ति के विरुद्ध नहीं, पूरी संस्थागत व्यवस्था के विरुद्ध जाता है।
नियुक्ति से शुरू होती कहानी
यह संदेह रातोंरात पनपा नहीं है। 2023 में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए जो कानून बना, उसमें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति से हटाकर एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया। विपक्ष ने इसका विरोध किया, असहमति दर्ज कराई गई, और इस कानून को न्यायालय में चुनौती दी गई — जो अब तक लंबित है।
चयन-बैठकों के रिकॉर्ड या विचार-विमर्श का कोई विवरण सार्वजनिक नहीं किया गया। जब सर्वोच्च चुनावी पद पर नियुक्ति ही ऐसी प्रक्रिया से हो, जिसमें सरकार का वर्चस्व दिखता हो, तो जनता से स्वतंत्रता के प्रमाण मांगना अतिशयोक्ति नहीं, उसका वैधानिक अधिकार है।
इतिहास यह भी गवाह है कि इसी संस्था ने कभी अलग तस्वीर पेश की थी। टी.एन. शेषन के दौर में आयोग सत्ता के सामने खड़ा होने का प्रतीक बना, चुनावी कार्ड के अभिलेख सार्वजनिक हुए और तंत्र खिड़कियों से बाहर आया।
वही संस्था आज अपने ही पूर्व स्वरूप से तुलना के कांटे पर खड़ी है। तुलना से बचने का रास्ता इतिहास को भुला देना नहीं, वर्तमान को पारदर्शी बना देना है।
‘वोट चोरी’ की बहस और मतदाता सूचियों का विवाद
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में वह बहस है, जो विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा लगाए गए “वोट चोरी” के आरोपों से शुरू हुई थी। उन्होंने महाराष्ट्र में चुनावों के बीच मतदाता संख्या में असामान्य वृद्धि के दावे किए और बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान लाखों मतदाताओं के नाम हटने को लेकर गंभीर सवाल उठाए।
विपक्ष का कहना है कि पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और बिहार के चुनावों में मतदाता सूचियों के साथ हेरफेर के जरिए लाखों लोगों को उनके मौलिक अधिकार से वंचित किया गया — और यह सब किसी “अगली जीत” की नींव तैयार करने के लिए किया जा रहा है।
निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को खारिज किया और विपक्ष से शपथपत्र के साथ साक्ष्य प्रस्तुत करने को कहा। विपक्ष की प्रतिवादी दलील सीधी है: जवाबदेही का बोझ मतदाता पर नहीं, आयोग पर होना चाहिए। मतदाता सूचियों का मशीन-रीडेबल डेटा सार्वजनिक कर दिया जाए, तो पूरा देश खुद हिसाब मिला लेगा — शपथपत्र की नौटंकी की जरूरत नहीं रहेगी।
इसी तनावपूर्ण परिवेश में जब केरल के पूर्व मुख्य सचिव जैसा व्यक्ति — जो कभी स्वयं प्रशासन की चोटी की पंक्ति में रहा हो — चुनाव आयुक्त के विरुद्ध इतना सीधा दावा कर दे, तो विपक्ष के लिए “सिस्टम कैप्चर” की कथा को नया अध्याय मिल जाता है। और इस कथा का खंडन तर्कों से होगा, न कि चुप्पी से।
‘कांग्रेस ने भी तो किया’ — बचाव की टूटी दलील
सत्ता-पक्ष की प्रतिक्रिया पर गौर कीजिए। आरोपों के जवाब में बहस विषय से हटाकर इतिहास की ओर मोड़ दी गई। पार्टी प्रवक्ताओं और भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने दौड़-दौड़कर यह बताना शुरू किया कि कांग्रेस शासनकाल में भी चुनाव आयुक्तों पर सवाल उठे थे। इस दलील में दो घातक कमियां हैं।
पहली, अतीत की कथित गलती वर्तमान आरोप का जवाब नहीं हो सकती। अगर कोई कहे कि “हमसे पहले भी ऐसा होता था”, तो वह वाक्य अपने आप में आज के आरोप को अस्वीकार नहीं करता — बल्कि स्वीकारोक्ति की तरह सुनाई देता है।
दूसरी, अगर जी.जी. थॉमस झूठ बोल रहे हैं, जैसा सत्ता-पक्ष का आशय है, तो उनके विरुद्ध मानहानि की कार्रवाई क्यों नहीं होती? एक पूर्व मुख्य सचिव की गरिमा को झूठा कहना आसान है, पर न्यायालय में उसे साबित करना पड़ता है। जब तक सबूतों की भाषा नहीं बोली जाएगी, तर्क की डफली भीड़ तो बटोर सकती है, भरोसा नहीं। और लोकतंत्र डफली पर नहीं, भरोसे पर चलता है।
सड़क से उठते सवाल
इस बीच राजपथ से जो स्वर उठ रहे हैं, वे भी नजरअंदाज करने लायक नहीं हैं। मीडिया रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया पर आई तस्वीरों के अनुसार जंतर-मंतर पर लगातार लोग एकत्र हो रहे हैं और वहां से “दूसरी स्वतंत्रता की लड़ाई” जैसी भाषा सुनाई दे रही है। दिल्ली में कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेने की खबरें आईं और गृह मंत्री के आवास वाले इलाके में सुरक्षा-इंतजाम असामान्य रूप से कठोर दिखे।
मुंबई की मेट्रो और लोकल ट्रेनों से जुड़े कुछ वीडियो भी वायरल हुए, जिनमें सत्ता-विरोधी नारे दर्ज हैं। इन सबकी पुष्टि का दायित्व मीडिया का है, पर इतना स्पष्ट है कि सवाल अब न्यायालयों और स्टूडियोज़ तक सीमित नहीं है — वह सड़क पर उतर चुका है।
राजनीति का रंग भी बदला है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने वामपंथी दलों को साथ आने का निमंत्रण दिया और राहुल गांधी से इंडिया गठबंधन की बैठक बुलाने की अपील करने की खबरें आईं। विपक्ष के भीतर की कटौतियों की दीवारों में दरार पड़ना इस संकट की गंभीरता का ही संकेत है।
इतिहास गवाह है कि जब संस्थाएं जवाब देना बंद कर देती हैं, तो सवाल सड़क पर उतर आते हैं — और सड़क पर उतरे सवालों का जवाब लाठी से नहीं, स्पष्टीकरण से दिया जाता है। सत्ता के लिए असली चिंता की बात यह है कि आक्रोश किसी एक पार्टी का नहीं, सामान्य नागरिकों का दिख रहा है।
पड़ोस के अनुभव
हमें पड़ोस के ताजा अनुभवों से भी आंखें मिलानी होंगी। बांग्लादेश में 2024 में और नेपाल में हाल ही में — दोनों जगहों पर जब युवा पीढ़ी को यह अनुभव हुआ कि संस्थाएं उनके सवालों का जवाब देने के लिए बनी ही नहीं हैं, तो आक्रोश सड़कों पर उतरा और दशकों पुरानी सत्ताएं दिनों में ढह गईं।
यह भविष्यवाणी नहीं, चेतावनी है। भारत की लोकतांत्रिक जड़ें दोनों देशों से कहीं गहरी हैं — और यही कारण है कि यहां संकेतों की अनदेखी का खतरा उतना ही बड़ा है। जो सत्ता असंतोष के ढेर पर बैठती है, उसे चिंगारी से नहीं, अपनी उदासीनता से डरना चाहिए — क्योंकि चिंगारी बाहर से आती है, उदासीनता भीतर से।
आस्था ही असली आयोग है
चुनाव आयोग कोई इमारत नहीं, भरोसा है। उस भरोसे की अपनी गणना होती है — हर बूथ पर, हर कतार में, हर बूढ़े मतदाता के धीमे कदमों में। यदि मुख्य चुनाव आयुक्त इन आरोपों से निर्दोष हैं, तो उन्हें सबूतों के साथ साबित करना चाहिए; यदि नहीं, तो संवैधानिक गरिमा का रास्ता इस्तीफा है। जनता के बीच इससे कोई तीसरा रास्ता नहीं है।
“दूसरी स्वतंत्रता की लड़ाई” जैसी भाषा सड़कों से उठ रही है। इसे अतिशयोक्ति कहें या राजनीति — दोनों ही सूरतों में इसका संदेश सत्ता के लिए एक है: लोकतंत्र को हर पीढ़ी ने दोबारा जीता है, विरासत में नहीं मिलता। संस्थाएं जवाब देकर ही बचती हैं, मौन से नहीं। और यह लड़ाई केवल भारत की नहीं — जिस दिन दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र अपनी चुनावी व्यवस्था को फिर से पारदर्शी साबित कर देगा, उस दिन विश्व-लोकतंत्र भी एक लड़ाई जीत लेगा। यही असली परीक्षा है, और यही इस संपादकीय का निचोड़।





















