मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर राजनीतिक बयानबाजी अब तीखे आरोपों और असाधारण मांगों तक पहुंच गई है। पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव ने उनके लिए फांसी की मांग की और उन्हें बिजली के खंभे से लटकाने जैसी बात कही। दूसरी ओर, भाजपा नेता समिक भट्टाचार्य ने पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से कथित बांग्लादेशी घुसपैठियों के नाम हटाने की पहल का श्रेय ज्ञानेश कुमार को देते हुए उन्हें पद्म पुरस्कार देने की मांग की। इसी बीच, युवा मतदाताओं को वोटर लिस्ट में जोड़ने से जुड़े आरोपों ने चुनाव आयोग की भूमिका पर एक नया विवाद खड़ा कर दिया है।
इन घटनाओं को अलग-अलग राजनीतिक बयान मानकर नजरअंदाज करना आसान है, लेकिन इनके पीछे एक गंभीर सवाल मौजूद है: क्या चुनाव आयोग पर उठ रहे आरोपों की निष्पक्ष जांच हो रही है? और क्या राजनीतिक दल किसी संवैधानिक संस्था की आलोचना करते समय अपनी भाषा और तथ्यों के प्रति जिम्मेदार हैं? लोकतंत्र में दोनों प्रश्न महत्वपूर्ण हैं। चुनाव आयोग की जवाबदेही पर चर्चा भी होनी चाहिए और उसके प्रमुख के खिलाफ हिंसा को उकसाने वाली भाषा की निंदा भी।

आलोचना का अधिकार, हिंसा की धमकी नहीं
चुनाव आयोग और उसके प्रमुख की आलोचना करना किसी भी लोकतंत्र में नागरिकों और राजनीतिक दलों का अधिकार है। आयोग के फैसले, मतदाता सूची की प्रक्रिया और चुनावी निष्पक्षता सार्वजनिक जांच के विषय हैं। यदि किसी पार्टी को लगता है कि मतदाताओं के नाम हटाए गए, नए मतदाताओं को जोड़ा नहीं गया या किसी प्रक्रिया में पक्षपात हुआ, तो वह दस्तावेजों और प्रमाणों के साथ सवाल उठा सकती है। ऐसे मामलों में आयोग से स्पष्टीकरण मांगना और अदालत या संबंधित वैधानिक मंच का रुख करना उचित रास्ता है।
लेकिन किसी अधिकारी को फांसी देने या बिजली के खंभे से लटकाने की मांग आलोचना नहीं है। यह राजनीतिक असहमति को हिंसक भाषा में बदलने का प्रयास है। किसी सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के काम की कठोर आलोचना की जा सकती है, पर उसकी शारीरिक सजा की मांग करना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है। ऐसी भाषा समर्थकों को उकसा सकती है और सार्वजनिक जीवन में धमकी को सामान्य बना सकती है।
पप्पू यादव के बयान का राजनीतिक आशय चाहे जो हो, उसकी भाषा अस्वीकार्य है। यदि किसी को लगता है कि चुनावी प्रक्रिया में गरीबों, दलितों या वंचित समुदायों के अधिकार प्रभावित हुए हैं, तो उन आरोपों की जांच होनी चाहिए। लेकिन न्याय की मांग को हिंसा की मांग में बदल देने से पीड़ित समूहों को न्याय नहीं मिलता। इससे मुद्दे की गंभीरता भी बयानबाजी के शोर में दब जाती है।
राजनीतिक नेताओं को यह समझना चाहिए कि उनकी बातों का असर केवल उनके विरोधियों तक सीमित नहीं रहता। समर्थक उन्हें संकेत की तरह ले सकते हैं कि संस्थाओं या अधिकारियों के प्रति धमकी देना जायज है। लोकतंत्र में सत्ता और संस्थाओं की आलोचना जरूरी है, पर आलोचना का उद्देश्य जवाबदेही स्थापित करना होना चाहिए, भय पैदा करना नहीं।
तारीफ भी सवालों से परे नहीं
दूसरी ओर, ज्ञानेश कुमार को पद्म पुरस्कार देने की मांग भी राजनीतिक बहस का हिस्सा है। किसी अधिकारी के काम की सराहना करना गलत नहीं, लेकिन चुनाव आयोग की निष्पक्षता का मूल्यांकन किसी एक दल की प्रशंसा या आलोचना से नहीं किया जा सकता। यदि पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से कथित घुसपैठियों के नाम हटाने की कार्रवाई हुई है, तो उसका आधार, प्रक्रिया और आंकड़े सार्वजनिक होने चाहिए। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि नाम हटाने से पहले संबंधित मतदाताओं को सूचना और सुनवाई का अवसर मिला या नहीं।
मतदाता सूची की शुद्धता चुनाव की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है। फर्जी या अपात्र नामों को हटाना प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा हो सकता है। लेकिन इस काम में किसी भी वास्तविक नागरिक का नाम गलती से हटना भी उतना ही गंभीर है। खासकर सीमावर्ती इलाकों में पहचान, निवास और नागरिकता से जुड़े सवाल संवेदनशील होते हैं। इसलिए कार्रवाई का आधार स्पष्ट, समान और अपील योग्य होना चाहिए।

किसी अधिकारी को पुरस्कार देने की मांग से पहले यह जरूरी है कि उसके काम का आकलन पारदर्शी मानकों पर हो। चुनाव आयोग की विश्वसनीयता इस बात से नहीं बनती कि एक दल उसके प्रमुख की प्रशंसा कर रहा है; वह निष्पक्ष प्रक्रिया, सार्वजनिक जानकारी और सभी दलों के प्रति समान व्यवहार से बनती है। इसी तरह, किसी दल का आरोप अपने आप में प्रमाण नहीं होता। प्रशंसा और आरोप—दोनों को जांच और तथ्य की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
युवा मतदाताओं का सवाल
नया विवाद युवा मतदाताओं को वोटर लिस्ट में जोड़ने की प्रक्रिया से जुड़ा है। कांग्रेस ने एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए आरोप लगाया है कि बीते कुछ वर्षों में युवा मतदाताओं के नाम जोड़ने पर रोक जैसी स्थिति रही है। यह दावा गंभीर है, लेकिन उपलब्ध जानकारी के आधार पर इसे अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि रिपोर्ट ने किस अवधि, किन राज्यों और किस तरह के आंकड़ों का विश्लेषण किया है। क्या नाम जोड़ने की प्रक्रिया वास्तव में रोकी गई, या आवेदन, पात्रता, समयसीमा और प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़ी कोई दूसरी वजह थी? इन सवालों के जवाब जरूरी हैं।
युवा मतदाताओं का पंजीकरण लोकतंत्र की बुनियादी जिम्मेदारी है। पहली बार वोट देने जा रहे नागरिकों के लिए प्रक्रिया सरल और समयबद्ध होनी चाहिए। यदि पात्र युवा आवेदन करने के बावजूद सूची में शामिल नहीं हो पा रहे हैं, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, उनके राजनीतिक अधिकार पर असर डालने वाली समस्या है। लेकिन किसी रिपोर्ट के आधार पर पूरे चुनाव आयोग या किसी राजनीतिक दल पर आरोप लगाने से पहले आंकड़ों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
चुनाव आयोग को इस विवाद पर साफ जानकारी देनी चाहिए—कितने युवाओं ने पंजीकरण के लिए आवेदन किया, कितने आवेदन स्वीकार हुए, कितने लंबित या अस्वीकृत रहे और अस्वीकृति के कारण क्या थे। यह जानकारी राज्य और जिले के स्तर पर उपलब्ध हो तो नागरिकों, पत्रकारों और राजनीतिक दलों के लिए दावों की जांच करना आसान होगा। यदि कहीं प्रक्रिया में कमी मिली है, तो आयोग को सुधार की समयसीमा और जिम्मेदारी भी बतानी चाहिए।
मतदाता सूची: तकनीकी दस्तावेज नहीं, लोकतांत्रिक अधिकार
मतदाता सूची को अक्सर प्रशासनिक रिकॉर्ड समझ लिया जाता है, जबकि यह नागरिक और लोकतंत्र के बीच सबसे सीधा संबंध है। सूची में नाम न होने का अर्थ है कि नागरिक मतदान के अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकता। गलत तरीके से नाम हटना, आवेदन का लंबित रहना या जानकारी में त्रुटि होना किसी व्यक्ति के लिए वास्तविक नुकसान है। इसलिए मतदाता सूची की शुद्धता और समावेशिता—दोनों को साथ लेकर चलना होगा।
एक ओर सूची में दोहराए गए या अपात्र नामों की पहचान जरूरी है; दूसरी ओर पात्र नागरिकों का नाम जोड़ना भी उतना ही जरूरी है। यदि केवल नाम हटाने की सफलता को प्रशासनिक उपलब्धि बताया जाए और नए मतदाताओं के पंजीकरण पर पर्याप्त ध्यान न दिया जाए, तो सूची अधूरी रह सकती है। इसी तरह, अधिक नाम जोड़ने के लक्ष्य में सत्यापन कमजोर हो तो सूची की विश्वसनीयता प्रभावित होगी। सही रास्ता संतुलित और पारदर्शी प्रक्रिया है।
इस प्रक्रिया में राजनीतिक दलों की भी भूमिका है। उन्हें अपने आरोपों को नाम, क्षेत्र, आवेदन संख्या और उपलब्ध दस्तावेजों के साथ आयोग तक पहुंचाना चाहिए। केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस में बड़े दावे करने से प्रभावित मतदाताओं की समस्या हल नहीं होगी। नागरिकों को भी आवेदन की स्थिति जांचने, सुधार मांगने और तय समय में अपील करने के आसान साधन उपलब्ध होने चाहिए।
संस्थागत भरोसा कैसे कायम हो?
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता लोकतंत्र के लिए अनिवार्य है, लेकिन स्वतंत्रता का अर्थ जवाबदेही से छूट नहीं है। आयोग को अपने फैसलों के कारण बताने चाहिए और शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई करनी चाहिए। जब प्रक्रिया अस्पष्ट रहती है, तो राजनीतिक संदेह बढ़ता है। दूसरी ओर, बिना प्रमाण के आयोग पर पक्षपात का आरोप लगाने से संस्था के प्रति भरोसा कमजोर होता है। दोनों स्थितियों का नुकसान अंततः मतदाता को होता है।
आयोग को ऐसे विवादों में केवल संक्षिप्त खंडन या औपचारिक बयान तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे संबंधित आंकड़े, नियम और कार्रवाई की प्रक्रिया सार्वजनिक करनी चाहिए। यदि किसी राज्य में नाम हटाने या जोड़ने को लेकर शिकायतें अधिक हैं, तो स्वतंत्र समीक्षा या विशेष ऑडिट पर विचार किया जा सकता है। शिकायतकर्ताओं को यह भी बताया जाना चाहिए कि उनकी आपत्ति पर क्या कदम उठाया गया।
राजनीतिक दलों के लिए भी एक न्यूनतम जिम्मेदारी होनी चाहिए: आरोप तथ्य आधारित हों, व्यक्तिगत धमकियों से बचा जाए और कानूनी रास्तों का उपयोग किया जाए। लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा में तीखी भाषा कभी-कभी राजनीतिक लाभ देती दिख सकती है, लेकिन लंबे समय में यह संस्थाओं और सार्वजनिक संवाद दोनों को नुकसान पहुंचाती है।
जवाबदेही और मर्यादा साथ-साथ
इस पूरे विवाद में दो बातें एक साथ सच हो सकती हैं। पहली, चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर उठे सवालों की गंभीर और निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दूसरी, किसी अधिकारी को फांसी देने जैसी मांग लोकतांत्रिक मर्यादा के खिलाफ है और उसे सामान्य राजनीतिक बयान नहीं माना जा सकता। एक बात को स्वीकार करने के लिए दूसरी को खारिज करना जरूरी नहीं।
यदि युवा मतदाताओं के पंजीकरण में बाधाएं आई हैं, तो आयोग को उनका जवाब देना चाहिए। यदि मतदाता सूची से नाम हटाने की कार्रवाई हुई है, तो उसका कानूनी आधार और प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए। यदि किसी नागरिक का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो उसे बहाल करने का प्रभावी रास्ता उपलब्ध होना चाहिए। और यदि राजनीतिक नेताओं ने हिंसक भाषा का इस्तेमाल किया है, तो उन्हें अपने शब्दों की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
लोकतंत्र केवल मतदान के दिन तक सीमित नहीं होता। वह उन संस्थाओं पर भरोसे से भी चलता है जो मतदाता सूची तैयार करती हैं, चुनाव कराती हैं और विवादों का समाधान करती हैं। इस भरोसे की रक्षा के लिए आयोग को पारदर्शी होना होगा और राजनीतिक नेतृत्व को संयमित। आरोपों का जवाब आंकड़ों से, शिकायतों का समाधान नियमों से और असहमति का इजहार लोकतांत्रिक भाषा में होना चाहिए।
चुनाव आयोग किसी राजनीतिक दल की सुविधा के लिए नहीं, नागरिकों के मताधिकार की रक्षा के लिए है। इसलिए उससे सवाल पूछना जरूरी है—लेकिन हिंसा की धमकी देकर नहीं। इसी तरह, आयोग के काम की प्रशंसा की जा सकती है—लेकिन उसे आलोचना से ऊपर रखकर नहीं। लोकतंत्र की असली कसौटी यही है कि सत्ता, विपक्ष और संस्थाएं—तीनों जवाबदेही स्वीकार करें और नागरिक का वोट हर राजनीतिक विवाद से बड़ा बना रहे।
























