Bihar News: बिहार में शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और बच्चों को बेहतर शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्यों के साथ अक्सर सरकार द्वारा नई योजनाओं और नीतियों का ऐलान किया जाता रहा है। इसमें स्मार्ट क्लास, नई इमारतें, आधुनिक सुविधाएं और डिजिटल माध्यम से शिक्षण जैसी बातें प्रमुख हैं। लेकिन हकीकत की जमीन पर पहुंचकर पता चलता है कि इन दावों और योजनाओं के बीच अभी भी बहुत बड़ा फासला है। आजतक की टीम ने बिहार के कई जिलों का दौरा कर उन स्कूलों की तस्वीरें ली हैं, जहां बच्चों के सामने पढ़ाई का सपना अभी अधूरा है।
झोपड़ी, पेड़ और टिन शेड में पढ़ाई का सिलसिला
बिहार के कई जिलों में सरकारी स्कूल आज भी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। सहरसा, पश्चिम चंपारण, बेगूसराय, मुजफ्फरपुर और कैमूर जैसे जिलों में पहुंचने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि हालात कितने दयनीय हैं। कई स्कूल अभी भी अपनी इमारत का इंतजार कर रहे हैं। कहीं बच्चे झोपड़ी के नीचे, तो कहीं पेड़ की छाया में, तो कहीं टिन शेड के नीचे पढ़ रहे हैं। इन तस्वीरों ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया है कि क्या शिक्षा का यह स्तर सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।
सहरसा जिले के प्राथमिक विद्यालयों में स्थिति बदतर
सहरसा जिले के प्राथमिक विद्यालयों का दौरा करने पर पता चला कि वहां के बच्चे अब भी झोपड़ी, पेड़ या टिन शेड के नीचे पढ़ने को मजबूर हैं। इन स्कूलों में न तो पर्याप्त कमरें हैं, न शौचालय और न ही पीने का पानी। कई स्कूलों में तो टीचरों की संख्या भी बच्चों की संख्या से कम है। उदाहरण के तौर पर सोनबरसा प्रखंड के मैना पट्टी गांव का प्राथमिक विद्यालय पूरी तरह झोपड़ी में चलता है। यहां 55 बच्चों का नामांकन है, लेकिन सिर्फ नौ बेंच हैं। शौचालय और पीने के पानी की कोई व्यवस्था नहीं है। बरसात के दिनों में झोपड़ी की छत टपकने लगती है, जिससे पढ़ाई बाधित होती है। स्थानीय शिक्षक बताते हैं कि कई बार जिला प्रशासन को भवन बनाने के लिए आवेदन किया गया, लेकिन अभी तक कोई सुधार नहीं हुआ है।
यही तस्वीर झिटकिया गांव के प्राथमिक विद्यालय की भी है, जहां 91 बच्चे नामांकित हैं, लेकिन स्कूल का भवन नहीं है। बच्चे पेड़ के नीचे बैठते हैं और कक्षा चलती है। यहां भी शिक्षक भवन बनाने के लिए कई बार आवेदन कर चुके हैं, लेकिन कोई हल नहीं निकला है। इन स्कूलों का हाल यह है कि पीने के पानी का स्रोत भी दूषित है और शौचालय की अनुपस्थिति में स्वच्छता का संकट बना हुआ है।
पश्चिम चंपारण और बेगूसराय में भी यही हालात
पश्चिम चंपारण के बगहा में पहली कक्षा के बच्चे पेड़ के नीचे पढ़ते हैं। यहां का स्कूल भवन जर्जर हो चुका है और नए निर्माण का कोई संकेत नहीं है। बेगूसराय में भी एक ही कमरे में 200 से अधिक बच्चे पढ़ रहे हैं, जिनके लिए टिन शेड ही एकमात्र सहारा है। इन स्कूलों में भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। शिक्षकों का कहना है कि भवन, शौचालय, पीने का पानी जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराना सरकार का दायित्व है, लेकिन अभी तक यह पूरा नहीं हुआ है।
मुजफ्फरपुर के स्कूल भी कम नहीं
मजफ्फरपुर जिले के कुछ स्कूलों का दौरा करने पर पता चला कि वहां भी स्थिति बेहतर नहीं है। जर्जर भवन, कमरों की कमी और एक ही कक्षा में कई शिक्षकों का पढ़ाना आम है। मुजफ्फरपुर के दो कमरों और टिन शेड में 200 से अधिक बच्चे पढ़ रहे हैं। इन स्कूलों में बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, लेकिन सुविधाओं का अभाव बना हुआ है।
कैमूर जिले में स्थिति और भी चिंताजनक
कैमूर जिले के स्कूलों में भवन की स्थिति जर्जर है। कई स्कूलों में कमरों की संख्या कम होने के कारण कक्षाएं एक साथ लगानी पड़ती हैं। टिन शेड में पढ़ रहे बच्चों का हाल भी बदतर है। गर्मी में टिन शेड इतनी तपती है कि पढ़ाई प्रभावित होती है, और बरसात के दिनों में पढ़ाई रुक जाती है। इन स्कूलों में भी शौचालय और पीने के पानी का अभाव है।
शिक्षा का आधार ही खतरे में
इन तस्वीरों से स्पष्ट है कि बिहार के सरकारी स्कूलों में अभी भी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। भवन नहीं है या जर्जर हो चुके हैं, शौचालय और पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। कई स्कूलों में एक ही कमरे में कई कक्षाएं संचालित हो रही हैं। बच्चों को जमीन पर बैठकर पढ़ाई करनी पड़ रही है। शिक्षकों की कमी और संसाधनों का अभाव भी बड़ा मुद्दा है। इन सबके बीच सरकार का ध्यान इन स्कूलों की हालत सुधारने की दिशा में अभी तक पूरी तरह केंद्रित नहीं हुआ है।
सरकार की कोशिशें और चुनौतियां
बिहार सरकार ने हाल में ही जिला शिक्षा पदाधिकारी को पत्र लिखकर स्कूलों की भवनहीनता की लिस्ट मांगी है, जिसका उद्देश्य स्कूल भवनों का निर्माण है। हालांकि, इन योजनाओं को मूर्त रूप देने में समय लग रहा है। कई जिलों में जमीन की कमी, आवंटन में देरी और संसाधनों के अभाव के कारण कार्यप्रणाली धीमी पड़ गई है। स्थानीय स्तर पर भी कुछ समाजसेवी संगठनों और गांव के लोगों ने अपने स्तर पर अस्थायी इंतजाम किए हैं, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है।
बिहार के इन स्कूलों की तस्वीरें बताती हैं कि शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए सिर्फ योजनाएं बनाना ही काफी नहीं है, बल्कि जमीन पर उतरकर कार्यान्वयन की भी जरूरत है। भवन निर्माण, स्वच्छता, पेयजल और सुविधाओं की व्यवस्था प्राथमिकता बनानी होगी। इसके साथ ही शिक्षकों की संख्या बढ़ाना, संसाधनों का विस्तार करना और जागरूकता अभियान चलाना भी आवश्यक है। तभी जाकर इन स्कूलों का स्तर बदलेगा और बच्चे भी बेहतर शिक्षा ग्रहण कर सकेंगे।


























