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महाभारत जैसी परंपरा आज भी जिंदा है भारत के इन गांवों में

Polyandry News: यह अनोखी परंपरा 'बहुपति प्रथा' (Polyandry) कहलाती है। भारत में यह प्रथा मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले, लाहौल-स्पीति, उत्तराखंड के जौनसार-बावर और लद्दाख के कुछ दूरस्थ इलाकों में प्रचलित है। आइए, इस रहस्यमयी परंपरा के बारे में विस्तार से जानते हैं।

एक पत्नी और कई पति! भारत की यह प्रथा दुनिया को करती है हैरान (फाइल फोटो)

HIGHLIGHTS

  • द्रौपदी जैसी परंपरा आज भी निभा रहे हैं भारत के लोग
  • जहां पति नहीं, पूरे परिवार से होती है महिला की शादी
  • हिमाचल की इस अनोखी परंपरा के पीछे छिपा है बड़ा कारण
  • पहाड़ों में क्यों अपनाई गई बहुपति प्रथा? जानिए असली वजह
  • यहां पत्नी को मिलता है कई पतियों का प्यार और सम्मान

Polyandry News: जब भी हम शादी या वैवाहिक जीवन की बात करते हैं, तो हमारे दिमाग में सबसे पहले ‘एक पति और एक पत्नी’ का ही खयाल आता है। लेकिन, क्या आपको पता है कि भारत के कुछ हिस्सों में आज भी ऐसी परंपराएं जीवित हैं, जो हमारी सोच को पूरी तरह से चकित कर देती हैं? हैरानी की बात यह है कि यहां एक महिला कई पतियों के साथ वैवाहिक जीवन बिताती है और सबसे खास बात यह है कि वह सभी को बराबर का हक और प्यार देती है।

यह अनोखी परंपरा ‘बहुपति प्रथा’ (Polyandry) कहलाती है। भारत में यह प्रथा मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले, लाहौल-स्पीति, उत्तराखंड के जौनसार-बावर और लद्दाख के कुछ दूरस्थ इलाकों में प्रचलित है। आइए, इस रहस्यमयी परंपरा के बारे में विस्तार से जानते हैं।

महाभारत से जुड़ी यह अनोखी परंपरा

बहुपति प्रथा को लेकर सबसे बड़ा और प्राचीन उदाहरण महाभारत काल का है। जैसे द्रौपदी पांच पांडव भाइयों की पत्नी थीं, ठीक उसी तरह किन्नौर और आसपास के क्षेत्रों के लोग खुद को पांडवों का वंशज मानते हैं। हालांकि, इतिहासकार इस ऐतिहासिक दावे पर अपनी अलग-अलग राय रखते हैं, लेकिन इस परंपरा को लेकर स्थानीय लोगों के मन में गहरा विश्वास है।

किन्नौर में बहुपति प्रथा की असली सच्चाई

किन्नौर हिमाचल प्रदेश का एक बेहद खूबसूरत लेकिन दूरस्थ ट्रांस-हिमालयन जिला है, जो तिब्बत की सीमा से सटा हुआ है। यहां जो बहुपति प्रथा प्रचलित है, उसे ‘फ्रेटरनल पॉलीएंड्री’ यानी ‘भ्रातृ बहुपति प्रथा’ कहा जाता है। इसका मतलब है कि एक महिला की शादी किसी एक परिवार के कई भाइयों से होती है।

पुराने अध्ययनों और रिपोर्ट्स के अनुसार, कभी-कभी एक महिला के 7 पति तक हो जाते थे, हालांकि आधुनिक समय में 2 से 4 पतियों वाली शादियां ज्यादा देखने को मिलती हैं। इस प्रथा में सबसे बड़े भाई की शादी पहले होती है और उसके बाद छोटे भाई भी उसी पत्नी को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लेते हैं।

आखिर क्यों शुरू हुई यह परंपरा? (आर्थिक और भौगोलिक कारण)

अक्सर लोग सोचते हैं कि यह प्रथा केवल अंधविश्वास या मनमानी है, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। इसके पीछे बहुत मजबूत व्यावहारिक और आर्थिक कारण छिपे हैं। पहाड़ी इलाकों में खेती की जमीन बहुत कम होती है।
अगर एक परिवार में 4 भाई हैं और सभी अलग-अलग शादी करके अलग रहने लगे, तो पैतृक संपत्ति और खेती की जमीन 4 हिस्सों में बंट जाएगी। छोटी-छोटी जोतों पर खेती करना लगभग असंभव हो जाता और पूरे परिवार को भुखमरी का सामना करना पड़ता। बहुपति प्रथा ने इसी समस्या का हल दिया— जमीन बंटी नहीं और परिवार की आर्थिक ताकत बरकरार रही।

परिवार का जीवन कैसे चलता है? कैसे बंटता है प्यार?

इस अनोखे परिवार में जीवन कैसे चलता है, यह जानना बेहद दिलचस्प है:

  • प्यार और समय का बंटवारा: महिला सभी पतियों को बराबर का प्यार और सम्मान देती है। अक्सर प्यार और समय को दिन या रात के हिसाब से बांटा जाता है, ताकि किसी को भी कमी महसूस न हो।
  • कोई ईर्ष्या नहीं: पति भाइयों में आपस में ईर्ष्या या विवाद नहीं होता। सबका मुख्य उद्देश्य परिवार को एकजुट रखना और उसे आगे बढ़ाना होता है।
  • संपत्ति का अधिकार: सभी भाई मिलकर एक ही परिवार के मुखिया और संपत्ति के स्वामी होते हैं।
  • बच्चों का भविष्य: जो भी बच्चा पैदा होता है, उसे सभी पतियों का पुत्र ही माना जाता है। परिवार के वंश का नाम आमतौर पर सबसे बड़े भाई के नाम से ही चलता है।
  • दैनिक जीवन: पत्नी घर की सारी व्यवस्था संभालती है, जबकि पति अलग-अलग कामों (जैसे- खेती, पशुपालन, सरकारी नौकरी या व्यापार) में लगे रहते हैं। गांव की पंचायत और स्थानीय रीति-रिवाज इस पूरी व्यवस्था को पूरी तरह से मान्यता देते हैं।

बहुपति प्रथा में महिलाओं की स्थिति

सामान्य तौर पर पहाड़ी और पिछड़े क्षेत्रों में महिलाओं की स्थिति उतनी अच्छी नहीं मानी जाती, लेकिन बहुपति प्रथा में यह तस्वीर उलटी है। यहां महिलाओं को घर में बेहद सम्मान और अधिकार मिलता है। वे परिवार के बड़े आर्थिक और सामाजिक फैसलों में भाग लेती हैं। कई समाजशास्त्रियों का मानना है कि क्योंकि उन्हें कई पतियों का साथ और सपोर्ट मिलता है, इसलिए उनकी स्थिति अन्य पहाड़ी इलाकों की महिलाओं से कहीं बेहतर है।

अन्य क्षेत्र जहां यह प्रथा मौजूद है

किन्नौर के अलावा भारत में और भी कुछ जगहों पर यह प्रथा देखी गई है:

  • जौनसार-बावर (उत्तराखंड): यहां भी भाइयों द्वारा एक ही पत्नी रखने की परंपरा काफी प्रचलित रही है।
  • लद्दाख और जांस्कर: इन बर्फीले इलाकों की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यह प्रथा अपनाई गई।
  • तमिलनाडु की टोडा जनजाति: दक्षिण भारत में यह जनजाति भी बहुपति प्रथा को मानती है।
  • सिरमौर (हिमाचल प्रदेश): यहां के कुछ गांवों में भी ऐसे मामले सामने आए हैं।

आधुनिक युग में इस प्रथा का भविष्य

हालांकि यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, लेकिन अब इसमें तेजी से बदलाव आ रहा है। आधुनिक शिक्षा, शहरीकरण, सरकारी नौकरियों का बढ़ना और कानूनी चुनौतियों ने इस प्रथा को कमजोर कर दिया है। आज की नई पीढ़ी इस पुरानी व्यवस्था को थोड़ा अजीब और अपमानजनक मानती है। अब युवा अपनी मर्जी से मोनोगमी (एक पति-एक पत्नी) की ओर तेजी से झुक रहे हैं।

Rishi Tiwari

ऋषि तिवारी (Rishi Tiwari) ने वर्ष 2011 में मुंबई से पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और मुंबई से प्रकाशित मुंबई मित्र जैसे समाचारपत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। इसके बाद दिल्ली और एनसीआर में एपीएनएस न्यूज एजेंसी में लंबे समय तक सेवाएं देने के बाद यहां से रुख कर लिया। वर्ष 2018 में इन्होंने संध्या समय न्यूज के साथ नई पारी की शुरुआत की। पिछले कई वर्षों से निष्पक्ष, प्रभावी और जनसरोकारों पर आधारित पत्रकारिता को मजबूती से आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं।

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